बिजनेस स्टैंडर्ड - कृषि कानून: किसान आंदोलन का नया रणक्षेत्र बना पश्चिमी यूपी
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Wednesday, August 04, 2021 08:41 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम जिरह खबर

कृषि कानून: किसान आंदोलन का नया रणक्षेत्र बना पश्चिमी यूपी

संजीव मुखर्जी /  February 02, 2021

गणतंत्र दिवस पर जब हजारों किसानों ने बैरिकेड तोड़कर मध्य दिल्ली की घेराबंदी की और लाल किले तक पहुंच गए, उसके एक दिन बाद बुधवार को कई विरोध स्थलों पर काफी सन्नाटा पसरा रहा। हालांकि आधिकारिक तौर पर ज्यादातर विरोध कर रहे संगठनों ने आंदोलन को शांतिपूर्वक जारी रखा और महात्मा गांधी के शहादत दिवस 30 जनवरी को एक दिन के उपवास के साथ अपनी योजना बनाते रहे। हालांकि, पर्दे के पीछे कई लोगों का कहना था कि गणतंत्र दिवस का हिंसात्मक प्रदर्शन उनके दो महीने से अधिक समय से चल रहे विरोध की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है।

विरोध प्रदर्शन में भाग लेने वाले मुख्य संगठनों में से एक अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) ने कहा, 'विरोध यहां से और तेज होगा और हम 26 जनवरी को हुई हिंसा की निष्पक्ष जांच की मांग करते हैं। हम मजबूती के साथ कहते हैं कि जब तक तीनों कृषि अधिनियमों को निरस्त नहीं किया जाता और न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी अधिकार बनाने के लिए एक कानून नहीं बनाया जाता, तब तक हमारा संघर्ष जारी रहेगा।' भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) नेता राकेश टिकैत के विरोध प्रदर्शन के स्थल गाजीपुर में किसानों को यह रिपोर्ट मिली है कि उन्हें 26 जनवरी के प्रदर्शनकारियों को उकसाने में उनकी कथित भूमिका के लिए गिरफ्तार किया जा सकता है। रिपोर्टों में कहा गया है कि टिकैत द्वारा भावनात्मक लहजे में उत्पीडऩ का आरोप लगाते हुए सरकार द्वारा उन्हें और उनके समर्थकों को मारने की कोशिश करने की बात कही है, गाजीपुर सीमा पर भीड़ कई गुना बढ़ गई है।

उनके भाई नरेश टिकैत ने मुजफ्फरनगर में किसानों की एक महापंचायत के बाद मजबूत प्रतिक्रिया दी है। अपनी ओर से, केंद्र सरकार ने भी कानूनों के बारे में और बातचीत रोक दी है। सूत्रों का कहना है कि किसान नेताओं के साथ बैठक के पिछले अंतिम दौर में सरकार द्वारा की गई पेशकश वर्तमान परिस्थितियों में सबसे बेहतर उपाय था। उसमें सरकार ने 18 महीने तक कानूनों को रोकने के लिए लिखित तौर पर उच्चतम न्यायालय में हलफनामा देने के लिए कहा था।  

हालांकि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद एवं आर्थिक समीक्षा  ने कृषि कानूनों का बचाव किया है। अधिकारियों का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कार्यान्वयन दो महीने के लिए रोक दिया गया है और एक उच्च स्तरीय समिति अधिनियमों की समीक्षा कर रही थी। ऐसे समय में सरकार यही कर सकती है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'यह मामला अब उच्चतम न्यायालय में है, जिसने इसके क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है। हम अपने स्तर पर अभी इतना ही कर सकते हैं।'

उनका कहना हैं कि अगर कार्यान्वयन में कुछ साल की देरी हो जाती है, जैसा कि केंद्र द्वारा प्रस्तावित किया गया था, तो कानून बने रहेंगे और फिर यह अधिनियमों पर गौर करने वाली समिति पर निर्भर करेगा। अधिकारी का कहना है कि इस समय का उपयोग कानूनों को और अधिक किसान-हितैषी बनाने और सभी संदेहों को दूर करने के लिए किया जा सकता है। उत्तर भारत में रबी फसल की कटाई अगले कुछ हफ्तों में शुरू होने वाली है और किसान विरोध प्रदर्शन को पूरा समय नहीं दे पाएंगे, जो सरकार के हित में हो सकता है। इस समय काटी जाने वाली प्रमुख फसलों में गेहूं, चना और सरसों हैं जो पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के मौजूदा विरोध करने वाले क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर उगाई जाती हैं।

कृषि मंत्रालय की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, इस सीजन में लगभग 346.3 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूं बोया गया है, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में लगभग 3 प्रतिशत अधिक है, जबकि चने के लिए यह 112 लाख हेक्टेयर (4.37 प्रतिशत अधिक) और सरसों के लिए लगभग 73.4 लाख हेक्टेयर (7.03 प्रतिशत अधिक) है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की इकाई भारतीय किसान संघ (बीकेएस) के अखिल भारतीय महासचिव बदरी नारायण चौधरी का कहना है कि कृषि कानूनों का विरोध अब किसानों का आंदोलन नहीं रहा और अब यह राजनीतिक हो गया है, वरना आप लोगों को हथियार उठाते हुए नहीं देखते।

उनका कहना है कि केंद्र और किसानों दोनों के लिए एकमात्र रास्ता सभी शेष मुद्दों को सुलझाने के लिए बातचीत की मेज पर आना है।

काफी हद तक विरोध प्रदर्शनों से बाहर रहे राजनीतिक दल अब आंदोलन में शामिल होने लगे हैं। शुरुआती दिनों में कई लोगों ने इसका विरोध किया था। इसके पीछे, अगले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में होने वाले चुनाव भी हो सकते हैं, जिसके चलते राजनीतिक दल अपना अपना पक्ष रख रहे हैं। गाजीपुर प्रकरण के बाद, कई विपक्षी नेताओं ने अब किसानों के समर्थन में विरोध स्थलों पर जाना शुरू कर दिया है।

Keyword: कृषि कानून, किसान आंदोलन, गणतंत्र दिवस, विरोध प्रदर्शन,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या आईपीओ की मूल्य निर्धारण प्रक्रिया में बदलाव है जरूरी?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.