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रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण अपरिहार्य : रिजर्व बैंक

अनूप रॉय / मुंबई February 26, 2021

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण अपरिहार्य है लेकिन इससे मौद्रिक नीति का गठन जटिल हो जाएगा। यह रिपोर्ट वित्त पर मुद्रा पर आधारित है।

रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण का मतलब है कि मुद्रा का उपयोग निवासी और अनिवासी दोनों स्वतंत्र रूप से कर सकते हैं और वैश्विक व्यापारों के लिए उसका उपयोग आरक्षित मुद्रा के तौर पर किया जा सके।

रिपोर्ट में कहा गया है कि स्थानीय मुद्रा के अंतरराष्ट्रीयकरण के परिणाम स्वरूप विनिमय दर जोखिम समाप्त होने से सीमा पार व्यापार में लेनदेन और निवेश परिचालनों की लागत कम हो सकती है, लेकिन यह विनिमय दर स्थायित्व को क्षणिक और घरेलू दृष्टिकोण वाली मौद्रिक नीति को और अधिक चुनौतीपूर्ण बनाता है। इससे बचाव के लिए बाहरी झटकों को प्रभावी तरीके से सहने में सक्षम बड़े और गहन घरेलू वित्तीय बाजारों की आवश्यकता है।

रिपोर्ट में कहा गया है, 'अंतरराष्ट्रीयकरण संभवत: घरेलू रुपया आपूर्ति को नियंत्रित करने की केंद्रीय बैंक की क्षमता को सीमित कर सकता है और घरेलू वृहद आर्थिक परिस्थितियों के मुताबिक ब्याज दरों को प्रभावित कर सकता है।' इसमें कहा गया है कि गहन और जटिल वित्तीय बाजारों के अलावा किसी मुद्रा के अंतराष्ट्रीयकरण के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पूर्व शर्त कीमत की स्थिरता है।

विश्व औसत से अधिक महंगाई विनिमय के अंतरराष्ट्रीय माध्यम के रूप में उपयोग किए जाने और मूल्य का भंडार बनने की मुद्रा की क्षमता को कम करता है और वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में ऐसी अर्थव्यवस्था की भूमिका को प्रतिबंधित करता है।

इसके उलट स्थिर कीमत से घरेलू मुद्रा में अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का भरोसा बनता है।

इसमें कहा गया है कि इस परिपेक्ष्य में कीमत स्थिरता पर ढांचे को ध्यान में रखकर लचीले महंगाई का प्राथमिक जोर पूंजीगत खाते को और अधिक उदार बनाने और रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण के लिए काफी सहायक होता है।

रिपोर्ट में सुझाया गया है कि रिजर्व बैंक को मौद्रिक नीति तैयार करने के लिए विनियम दरों पर महत्त्वपूर्ण सूचना वेरिएवल के तौर ध्यानपूर्वक निगरानी करनी चाहिए क्योंकि महंगाई अभी से विनिमय दर में परिवर्तन के 10 से 13 फीसदी तक बदल सकता है।

दिलचस्प है कि रिपोर्ट में स्थायी जमा सुविधा (एसडीएफ) के उपयोग की जरूरत का भी उल्लेख किया गया है जो गिरवी की पेशकश किए बिना ही तरलता को सोख लेता है।

तरलता को सोखने के उपकरण के तौर पर एसडीएफ का बाजार में लंबे वक्त से इंतजार है। रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास भी पहले यह संकेत दे चुके हैं कि जरूरत पडऩे पर रिजर्व बैंक के पास यह एक विकल्प के रूप में मौजूद है।

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