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इंटरनेट संबंधी कानूनोंमें बदलाव का वक्त?

अजित बालकृष्णन /  02 16, 2021

इन दिनों कुछ रातें ऐसी होती हैं जब मेरी नींद किसी दु:स्वप्न से टूटती है। यह मेरे लिए अस्वाभाविक है। लंबे समय से मैं रात नौ बजे सो जाता हूं और सुबह पांच बजे जगने के बाद दो घंटे का समय शांतिपूर्वक पुस्तकों के साथ बिताता हूं। इस दौरान मैं अपने कुत्ते और बिल्ली के साथ भी वक्त बिताता हूं जो मेरे कमरे की बिजली जली देखकर जल्दी जाग जाते हैं। इन दिनों जिस तरह के दु:स्वप्न मुझे अक्सर आने लगे हैं, वैसे सपने मुझे पहले कभी आए हों, ऐसा मुझे याद भी नहीं आता।

 इन दु:स्वप्नों का संबंध निश्चित तौर पर इंटरनेट से है। प्रिय पाठको, जैसा कि आप सभी जानते हैं मैं इंटरनेट से बहुत लंबे अरसे से जुड़ा हुआ हूं और मैंने सन 1995 में भारतीय उपमहाद्वीप में पहली वेबसाइट बनाई और उसे शुरू किया।

सवाल यह है कि फिर ये दु:स्वप्न क्यों आ रहे हैं? शुरुआत इसी बात से करते हैं कि हर बार जब मुझे पता चलता है इंटरनेट पर विभिन्न वेबसाइट का इस्तेमाल करने वालों की प्रोफाइल की जानकारी राजनीतिक दलों को बेची जाती है अमेरिका, ब्रिटेन, केन्या, मेक्सिको और (अपनी सांसें थाम लीजिए) भारत तक के चुनावों में इनका इस्तेमाल किया जाता है तो यह जानकारी सामने आते ही मेरा दिल कांप जाता है।

हमें हर रोज झूठी और भ्रामक खबरों के बारे में समाचार पढऩे को मिलते हैं। इनमें से ताजातरीन झूठी खबर का तो मैं भी शिकार होते-होते बचा। खबर यह थी कि अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने कार्यालय में अपने पहले दिन की शुरुआत वैदिक मंत्रों और पूजा के साथ की। मुझे यह खबर देश के कई प्रतिष्ठित लोगों ने भेजी जो उनके मुताबिक इस बात का प्रमाण थी कि भारतीय मूल्य दुनिया भर में अपनी जगह बना रहे हैं।

कुछ मुल्क, दूसरे देशों के वेब ऐप पर प्रतिबंध लगा रहे हैं। स्वयं हमारी सरकार ने टिकटॉक, वीचैट और बायडू समेत 59 चीनी ऐप्लीकेशन पर प्रतिबंध लगा दिए हैं।

मेरे जैसे शुरुआती दौर से जुड़े लोगों को लगता था कि इंटरनेट एक ऐसी जगह और तकनीक है जो सभी नागरिकों को अपना नजरिया जाहिर करने की छूट देगी, उनमें समझ पैदा करेगी तथा वे बिना किसी बाधा के दूसरों के साथ अपनी बातें साझा कर सकेंगे।

मुझे सन 2008 के वे महीने याद हैं जब सप्ताह में दो बार उड़ान से दिल्ली में सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय पहुंचता था और उस समिति के साथ कड़ी मेहनत करता था जिसने सन 2008 में देश के सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम को अद्यतन किया था ताकि देश में इंटरनेट का संचालन हो सके। मैंने स्वयं अधिनियम का अनुच्छेद 79 लिखा था जिसने इंटरनेट प्लेटफॉर्म के बचाव के लिए मध्यवर्ती संस्थाओं का वर्गीकरण किया था। तत्कालीन आईटी सचिव समेत हम सभी इस पर कड़ी मेहनत कर रहे थे और यह देखने को उत्सुक थे कि कैसे इंटरनेट हमारे देश को एक समृद्ध और समतावादी मुल्क बनाएगा। प्रश्न यह है कि इंटरनेट इस स्तर तक कैसे गिर गया कि अब यह एक ऐसे जंगल की तरह नजर आ रहा है जहां शिकारी हर इंसान का शोषण करने को तैयार हैं।

आश्वस्त करने वाली बात यह है कि इंटरनेट और वल्र्ड वाइड वेब को लेकर ऐसी ही निराशा वल्र्ड वाइड वेब के ब्रिटिश आविष्कारक टिम बर्नर्स ली ने भी साझा की है। उन्होंने हाल ही में कहा, 'मैंने एक आदर्श स्वप्न देखा था कि इससे बेहतरीन ज्ञान का देशव्यापी प्रसार होगा...मुझे लगता है कि यहां अब जिस तरह की गलत जानकारियों का प्रसार हुआ है उसे देखकर ढेर सारे लोग स्तब्ध होंगे...'

इतिहास में ऐसी अन्य घटनाएं भी हुई हैं जब एक बेहतरीन और भरोसा जगाने वाली तकनीक का खराब अंत होता है। पहली औद्योगिक क्रांति की शुरुआत इस लक्ष्य के साथ हुई थी कि मशीनों से सूती धागे कातने और कपड़े बुनने के दोहराव वाले काम लिए जाएंगे और इससे कपड़ों की कीमत भी इतनी कम होगी कि वे अमीरों के साथ आम लोगों की पहुंच में आएंगे। परंतु इसकी सफलता के साथ ही इसका बुरा पहलू भी सामने आया। कपड़ों की बढ़ती मांग के बीच अफ्रीका के लोगों को बड़े पैमाने पर दास बनाकर अमेरिका भेजा गया ताकि वे कपास के खेतों में काम कर सकें। ऐसा इसलिए हुआ कि कपास की मांग बढ़ गई थी। बढ़ती मांग के कारण कपास के मूल स्रोतों की तलाश बढ़ी और ब्रिटिश भारत पहुंचे और अगले दो सौ साल तक उसे अपना उपनिवेश बनाकर रखा। इससे क्या सबक मिलते हैं? तकनीकी नवाचार और उद्यमिता की ऊर्जा को यदि अबाध रूप से पनपने दिया जाए तो परिणाम कई बार बहुत बुरे हो सकते हैं। मुझे आशंका है कि आज इंटरनेट उसी मोड़ पर खड़ा है जिस पर पहली औद्योगिक क्रांति 19वीं सदी के मध्य में थी।

यह बात चिंतित करने वाली है क्योंकि कोविड महामारी के कारण इंटरनेट को अपनाने की गति तेज हुई है। उदाहरण के लिए ऑनलाइन शिक्षा जिसे पहले तकनीकी उत्साहियों की दिलचस्पी का विषय माना जाता था वह अब न केवल उच्च शिक्षा के लिए बल्कि स्कूली शिक्षा के लिए भी उसे अपनाया जा रहा है। अदालतों में ऑनलाइन सुनवाई का अब व्यापक इस्तेमाल हो रहा है और ऐसा लगता है कि घंटों की यात्रा करके सुनवाई के लिए अदालत जाना और वहां प्रतीक्षा करना तथा महीनों निर्णय का इंतजार करना, यह सब समाप्त होने वाला है। प्राथमिक चिकित्सा के क्षेत्र में भी ऑनलाइन तरीके अपनाने की तैयारी है।

दूसरे शब्दों में कहें तो समाज में इंटरनेट की भूमिका बदलने वाली है। अब यह केवल युवाओं के लिए मनोरंजन, रोजगार तलाशने, सस्ते टिकट और कपड़े तलाशने, संगीत सुनने, सिनेमा देखने या गपशप करने का जरिया भर नहीं है बल्कि यह सभी लोगों के जीवन में अहम भूमिका अपनाने जा रहा है। इतना ही नहीं यह हमारी रक्षा और कानून व्यवस्था के बुनियादी ढांचे का भी अहम अंग बनने वाला है।

क्या नीतिगत पहल के क्षेत्र में बड़े प्रयासों की आवश्यकता है: मसलन प्रतिस्पर्धा कानून को अद्यतन बनाना ताकि अत्यधिक रियायत वाली ऑनलाइन बिक्री से निपटा जा सके, या फिर निजता कानून को यूरोप जैसे मानकों वाला बनाना? क्या हमें भारतीय वेंचर कैपिटल और निजी इक्विटी क्षेत्र विकसित करने के लिए नए कानून की आवश्यकता है और क्या हम ऐसा करके भारतीय स्वामित्व वाला इंटरनेट उद्योग विकसित कर सकते हैं जो हमारी रक्षा जरूरतों और आर्थिक वृद्धि दोनों के लिए मददगार साबित हो?
(लेखक इंटरनेट उद्यमी हैं)

Keyword: इंटरनेट, कानून, वेबसाइट, टिकटॉक, वीचैट, बायडू, ऐप्लीकेशन, प्रतिबंध,
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