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आखिर बॉन्ड बाजार को गुस्सा क्यों आता है?

बैंकिंग साख
तमाल बंद्योपाध्याय /  February 07, 2021

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन बॉन्ड बाजार को अपने निर्णय से प्रभावित नहीं कर पाई। विभिन्न परिपक्वता वाली सरकारी बॉन्ड की कीमतें लुढ़क गईं और प्रतिफल उछलने लगे। यह सिलसिला तब तक जारी रहा जब तक आरबीआई ने 5 और 10 वर्षों की अवधि वाले बॉन्ड (11,000-11,000 करोड़ रुपयेे) के लिए बोलियां अस्वीकार नहीं कर दीं। दो अन्य बॉन्ड 2 वर्ष और 40 वर्ष की परिपक्वता अवधि वाले बॉन्ड की नीलामी का जिम्मा प्राथमिक डीलरों पर डाल दिया गया।

प्राथमिक डीलर सरकारी प्रतिभूतियां खरीदते और बेचते हैं और मध्यस्थ की तरह काम करते हैं। इसके बाद दिन में कारोबार के दौरान सबसे अधिक चढऩे वाले बॉन्ड पर प्रतिफल गुरुवार के मुकाबले महज 1 आधार अंक  की बढ़त के साथ बंद हुआ। हालांकि पांच वर्ष की अवधि के बॉन्ड पर प्रतिफल अपेक्षाकृत अधिक रहा। बॉन्ड कीमतें और प्रतिफल एक दूसरे की विपरीत दिशा में चलते हैं।  एमपीसी के सभी सदस्यों ने एकमत से दरों में कोई बदलाव नहीं करने का निर्णय लिया। आरबीआई ने वित्त वर्ष 2021-22 में आर्थिक वृद्धि दर 10.5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है और यह भी कहा है कि मांग में तेजी के बाद प्रमुख महंगाई दर में तेजी दिख सकती है। खुदरा महंगाई दिसंबर में 4.59 प्रतिशत के स्तर पर आ गई थी और पहली बार केंद्रीय बैंक के सहज दायरे (2 प्रतिशत कम या ज्यादा) में थी। जनवरी-मार्च अवधि में यह करीब 5.2 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया गया है, जो पूर्व के अनुमान से 60 आधार अंक कम है। हालांकि अगले वित्त वर्ष की पहली छमाही में महंगाई दर 5.0-5.20 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान लगाया गया है। पहले महंगाई दर 4.6 से 5.2 प्रतिशत के बीच रहने का अंदेशा जताया गया था। आरबीआई के लिए महंगाई को लेकर संतुलन साधना चुनौतीपूर्ण है, लेकिन इसे लेकर कोई आश्चर्य की बात नहीं है। अब प्रश्न है कि आखिर बॉन्ड पर प्रतिफल क्यों अधिक हो गया?

संभवत: बाजार चाह रहा था कि आरबीआई खुले बाजार परिचालन (ओएमओ) के जरिये होने वाली बॉन्ड खरीदारी का कार्यक्रम जारी करे। दो चरणों के ओएमओ के तहत आरबीआई अल्प अवधि के बॉन्ड बेचता है और दीर्घ अवधि के बॉन्ड बेचता है। इसके साथ ही दोनों अवधि के बॉन्ड पर प्रतिफल नियंत्रित कर सरकार की उधारी पर आने वाली लागत कम करता है। बैंकों को भी इससे लाभ मिलता है क्योंकि जब बॉन्ड पर प्रतिफल कम होता है तो वे सरकारी प्रतिभूतियों में कारोबार कर मुनाफा दर्ज करते हैं।

आरबीआई ने ओएमओ कार्यक्रम जारी नहीं किया है लेकिन हेल्ड टू मैच्योरिटी (एचटूएम)श्रेणी के तहत बॉन्ड पोर्टफोलियो की सीमा बढ़ा दी है। इससे बैंक ट्रेजरी को बॉन्ड पर प्रतिफल बढऩे की स्थिति में तंत्रगत (मार्क टू मार्केट) नुकसान से बचने में मदद मिलेगी। मार्क टू मार्केट एक अंकेक्षण विधि है, जिसके जरिये बॉन्ड का मूल्यांकन मौजूदा बाजार मूल्य पर किया जाता है, न कि जिस कीमत पर वे खरीदे जाते हैं उन पर। चूंकि, बॉन्ड एचटूएम श्रेणी में रखे जाते हैं, इसलिए उनका मूल्यांकन बाजार मूल्य पर करना होता है और कीमतें घटने और प्रतिफल बढऩे की हालत में भी बैंकों को एमटीएम नुकसान नहीं होता है।

आरबीआई ने बैंक के नकद आरक्षी अनुपात (सीआरआर) को भी सामान्य स्तर पर लाने की पहल शुरू की है। पिछले साल सीआरआर 1 प्रतिशत कम कर मार्च 2021 तक के लिए 3 प्रतिशत तक कर दिया गया था। मार्च के अंतिम सप्ताह में इसे बढ़ाकर 3.5 प्रतिशत किया जाएगा और मई में 4 प्रतिशत किया जाएगा। दो चरणों में सीआरआर बढ़ाने से वित्तीय प्रणाली से करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये रकम निकल जाएगी, लेकिन आरबीआई ने इस रकम का इस्तेमाल करने का वादा किया है और यह सीधा संकेत ओएमओ खरीदारी की तरफ देता है। हालांकि इन सभी बातों से बान्ड बाजार पर कोई असर नहीं हुआ। बॉन्ड बाजार आपूर्ति के मोर्चे पर दबाव कम करने के लिए कुछ ठोस उपायों की उम्मीद कर रहा था। चालू वित्त वर्ष के लिए सरकार की सकल उधारी 80,000 करोड़ रुपये बड़ाकर 13.5 लाख करोड़ रुपये कर दी गई है। अगले वर्ष सकल उधारी 12 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया है। बैंकिंग प्रणाली की कुल परिसंपत्तियों में बॉन्ड की हिस्सेदारी तय 18 सीमा से अधिक 30 प्रतिशत हो गई है।

अगर पिछले दशक के उधारी कार्यक्रमों पर नजर दौड़ाएं तो इससे पता चलता है कि बैंकिंग प्रणाली के लिए यह कितना चुनौतीपूर्ण रहा है। वर्ष 2010 में सकल उधारी 4.2 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया था, जो 2011 में थोड़ा बढ़ गया और अगले छह वर्षों के दौरान 2017 तक 5 लाख करोड़ रुपये से 5.9 लाख करोड़ रुपये के बीच रहा। 2018 में यह 6.6 लाख करोड़ रुपये का स्तर पार कर गया। 2019 में यह कम होकर 5.96 लाख करोड़ रुपये रह गया और 2020 में बढ़कर 7 लाख करोड़ रुपये हो गया।

दो बॉन्ड के लिए सभी बोलियां अस्वीकार कर आरबीआई ने यह संकेत दिया है कि वह प्रतिफल बढऩे नहीं देगा। हालांकि यह चालू वित्त वर्ष की शेष अवधि और अगले वित्त वर्ष में सरकार की भारी उधारी के लिए राह आसान बनाने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। प्राथमिक डीलरों के कमीशन में भारी इजाफा पूरी कहानी बयां करता है। पहले 100 रुपये मूल्य के बॉन्ड पर 1 पैसे से भी कम कमीशन मिलता था जो अब बढ़कर 40 वर्ष की अवधि के बॉन्ड के लिए 44 पैसे पहुंच गया है। दो अन्य बॉन्ड के लिए (जिनके लिए सभी बोलियां अस्वीकार हुई थीं) कमीशन 22 से 24 पैसे हो गया। इससे साफ हो जाता है कि प्राथमिक डीलर बॉन्ड खरीदने और अपने पास रखने में किस हद तक जोखिम ले रहे हैं। सामान्यत: बाजार आरबीआई गवर्नर के रुख पर बाजार अपनी रणनीति तय करता है लेकिन सरकार की उधारी का आकार देकर बाजार की दिलचस्पी कम हो रही है। जब आरबीआई गवर्नर नकदी स्थिति सहज करने का अपना वादा पूरा करेंगे तो बाजार की दिलचस्पी फिर बढ़ जाएगी। 

Keyword: बॉन्ड बाजार, आरबीआई, एमपीसी, प्रतिफल, नीलामी, प्रतिभूति, ओएमओ, एचटूएम,
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