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राज्य सभा में बतौर नेता प्रतिपक्ष खडग़े के पास मौका

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  February 19, 2021

भारतीय राजनीति में कुछ ही राजनीतिक नेता इतने खुशकिस्मत रहे कि उन्हें लोक सभा और राज्य सभा दोनों सदनों में विपक्ष के नेता की भूमिका निभाने का अवसर मिला हो। इस संदर्भ में सबसे पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं जसवंत सिंह और लाल कृष्ण आडवाणी की याद आती है। इसकी वजह भी एकदम साफ है: बीते 70 वर्षों में भाजपा ही सबसे लंबे समय तक विपक्ष में रही है। परंतु यह बहुत विशिष्ट उपलब्धि है कि कोई पार्टी एक व्यक्ति में इतना अधिक भरोसा जताए कि वह दोनों सदनों में विपक्ष का नेता हो। कांग्रेस मेंं मापन्ना मल्लिकार्जुन खडग़े इस उपलब्धि का दावा कर सकते हैं। यद्यपि पिछली लोक सभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने उन्हें इस पद पर मान्यता देने से इनकार कर दिया था क्योंकि कांग्रेस लोक  सभा में केवल 44 सीटें हासिल कर सकी थी जबकि सदन में नेता प्रतिपक्ष बनने के लिए यह आवश्यक था कि पार्टी कुल सीटों का 10 प्रतिशत यानी 55 सीटों पर जीत हासिल करती।

सन 2019 के लोक सभा चुनाव को छोड़ दिया जाए तो खडग़े का चुनाव जीतने का शानदार रिकॉर्ड है। उस चुनाव में उन्हें कर्नाटक की गुलबर्ग सीट पर भाजपा प्रत्याशी से हार का सामना करना पड़ा था। उसके सिवा वह कभी कोई चुनाव नहीं हारे। सन 2009 में पहला लोक सभा चुनाव लडऩे से पहले वह लगातार नौ बार कर्नाटक के गुरमितकल विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीत चुके थे। खडग़े सन 2014 मेंं कांग्रेस विरोधी लहर के बावजूद गुलबर्ग से चुनाव जीते।

इस लिहाज से देखें तो पी चिदंबरम और जयराम रमेश जैसे कद्दावर नेताओं के होते हुए कांग्रेस को क्या जरूरत थी कि वह 78 वर्षीय ऐसे राजनेता को नेता प्रतिपक्ष बनाए जो लोक सभा चुनाव में हारने के बाद उच्च सदन में आया हो? यद्यपि खडग़े को यह याद दिलाया जाना पसंद नहीं है कि वह एक दलित हैं लेकिन यह संभव है कि कांग्रेस जाति का इस्तेमाल कर्नाटक में अपने समर्थकों को संदेश देने के लिए कर रही हो।

यदि ऐसा था तो क्या पार्टी को कोई ऐसा व्यक्ति नहीं तलाश करना था जो सर्वाधिक वंचित और दलितों में भी सबसे हाशिये पर मौजूद वर्ग का प्रतिनिधित्व करता हो? कर्नाटक में अनुसूचित जाति और जनजाति के 23.5 फीसदी लोग हैं और सरकारी और शैक्षणिक क्षेत्र में उन्हें 18 फीसदी आरक्षण हासिल है। इसमें 15 फीसदी आरक्षण अनुसूचित जाति और तीन फीसदी अनुसूचित जनजाति के लोगों को हासिल है। परंतु कर्नाटक में अनुसूचित जाति के लोग व्यापक रूप से होलेयार और मडिगा दलितों में विभाजित हैं। होलेयार दलित, मडिगा दलितों से उतनी ही दूरी बरतते हैं जितनी सवर्ण वर्ग के लोग होलेयारों के साथ। दोनों दलित समुदायों के बीच आपस में विवाह संबंध या अन्य सामाजिक रिश्ते नहीं होते। मडिगा दलितों को लगता है कि आरक्षण का सारा लाभ होलेयार समुदाय ले जाता है। कर्नाटक में कांग्रेस के अधिकांश दलित नेता होलेयार हैं। इनमें खडग़े और प्रदेश कांगे्रस अध्यक्ष जी परमेश्वर शामिल हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि मडिगा दलित पूरी तरह भाजपा के साथ हो गए।

खडग़े ने अपनी शुरुआत श्रम संगठन के अधिवक्ता के रूप में की थी और वह अच्छी तरह जानते हैं कि संघर्ष क्या होता है। सन 1972 में जब वह गुरमितकल से पहली बार विधानसभा चुनाव जीते तभी से वह मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। वह सन 1976 में देवराज उर्स की सरकार में मंत्री बने। वह सन 1980 में गुंडु राव मंत्रिमंडल में, 1990 में एस बंगारप्पा  मंत्रिमंडल में और सन 1992 से 1994 तक एम वीरप्पा मोइली सरकार में भी मंत्री रहे। सन 1994 में जब वह नेता प्रतिपक्ष बने तब उनकी भूमिका बदली। सन 1999 में वह मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में शामिल थे लेकिन एसएम कृष्णा से पिछड़ गए। सन 2004 में धर्म सिंह उनसे आगे निकल गए। सन 2013 में कर्नाटक में भाजपा की सरकार गिरी लेकिन खडग़े इस बार भी अवसर गंवा बैठे और सिद्धरमैया कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने।

कांग्रेस पार्टी की ओर से खडग़े ने सन 2014 से 2019 तक तमाम अपमान और अवमानना का सामना किया। ऐसी कई समितियां हैं जहां नेता प्रतिपक्ष की उपस्थिति अनिवार्य है। इनमें सीबीआई के प्रमुख और मुख्य सतर्कता आयुक्त का चयन करने वाली समितियां भी शामिल हैं। उन्होंने लोकपाल के चयन के लिए होने वाली बैठकों का बहिष्कार किया क्योंकि वहां उन्हें विशेष अतिथि के रूप में शिरकत करने के लिए बुलाया गया था और चूंकि वह नेता प्रतिपक्ष नहीं थे इसलिए उन्हें कोई अधिकार प्राप्त नहीं थे।

पार्टी के कुछ सदस्य कहते हैं कि उन्हें मौजूदा नियुक्ति सोनिया गांधी की कृपा से मिली है क्योंकि गांधी परिवार एक ऐसा व्यक्ति चाहता था जो सवाल-जवाब न करता हो और ऐसा वफादार हो जिससे कोई खतरा न हो। खडग़े इस परिभाषा में खरे उतरते हैं। अब देखना होगा कि एक ऐसे सदन में जहां विपक्ष के पास अपनी बात मजबूती से रखने का अवसर है, नेता प्रतिपक्ष के रूप में मल्लिकार्जुन खडग़े खुद को कैसे पेश करते हैं।

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