बिजनेस स्टैंडर्ड - हारी हुई जंग में उलझी सरकार
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हारी हुई जंग में उलझी सरकार

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  February 07, 2021

कृषि सुधार कानूनों को लेकर जारी प्रदर्शन तीसरे महीने में दाखिल हो चुके हैं। हम यहां पर छह प्रमुख तथ्य सूचीबद्ध कर सकते हैं:

1. कृषि कानून किसानों और भारत दोनों के लिए काफी हद तक अच्छे हैं। तमाम मौकों पर अधिकांश राजनीतिक दल एवं नेता इन बदलावों की बात करते रहे हैं। हालांकि आपमें से कई लोग अब भी इनसे असहमत हो सकते हैं। लेकिन यह एक वैचारिक लेख है।

2. किसानों के लिए अब यह मायने नहीं रखता है कि ये कानून अच्छे हैं या नहीं। एक लोकतंत्र में सबसे ज्यादा अहम यह होता है कि किसी नीतिगत बदलाव से प्रभावित होने वाले लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं? और इस मामले में उत्तरी राज्यों के किसानों की राय महत्त्वपूर्ण है। अगर आप उन्हें समझाने में नाकाम रहे हैं तो फिर तथ्य मायने नहीं रखते हैं।

3. मोदी सरकार जब कहती है कि अब मामला कृषि कानूनों का ही नहीं रह गया है तो वह सही है। इसकी वजह यह है कि अब कोई भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) एवं मंडियों का जिक्र नहीं कर रहा है। फिर यह मुद्दा किस चीज का है?

4. इसका संक्षिप्त जवाब है कि अब मामला राजनीति का है। और ऐसा क्यों न हो? क्या राजनीति के बगैर लोकतंत्र मुमकिन हो सकता है? जब संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सत्ता में था तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भारत-अमेरिका परमाणु सहयोग समझौते से लेकर बीमा में विदेशी निवेश जैसे तमाम अच्छे कामों का विरोध करती थी। लेकिन आज वह छह गुना तेजी से उन्हीं नीतियों को लागू करने में जुटी है।

5. जहां तक कृषि कानूनों का सवाल है तो मोदी सरकार पहले ही यह लड़ाई हार चुकी है। एक बार फिर आप इससे असहमत हो सकते हैं। लेकिन मैं इस पर अपने तर्क पेश करूंगा।

6. आखिर में, मोदी सरकार के पास दो विकल्प हैं। वह इसे बढऩे का मौका देकर इसे एक बड़े राजनीतिक युद्ध में तब्दील कर सकती है। या फिर वह अपने नुकसान को सीमित करते हुए किनारे उतर सकती है।

यहां पर कुछ ऐसे साक्ष्य हैं जो हमें बताते हैं कि मोदी सरकार इन कृषि कानूनों पर जारी जंग हार चुकी है। सबसे पहला, इन कानूनों पर अमल को 18 महीनों के लिए टालने का एकतरफा प्रस्ताव सरकार की तरफ से रखा गया है। अब से 18 महीनों की गिनती की जाए तो फिर 2024 का आम चुनाव आने में 18 महीने ही बाकी रहेंगे। यह भी देखना होगा कि क्या मोदी-शाह की जोड़ी उस समय इस मसले को फिर से खोलना चाहेगी? असल में, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं राजस्थान में होने वाले चुनाव भी सिर्फ 12 महीने ही दूर होंगे। इनमें से दो राज्यों में कांग्रेस सरकारें हैं और तीसरे राज्य में भी भाजपा की खरीदी एवं चोरी की हुई सत्ता ही है। कोई भी यह जोखिम नहीं लेगा कि कृषि कानूनों पर इन राज्यों को गंवा दिया जाए। फिर तो ये कानून पानी में पड़ी लाश की ही तरह बेकार हो चुके होंगे।

सरकार एमएसपी व्यवस्था को जारी रखने की प्रतिबद्धता पहले ही जता चुकी है। इस मसले पर इतना कुछ दे देने के बाद कृषि कानूनों पर जंग तो हारी जा चुकी है।

अब मोदी सरकार की चुनौती यह है कि इसे किस तरह पेश किया जाए कि जंग में उसकी हार न दिखे। हमें पता है कि नए भूमि अधिग्रहण कानून के मामले में वह एक बार बच चुकी है। लेकिन वह मामला तो संसद तक सीमित था। यह मामला सड़क पर आ चुका है, राजमार्ग बाधित हो रहे हैं, दिल्ली के चारों ओर दायरा बढ़ रहा है। यह अभी और फैल सकता है। अगर सरकार समर्पण कर देती है तो मामला बंद हो सकता है लेकिन फिर राजनीति बढ़ जाएगी। हो भी क्यों नहीं? लोकतंत्र प्रतिस्पद्र्धी राजनीति, निष्ठुर, न्यायप्रिय एवं तमाशे के सिवाय क्या है? फिर अगला निशाना नए श्रम कानूनों से लेकर एलआईसी की हिस्सेदारी बिक्री जैसे दूसरे सुधार होंगे।

पिछले 35 वर्षों की सबसे ताकतवर सरकार को इस मुकाम पर ला खड़ा करने वाली गलतियां या भयंकर भूलें कौन सी हैं? मैं ऐसे पांच कारण गिनाउंगा:

1. अध्यादेश के जरिये कृषि कानूनों को लाना एक भयंकर गलती थी। मैं 20-20 नजरिये से कहता हूं लेकिन मैं एक टिप्पणीकार हूं, कोई नेता नहीं हूं। 50 करोड़ से अधिक आबादी की जिंदगी को एक झटके में बदल देने वाले किसी कानून को लाने का सही तरीका यह होता कि पहले उसकी चर्चा की जाती। हमें नहीं मालूम है कि मोदी को क्या अब इसकी जमीनी तैयारी नहीं करने का कोई मलाल है? लेकिन सच तो यही है कि लोग अध्यादेश के जरिये किए गए बदलावों को लेकर व्यापक स्तर पर सशंकित होंगे। खासकर तब जब आप उन लोगों से बात भी नहीं कर रहे हो।

2. इन कानूनों को राज्यसभा में पारित कराने के ढंग ने भी संदेह बढ़ाने का काम किया। इसके लिए जबानी शोर-शराबे से कहीं अधिक बेहतर संसदीय कौशल की जरूरत थी। इन कानूनों को पारित कराने के ढंग ने ऐसी हवा बनाने का काम किया कि अधिक उपज पैदा कर रहे किसानों पर कुछ खतरनाक चीज थोपी जा रही है।

3. भाजपा बहुमत की लहर पर इस कदर सवार थी कि उसे अपने सहयोगियों एवं दोस्तों की भी फिक्र नहीं रही। अगर उसने उन्हें भरोसे में लिया होता तो राज्यसभा में इसे पारित कराने का ढंग इतना भद्दा न होता। कम-से-कम अकाली दल को तो उसे कभी नहीं खोना चाहिए था। लेकिन हम पहले भी कह चुके हैं कि यह भाजपा पंजाब या सिखों को समझती ही नहीं है।

4. इसने हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट समुदाय की हताशा को भी कम करके आंका। वहां के जाट मोदी एवं शाह की राजनीति में पहले ही खुद को कमजोर महसूस कर रहे थे। मोदी सरकार में शामिल वरिष्ठतम जाट नेताओं को राज्य मंत्री ही बनाया गया है। एक सुदूर बाड़मेर से आते हैं तो दूसरे नेता पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के संजीव बाल्यान हैं जहां हाल ही में टिकैत समर्थक किसानों की महापंचायत हुई है। हरियाणा में भाजपा के पास कोई महत्त्वपूर्ण जाट नेता नहीं है। इसके उलट वह जाटों को कमजोर करना अपनी बड़ी उपलब्धि मानती आई है। भाजपा नेताओं ने हरियाणा में आरक्षण मुद्दे पर हुए हिंसक जाट आंदोलन से भी कुछ नहीं सीखा। उस समय भी जाटों के भीतर गुस्सा खुद को सियासी रूप से दरकिनार किए जाने का था और आज भी वह एक मुद्दा है। भाजपा के जाट सहयोगी दुष्यंत चौटाला या उत्तर प्रदेश का कोई भी जाट सांसद या विधायक कृषि कानूनों की खूबियां क्यों नहीं गिना रहा है? वे इसका साहस ही नहीं जुटा पा रहे।

5. भाजपा ने किसान नेताओं के साथ बातचीत में बहुत जल्द ही एकतरफा ढंग से कई बातें मान लीं। अब उसके पास देने को बहुत कुछ बचा ही नहीं है। दूसरी तरफ किसान नेताओं ने कुछ भी नहीं गंवाया है।

निष्कर्ष के तौर पर देखें तो मोदी सरकार के लिए आगे का रास्ता क्या है? एक तरीका किसानों को थकाने का हो सकता है। लेकिन ऐसा होने की संभावना कम ही है। रबी फसलों की कटाई 75 दिन दूर है और बहुत सारा काम मशीनी हार्वेस्टर एवं प्रवासी मजदूरों के ही आसरे होने से किसानों के परिवार प्रदर्शन में शामिल होने के लिए खाली होंगे।

अगली अपेक्षा यह होगी कि जाट आखिरकार एक समझौते के लिए राजी हो जाएं। यह मुमकिन है। हमें सिंघु एवं गाजीपुर बॉर्डर के बीच के फर्क  पर भी गौर करना होगा। कोई नेता सेल्फी खिंचवाने के लिए भी सिंघु नहीं जा सकता है। लेकिन गाजीपुर में कोई भी जा सकता है और टिकैत के साथ गलबहियां करते हुए तस्वीर खिंचवा सकता है। कांग्रेस, वामदल, रालोद, राजद, आप सब नजर आ रहे हैं। सुखबीर सिंह बादल भी पंजाब के सिख भाइयों से मिलने के लिए सिंघु न जाकर गाजीपुर आते हैं। जहां भी राजनीति एवं नेता हैं वहां संघर्ष समाधान संभव है। लेकिन इसके हकीकत हो जाने पर क्या होगा?

यह भारत एवं मोदी सरकार दोनों के ही लिए सबसे खतरनाक नतीजे लेकर आएगा। यह पंजाब के सिखों को मुश्किल में डाल देगा। दिल्ली की सीमाओं पर तारबंदी की तस्वीरें और कुछ मशहूर हस्तियों के ट्वीट पर सरकार की दंभ-भरी प्रतिक्रिया मुद्दे को कृषि कानून के बजाय राष्ट्रीय एकता के मुद्दे के रूप में पुनर्परिभाषित करने का खतरा पैदा करती है। अगर किसानों के प्रदर्शन की जगह सिख आतंकवाद की सुर्खियां बनने लगती हैं तो वह मोदी सरकार की बहुत बड़ी भूल होगी। संकट का हल निकालने के लिए राजनीतिक समझ के साथ शासन के कौशल की जरूरत है। लेकिन भाजपा के पास इनमें से कोई भी नहीं है। इसके बजाय भाजपा के पास चुनाव जीतने वाली मशीन पर सवार होने से हासिल राजनीतिक कौशल और शासन का जोड़ ही है। वह भारतीय राजनीति की वास्तविकता स्वीकार करने और उसे इस मुकाम तक लाने वाली संसदीय बहुमत की सीमाओं की प्रशंसा करने में नाकाम रही है।  

हम नहीं कह सकते हैं कि उसके पास इस स्थिति से निकलने की समझदारी एवं अक्लमंदी है या नहीं। लेकिन हम इसकी उम्मीद जरूर करते हैं क्योंकि भारत एकदम नहीं चाहेगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले पर वह एक और जंग छेड़े। आप पागल ही होंगे जो 1993 में दफन किए जा चुके मुद्दे को फिर से खोलेंगे।

Keyword: किसान प्रदर्शन, कृषि कानून, एमएसपी, परमाणु सहयोग समझौता, विदेशी निवेश,
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