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मुखरता का पर्याय थे राहुल खुल्लर

आदिति फडणीस /  February 23, 2021

आमतौर पर प्रशासनिक क्षेत्र में अधिकतर मृदुभाषी अफसरशाह ही होते हैं जो नरम रुख रखने के साथ ही थोड़ा झुकने की प्रवृत्ति वाले लगते हैं लेकिन इस लिहाज से 1975 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारी राहुल खुल्लर बिल्कुल अलग थे। उनकी मुखरता ही सबसे बड़ी खूबी थी और वह किसी के सामने झुकते नहीं थे। उनकी यह खूबी जीवनकाल के आखिरी पलों तक स्पष्ट रूप से दिखती रही। वह गंभीर रूप से बीमार थे लेकिन उन्होंने अपने अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर सरकार के नाम एक खुले पत्र पर हस्ताक्षर किए जिसमें सरकार को आंदोलन कर रहे किसानों की बात सुनने का सुझाव दिया गया था क्योंकि ऐसा माना गया कि यह संविधान की संघीय भावना का उल्लंघन था कि संसद में पारित कराए गए कृषि कानूनों को लेकर किसानों से ही परामर्श नहीं किया गया जो इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते थे।

उन्होंने अपने कई सहयोगियों को भी अपनी इस विशेषता की वजह से निराश किया। लेकिन खुल्लर से जब भी सलाह मांगी गई तब उन्होंने किसी के पद और ओहदे को लेकर कोई रियायत नहीं दी और वही कहा जो उन्हें सही लगा। वह 1991 में कम अवधि वाली पोस्टिंग के बाद अरुणाचल प्रदेश से लौट कर प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में पांच साल बिताए थे। उस दौरान तत्कालीन पी वी नरसिंह राव सरकार ने दिल्ली स्कूल ऑफ  इकनॉमिक्स में उनके ही एक शिक्षक मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री के रूप में नियुक्त किया था जो बाद में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार में प्रधानमंत्री भी बने। मनमोहन सिंह को निजी सचिव की जरूरत थी और उनके छात्र और अपने बैच के टॉपर रहे खुल्लर को एक औपचारिक साक्षात्कार के बाद यह नौकरी मिल गई।

कुछ हफ्ते बाद ही बजट पेश होना था। बजट दिवस की पूर्व संध्या पर खुल्लर को वित्त मंत्री के कार्यालय में बुलाया गया। सिंह ने खुल्लर के हाथ में अपनी कलाई रख कर पूछा, 'राहुल, जरा देखिए, क्या मुझे बुखार है?' उन्होंने कहा, 'नहीं, नहीं, सर।' खुल्लर ने यह महसूस किया कि यह पल स्कूल के पहले दिन दिन जैसा ही है जब किसी छात्र को पेट में दर्द की शिकायत होती है। उन्होंने कहा, 'आप बिल्कुल ठीक रहेंगे सर।'

हालांकि बाद में इस बात को लेकर उनके कुछ सहयोगियों को बड़ी हैरानी हुई कि जब सिंह 2004 में प्रधानमंत्री बने तब उन्हें पीएमओ में नहीं शामिल नहीं किया गया। लेकिन खुल्लर उस वक्त एक और अहम काम कर रहे थे। वह कुछ उन अफ सरशाहों में से एक हैं जिन्होंने वाणिज्य मंत्रालय में सात वर्ष से अधिक समय तक अलग-अलग पदों पर काम किया और आखिर में वह सचिव के पद पर भी आसीन हुए। वाणिज्य क्षेत्र में शायद ही कुछ ऐसा हो जिसके बारे में वह न जानते हों।

बात साल 2010 की है। देश में 6 करोड़ टन खाद्यान्न था हालांकि देश में केवल 2.1 करोड़ टन ही बफर स्टॉक रखे की जरूरत थी। उस वक्त कुछ लोगों का मानना था कि खाद्यान्न निर्यात पर से प्रतिबंध हटाया जाना चाहिए जबकि कुछ का मानना था कि ऐसा नहीं किया जाना चाहिए।

निर्यात के पक्ष में तर्क काफी मजबूत था। लगातार अच्छी फ सलों के कारण देश में अनाज की मात्रा बढ़ी हुई थी जबकि दुनिया के गेहूं के भंडारों में सूखे की भविष्यवाणी की जा रही थी मसलन उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान और रूस जैसे देशों में। लेकिन एक हठपूर्ण खरीद नीति और अज्ञात डर से भारत अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनाज निर्यात के लिए कदम बढ़ाने से खुद को रोक रहा था। उस वक्त सरकार के पास काफी मात्रा में खाद्यान्न उपलब्ध था और यह बाजार की कीमतें भी तय कर रही थी ।

खुल्लर उस वक्त वाणिज्य सचिव थे और उस समय उनका केवल एक ही मिशन था कि किसी भी तरह सरकार को यह समझाया जाए कि अनाज को सड़ाने के बजाय इसे बेचना ही एक बेहतर विकल्प था और यहां तक कि बेहतर भावना के साथ भी इसे अन्य देशों में भेजा जाना चाहिए। वह मंत्रिसमूह की बैठक में काफी ऊर्जा से भरे होकर अपना तर्क दे रहे थे कि अनाज के निर्यात पर लगी रोक हटा ली जानी चाहिए।

हालांकि उस वक्त के तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी उनसे इस बात पर खफा भी हुए लेकिन योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया खुल्लर के बचाव में आए और उन्होंने कहा, 'खुल्लर वाणिज्य सचिव हैं, आप उनसे और क्या कहने की उम्मीद करते हैं?' आखिरकार बाद में सरकार ने उनकी बातों में दम देखा और थोड़ी मात्रा में निर्यात करने का फैसला किया। लेकिन तब तक अंतरराष्ट्रीय कीमतें 350 डॉलर प्रति टन से घटकर 250 डॉलर तक आ चुकी थीं।

उनकी जगह पर कोई दूसरा चुप रहने का ही विकल्प पसंद करता लेकिन राहुल खुल्लर ऐसा नहीं कर सकते थे। उन्हें माफी मांगने में कोई परहेज नहीं था लेकिन जोखिम उठाकर कोई सही बात कहने का बिल्कुल डर नहीं था। खुल्लर ने एक बार इस संवाददाता से भी कहा था कि कोई भी नौकरशाह, चाहे वह कितना भी स्मार्ट क्यों न हो, गलती कर सकता है। लेकिन उनका यह मानना था कि गलती के डर से कुछ न करना माफ  करने योग्य बात नहीं होती है।

उन्होंने इस बात को स्पेक्ट्रम के मूल्यांकन और मूल्य निर्धारण पर भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) की रिपोर्ट में भी जाहिर किया जब वह इसके अध्यक्ष बने।

खुल्लर ने यह टिप्पणी स्पेक्ट्रम के मूल्यांकन पर नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की विवादास्पद टिप्पणी के संदर्भ में आई जो स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले पर केंद्र्रित थी। उन्होंने कहा कि यह अंदाजा लगाना असंभव है कि अब से 5 या 10 साल बाद स्पेक्ट्रम का मूल्य क्या होगा।

Keyword: राहुल खुल्लर, अफसरशाह, भारतीय प्रशासनिक सेवा, आईएएस अधिकारी, कृषि कानून,
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