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आईबीसी की वापसी

संपादकीय /  02 15, 2021

जानकारी के मुताबिक सरकार ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) का निलंबन समाप्त करने पर विचार कर रही है ताकि संकटग्रस्त परिसंपत्तियों का निस्तारण किया जा सके। सरकार संकटग्रस्त क्षेत्रों से अलग ढंग से निपटने पर भी विचार कर रही है। आईबीसी प्रक्रिया को दोबारा शुरू करने से संकटग्रस्त परिसंपत्तियों के निस्तारण में मदद मिलेगी और पूंजी का किफायती इस्तेमाल सुनिश्चित होगा।

पहली बात तो यही है कि विस्तारित निलंबन से पहले ही बचा जाना चाहिए था। महामारी ने अर्थव्यवस्था को कई तरह से प्रभावित किया है और कई कारोबारों पर उसका असर बरकरार रहेगा। ऐसे में यह अहम है कि तंत्र को सक्षम तरीके से बेहतर बनाने की प्रणाली विकसित हो। आईबीसी प्रक्रिया की बहाली सही दिशा में उठाया गया कदम होगी और संकटग्रस्त परिसंपत्ति निस्तारण के लिए माहौल पर इसका असर होगा।

केंद्रीय वित्त मंत्री ने बजट में कहा कि संकटग्रस्त परिसंपत्तियों के प्रबंधन और निस्तारण के लिए परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनी (एआरसी) और परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनी (एएमसी) की स्थापना की जाएगी। इस नई प्रणाली के बारे में अभी विस्तृत ब्योरा नहीं है लेकिन बैंकों से अपेक्षा है कि वे नई एआरसी और एएमसी को पूंजी मुहैया कराएंगे। रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों के अनुसार प्रॉविजनिंग समायोजन करने के बाद 500 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज एआरसी को स्थानांतरित किया जाएगा। बैंकों को परिसंपत्ति स्थानांतरण के लिए 15 फीसदी राशि का तत्काल भुगतान किया जाएगा और शेष 85 प्रतिशत के लिए प्रतिभूति रसीदें जारी की जाएंगी। बैंकों को कुल कितनी राशि मिलेगी यह परिसंपत्ति से होने वाली कुल वसूली पर निर्भर करेगा। दलील यह है कि नई व्यवस्था कारगर होगी क्योंकि यह बैंकों के बीच तालमेल की दिक्कत दूर करेगी। बैंकों को बेहतर मूल्य मिलेगा क्योंकि एएमसी से फर्म को समय और समर्थन दोनों मिलेगा। जरूरी नहीं कि यह सब जमीन पर इतना ही कारगर हो जितना अभी लग रहा है।

यह स्पष्ट नहीं है कि बैंक एक नई संस्था में केवल इसलिए पैसा क्यों लगाएंगे जबकि परिसंपत्ति हस्तांतरण के समय उन्हें इसका केवल एक हिस्सा वापस मिलेगा। चूंकि देश के बैंकिंग क्षेत्र में सरकारी बैंकों का दबदबा है और अधिकांश संकटग्रस्त परिसंपत्ति भी उन्हीं के पास है तो उन्हें पूंजी में भी सहयोग करना होगा। ऐसे में काफी संभव है कि नए संस्थागत ढांचे में सरकारी गुणधर्म हों। यदि ऐसा हुआ तो विभिन्न क्षेत्रों में तनावग्रस्त परिसंपत्तियों से निपटने के लिए प्रतिभा समूह तैयार करना मुश्किल होगा। इसके अलावा निस्तारण में लंबा समय लग सकता है। देनदारी चूकने वाली कंपनी के प्रवर्तक उन्हें चलाना जारी रख सकते हैं। इससे अंतिम तौर पर निस्तारण कठिन हो जाएगा। यदि केंद्रीय बैंक नई एआरसी को मौजूदा एआरसी पर लागू नियमों से रियायत देता है तो बराबरी के अवसरों का प्रश्न भी उठेगा। यह मौजूदा एआरसी के साथ अनुचित होगा। 

नई व्यवस्था की एक संभावित वजह यह हो सकती है कि सरकारी बैंकों में पूंजी डालने के काम में थोड़ी देर की जाए। परंतु उस पर विचार नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि नई प्रक्रिया आईबीसी की प्रासंगिकता को प्रभावित करेगी। सच तो यह है कि सरकार को पंचाट की शक्ति बढ़ाकर आईबीसी को और मजबूत करना चाहिए। निस्तारण की वास्तविक समय-सीमा पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि 270 दिन की मौजूदा समय सीमा में वह समय शामिल नहीं है जो वाद दाखिल करने में लगता है। यह समय प्राय: लंबा होता है। इस प्रक्रिया में कई परियोजनाओं का मूल्य कमजोर पड़ता है। हालांकि मूल्यांकन के क्षेत्र में समय के साथ सुधार भी होगा। संक्षेप में कहें तो समांतर संस्थागत क्षमता विकसित करने से समस्या केवल कुछ समय के लिए टलेगी। 
Keyword: आईबीसी, ऋणशोधन अक्षमता, दिवालिया संहिता, आईबीसी, एआरसी, एएमसी,
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