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पीएमसी बैंक को कैसे उबारा जाए!

तमाल बंद्योपाध्याय /  March 02, 2021

येस बैंक और लक्ष्मी विलास बैंक (एलवीबी) के बाद सभी की नजरें पंजाब ऐंड महाराष्ट्र कोऑपरेटिव (पीएमसी) बैंक पर टिकी हैं। घोटाले से प्रभावित यह सहकारी बैंक उन तीन बोलियों का मूल्यांकन कर रहा है, जो उसे खुद को उबारने के लिए मिली हैं। फरवरी 1984 में बना पीएमसी बैंक एक बहु-राज्य शहरी सहकारी बैंक है। येस बैंक और एलवीबी में बहाली की योजनाओं को गोपनीय रखा गया और इन्हें उनके कारोबार को फ्रीज करने के बाद तेजी से घोषित किया गया। इससे इतर पीएमसी बैंक की बहाली का अंतिम चरण केवल अभी शुरू हुआ है, जबकि कई महीनों पहले इस पर मॉरेटोरियम लगाया गया था।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने 23 सितंबर, 2019 को बैंक के निदेशक मंडल को हटा दिया और एक प्रशासक नियुक्त किया था। वहीं निकासी की अधिकतम सीमा 1,000 रुपये तय कर दी गई थी। इसके तीन दिन बाद निकासी की सीमा बढ़ाकर 10,000 रुपये की गई। तब से निकासी की सीमा में लगातार बढ़ोतरी की गई है। इसे जून 2020 में आखिरकार एक लाख रुपये कर दिया गया और बैंक के नौ लाख से अधिक जमाकर्ताओं में से 84 फीसदी को अपनी पूरी जमाएं निकालने की मंजूरी दे दी गई। आरबीआई ने दिसंबर 2020 में मॉरेटोरियम बढ़ा दिया और पीएमसी बैंक की गतिविधियों पर 31 मार्च, 2021 तक रोक लगा दी।

यह प्रक्रिया नवंबर 2020 में शुरू हुई थी। उस समय पीएमसी बैंक ने अपने प्रबंधन नियंत्रण के अधिग्रहण के लिए निवेशकों से तथाकथित अभिरुचि पत्र (ईओआई) आमंत्रित किए थे। वित्तीय संस्थान, व्यक्ति या कंपनियां, सोसाइटी, न्यास या ऐसी अन्य कोई इकाइयां बोलियां लगाने के लिए पात्र थीं। ईओआई 20 नवंबर और प्रस्ताव 15 दिसंबर तक आने थे। इस मियाद को 1 फरवरी तक बढ़ाया गया। आरबीआई संभावित खरीदार की तलाश के लिए बहुत से बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों से अनौपचारिक रूप से बातचीत कर रहा था। आइडियल ग्रुप के सुरिंदर मोहन अरोड़ा ने विदेशी निवेशकों के एक समूह के साथ मिलकर बोली लगाई है। अरोड़ा की विटामिन खाद्य उत्पादों और कपड़ों के कारोबार में मौजूदगी है।

दूसरे बोलीदाता संजीव गुप्ता हैं। वह भारत में जन्मे ब्रिटिश कारोबारी और ब्रिटेन के लिबर्टी हाउस ग्रुप के संस्थापक हैं। अप्रैल, 2016 में जब टाटा स्टील यूके ने अपना ब्रिटेन का कारोबार बेचने का इरादा जाहिर किया था, उस समय गुप्ता ने इसके लिए बोली लगाई थी और लिबर्टी हाउस की ग्रीनस्टील रणनीति पेश की थी। इस समूह ने इनवॉयस प्रोसेसिंग कंपनी की बैंकिंग इकाई टंगस्टन बैंक और घाटे में चल रहे नाइजीरियाई बैंक के सहायक डायमंड बैंक का अधिग्रहण किया है। मैं समझता हूं कि यह बोली लगाने के लिए 5 अक्टूबर, 2020 को लिबर्टी स्टील इंडिया निगमित हुई। इसकी अधिकृत शेयर पूंजी 10 करोड़ रुपये और चुकता पूंजी 43,000 रुपये है।

तीसरा बोलीदाता सेंट्रम ग्रुप है, जिसके प्रमुख पुराने बैंकर जसपाल बिंद्रा हैं। वह इस नियुक्ति से पहले स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक के समूह कार्यकारी निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी (एशिया) थेे। फिनटेक कंपनी भारतपे सहबोलीदाता के रूप में सेंट्रम के साथ मिली थी।

सफल बोलीदाता इस सहकारी बैंक को लघु वित्त बैंक में बदल पाएगा। मार्च 2020 में पीएमसी बैंक का जमा पोर्टफोलियो 10,727 करोड़ रुपये, अग्रिम 4,473 करोड़ रुपये, कुल फंसा ऋण 3,519 करोड़ रुपये और पूंजी 293 करोड़ रुपये थी। लेकिन वित्त वर्ष 2020 में 6,835 करोड़ रुपये के घाटे से उसके नेटवर्थ में 5,851 करोड़ रुपये की कमी आई है।

ऐसा क्यों हुआ? यह पुरानी कहानी है। बैंक ने अपने कुल ऋण का करीब 75 फीसदी हिस्सा यानी करीब 6,500 करोड़ रुपये महज एक ही कंपनी- रियल एस्टेट कंपनी एचडीआईएल को दे दिया था।

पीएमसी बैंक के पूर्व प्रबंध निदेशक और बोर्ड के कुछ सदस्यों एवं चेयरमैन वरयाम सिंह समेत छह प्रमुख अधिकारियों ने ये ऋण मंजूर किए, जिसका पता बैंक के सिस्टम को नहीं चला। सात लोगों का यह गैंग अब सलाखों के पीछे है। इसने 21,049 फर्जी खाते बनाए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बैलेंस शीट एचडीआईएल समूह की कंपनियों को ऋण वितरण दर्शाए। मगर उन कंपनियोंं की पहचान उजागर नहीं की गई। एचडीआईएल ने 44 ऋण खातों के जरिये पीएमसी बैंक से लिए गए धन का इस्तेमाल अन्य बैंकों का कर्ज चुकाने में इस्तेमाल किया।

हालांकि इस बैंक के पास ज्यादा परिसंपत्तियां नहीं हैं। लेकिन सितंबर 2019 से मार्च 2021 के बीच कर्मचारियों के वेतन, शाखाओं के किराये और इसे जिंदा रखने के लिए तकनीकी प्लेटफॉर्म को चलाने पर 900 करोड़ रुपये खर्च हो जाएंगे। फॉरेंसिक ऑडिट भी मुफ्त में नहीं होगा।

पीएमसी की सात राज्यों में 137 शाखाएं हैं। उनमें 40 बैंक की हैं, 97 किराये के परिसरों में हैं और 25 बंद हो चुकी हैं। अनुबंधित कर्मचारियों को जाने को कह दिया गया है। कुछ नियमित कर्मचारियों ने भी बेहतर अवसरों के लिए बैंक छोड़ दिया है। कर्मचारियों के वेतन में भी कटौती की गई है। अब बैंक के पेरोल पर 1,200 कर्मचारी हैं, जिनमें से करीब 65 फीसदी महिलाएं हैं।

 समस्या इस तथ्य से पैदा होती है कि उसके करीब 30 फीसदी जमाकर्ताओं का जमाओं में 92 फीसदी हिस्सा है। शेष 70 फीसदी की जमा 25,000 रुपये या उससे कम है। जब बैंक को मॉरेटोरियम में डाला गया, तब उनका बैंक के कुल जमा पोर्टफोलियो 11,617 करोड़ रुपये में केवल 898 रुपये का हिस्सा था। सितंबर 2020 में जमा पोर्टफोलियो घटकर 10,500 करोड़ रुपये पर आ गया। पांच लाख रुपये तक की जमाओं पर बीमा कवर मिलता है। इससे करीब 4,000 करोड़ रुपये प्राप्त हो सकते हैं, लेकिन फिर भी 6,500 करोड़ रुपये की खाई रह जाएगी।

परिसंपत्ति के स्तर पर भी महज करीब 1,000 करोड़ रुपये के ऋण अच्छे हैं और 1,000 करोड़ रुपये के फंसे ऋणों में से 500 करोड़ रुपये की वसूली की जा सकती है। इसके अलावा इसके 2,000 करोड़ रुपये के सरकारी बॉन्ड पोर्टफोलियो से तुरंत नकदी मिल सकती है। इन सभी और भौतिक परिसंपत्तियों (जैसे शाखाएं) से करीब 4,000 करोड़ रुपये प्राप्त हो सकते हैं। इससे 6,500 करोड़ रुपये का अंतर (10,500 करोड़ रुपये की जमा देनदारी में से 4,000 करोड़ रुपये की परिसंपत्तियां घटाने के बाद) रह जाएगा। इसमें लेटर ऑफ क्रेडिट और गारंटी जैसी आकस्मिक देनदारी शामिल नहीं हैं। अगर हम उन्हें भी शामिल करते हैं तो अंतर बढ़कर 7,500 करोड़ रुपये हो सकता है।

अगर आरबीआई को कोई बोली स्वीकार्य नहीं लगी तो पीएमसी बैंक का परिसमापन होगा। जमाकर्ताओं को 6,500 करोड़ रुपये का नुकसान होगा (क्योंकि बीमा कवर से 4,000 करोड़ रुपये ही मिलेंगे) और 1,200 कर्मचारियों की नौकरी जाएगी। जमा बीमा देने वाली आरबीआई की इकाई सभी परिसंपत्तियां बेचकर केवल लागत वसूल कर पाएगी। परिसमापन रातोरात नहीं होता है, इसलिए यह प्रक्रिया पूरी होने तक और पैसा खर्च होगा।  

किसी भी बोलीदाता के लिए यह मुश्किल काम है क्योंकि बैंक को उबारने में लंबा समय लगेगा। यह ऐसा काम है, जिसमें कानूनी मामलों की भी आशंका हो सकती है। पीएमसी ब्रांड बरबाद हो चुका है, इसलिए बैंक को चलाने के लिए नए जमाकर्ताओं और प्रतिभाओं को लुभाना मुश्किल होगा।

अगर बहाली परिसमापन से बेहतर है तो यह अच्छा है क्योंकि इससे जमाकर्ताओं और कर्मचारियों के हितों की सुरक्षा होगी। इसे उबारने के लिए बड़े मूल्य की जमाओं के एक हिस्से को इक्विटी या ऐसे ही इंस्ट्रुमेंट में तब्दील किया जा सकता है। इसके अलावा बीमा प्रदाता को भी सफल बोलीदाता को 4,000 करोड़ रुपये दीर्घकालिक सॉफ्ट लोन के रूप में मुहैया कराने चाहिए। लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है। नए लाइसेंस के साथ बैंक को फिर से खड़ा करने के लिए वित्तीय ताकत के अलावा उचित कौशल, प्रशासन एवं समझदारी को अपनाने की दरकार है।

पहले ही काफी देर हो चुकी है। भ्रष्टाचार, राजनीति में फंसे और निराश जमाकर्ताओं के आत्महत्याएं करने के इतिहास वाले पीएमसी बैंक को उबारना नियामक और उबारने वाले दोनों के लिए येस बैंक और एलवीबी से बहुत अलग चुनौती है।

(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ सलाहकार हैं)

Keyword: पीएमसी बैंक, भ्रष्टाचार, राजनीति, येस बैंक, एलवीबी, लक्ष्मी विलास बैंक,
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