बिजनेस स्टैंडर्ड - योगी का उभार और डूबता उत्तर प्रदेश
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योगी का उभार और डूबता उत्तर प्रदेश

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  January 31, 2021

यदि राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरने के मामले में नरेंद्र  मोदी को कोई चुनौती मिल रही है तो वह उनकी ही पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिल रही है। उस दिन की प्रमुख सुर्खियों पर गौर कीजिए जिस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र  मोदी ने दावोस में इस वर्ष आभासी ढंग से आयोजित होने वाले विश्व आर्थिक मंच को संबोधित किया। आपको पता चला इसकी कितनी चर्चा हुई? दरअसल उस दिन पूरी बहस किसानों का विरोध प्रदर्शन सुर्खियों में रहा और मानो इतना ही काफी नहीं था कि योगी आदित्यनाथ की पुलिस द्वारा छह वरिष्ठ संपादकों और प्रमुख राजनेताओं के खिलाफ देशद्रोह और साजिश की प्राथमिकी ने और अधिक सुर्खियां बटोरीं।

अगले दिन भी यह खबर मीडिया के उस हिस्से में सुर्खियों में रही जिसे लेकर मोदी-शाह की भाजपा बहुत सजग रहती है और वह है सोशल मीडिया। सोशल मीडिया पर नजर आ रहे राजनीतिक रुझानों में से अधिकांश उत्तर प्रदेश पर केंद्रित थे। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तो मानो योगी के हर कदम का अनुसरण करने की ठान ली है। वहां भी ऐसे ही ट्वीट के चलते कुछ पत्रकारों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई। बड़ी कृपा यह रही कि वहां देशद्रोह की धारा यानी भारतीय दंड संहिता की धारा 124 नहीं लगाई गई।

योगी आदित्यनाथ का मूल नाम अजय सिंह बिष्ट है और वह मौजूदा उत्तराखंड में पैदा हुए थे। मार्च 2017 में वह सबको चकित करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उनका चयन चौंकाने वाला था क्योंकि तब तक कोई उन्हें मोदी-शाह के ताज के सबसे जड़ाऊ रत्न के रूप में नहीं देख रहा था। उन्हें बाहरी माना जाता था। उन्हें राज्य के एक क्षेत्र में एक इलाके के नेता के रूप में देखा जाता था। यानी उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल इलाके में गोरखपुर और उसके आसपास के जिले। वह मूल रूप से भाजपा या आरएसएस से भी ताल्लुक नहीं रखते। वह गोरखनाथ मठ की परंपरा से आते हैं जो हिंदू महासभा से जुड़ा रहा है। उन्होंने हिंदू युवावाहिनी बनाई। भारतीय राजनीति के लिहाज से वह एकदम युवा भी थे। मुख्यमंत्री बनते वक्त उनकी उम्र महज 45 वर्ष थी। मोदी-शाह को लुटियन दिल्ली के पंडितों को चौंकाने में बहुत आनंद आता है। इसलिए सभी अटकलों को धता बताते हुए उन्होंने योगी को चुना।

चार वर्ष बाद वह लगातार सुर्खियां बटोर रहे हैं: हाथरस से बदायूं, बरेली से बिजनौर,  बुलंदशहर से कन्नौज और साक्षी महाराज, विकास दुबे और अब नई दिल्ली से लिखे कुछ ट्वीट के बाद देशद्रोह की प्राथमिकी दर्ज होने के बाद मोदी-शाह को सोचना चाहिए कि उनका चयन सही था या नहीं। खासकर यह देखते हुए कि प्रदेश चुनावी वर्ष में प्रवेश कर रहा है। बात को आगे बढ़ाते हुए हमें तीन पुराने संदर्भों का जिक्र करना होगा। पहला संदर्भ सबसे तात्कालिक है। द प्रिंट के राजनीतिक संपादक डीके सिंह ने एक आलेख लिखा कि कैसे योगी अब भाजपा के अन्य मुख्यमंत्रियों तथा भावी नेताओं के आदर्श बन चुके हैं।

दूसरा संदर्भ उस आलेख का है जो मैंने दिसंबर 2018 में लिखा था और कहा था कि नोटबंदी नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में योगी का चयन मोदी की सबसे बड़ी गलती है। मैंने लिखा था कि उनको केवल ध्रुवीकरण करना आता है और वह वही करेंगे।  परंतु इस प्रक्रिया में शायद वह राज्य पर से नियंत्रण खो दें और मोदी के लिए 2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में जीतना और मुश्किल कर दें। राजनीतिक विश्लेषक जब गलत होते हैं तो वे पाठकों अपनी बात याद दिलाना उचित नहीं समझते। परंतु सच तो यही है कि मैंने कहा था कि योगी के रहते उत्तर प्रदेश में मोदी के लिए 80 में से 50 सीट पाना भी मुश्किल है लेकिन उन्हें 60 सीट जीतने में कामयाबी मिली।

तीसरा संदर्भ भी मेरे ही आलेख का है जो मैंने 2017 के उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान गोरखपुर से लिखा था। मैंने एनडीटीवी के प्रणय रॉय और दोराब सोपारीवाला के साथ योगी से उनके मठ में बातचीत की थी। मैंने पूछा था कि क्या उत्तर प्रदेश को छोटे-छोटे राज्यों में बांटा जाना चाहिए। योगी ने बहुत आपत्ति नहीं जताई। जब उनसे पूछा गया कि क्या उनमें से एक प्रदेश यानी पश्चिमी उत्तर प्रदेश का नाम हरित प्रदेश होना चाहिए? तो उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं होना चाहिए। योगी का कहना था कि ऐसा करना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा होगा। इस बात को आसानी से समझा जा सकता है। परंतु 23 करोड़ की आबादी वाले प्रदेश में अगर कहीं हर पांचवां आदमी मुसलमान है तो वह है पश्चिमी उत्तर प्रदेश। इस क्षेत्र में अल्पसंख्यकों की तादाद काफी अच्छी है। जब हमने पूछा कि क्या पूर्वी उत्तर प्रदेश या पूर्वांचल को अलग राज्य बनना चाहिए। मुझे याद है कि इस सवाल के जवाब में उनकी आंखें चमक उठीं। तब मैंने लिखा था वह उस छोटे से राज्य के मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं।

मेरी दोनों बातें गलत साबित हुईं। मोदी उत्तर प्रदेश में दोबारा जीते और गोरखपुर में हमारी चर्चा के कुछ ही दिन बाद योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए। मैं जितना गलत था, डीके सिंह उतने ही सही साबित हो रहे हैं। योगी भाजपा के अन्य मुख्यमंत्रियों तथा भावी नेताओं के आदर्श हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि उन्हें मेरा या आपका आदर्श होना चाहिए लेकिन यदि आप भाजपा के वर्तमान ताकतवर नेताओं की गिनती करेंगे तो आप पहले की तरह मोदी, शाह और मोहन भागवत का नाम नहीं ले सकते। अब आपको योगी का नाम शामिल करना होगा। शायद भागवत से ऐन पहले।

सच यही है कि योगी आज जो करते हैं, भाजपा के अन्य नेता वही काम बाद में करते हैं। वह इकलौते ऐसे नेता हैं जो सुर्खियां बटोरने में मोदी को टक्कर दे सकते हैं। किसी भी राज्य के भाजपा नेता से पूछिए कि वे कौन से तीन वक्ता हैं जो भीड़ जुटाने में सक्षम हैं और वे किन नेताओं को चाहते हैं? ऐसे नेताओं में मोदी के बाद योगी का नाम आएगा। इसमें आने वाले समय का संकेत छिपा है। तीसरा नाम तेजस्वी सूर्या का है। जाहिर है हम भाजपा की राजनीति की बात कर रहे हैं। हालांकि उन्हें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे आगे नहीं माना जा रहा था लेकिन उन्हें यह पद सौंपे जाने पर पार्टी में काफी उत्साह देखने को मिला। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि जाति आधारित दलों की हार हुई थी और माना जा रहा था कि राज्य को ऐसा नेता मिला है जो पारिवारिक दायित्वों से मुक्त है और वह इसे दशकों के पराभव से उबार सकता है। अखबारी सुर्खियों से आप जान सकते हैं कि वहां कानून प्रवर्तन के हालात क्या हैं।

माना यह भी जा रहा था कि वह राज्य की आर्थिक तस्वीर बदल देंगे। ऐसा लगता है कि अखिलेश यादव के कार्यकाल की दूसरी छमाही में गतिरोध टूटा था। राज्य का सकल घरेलू उत्पाद 2015-16 में 8.85 फीसदी की दर से विकसित हुआ और 2016-17 में यह दर 10.87 फीसदी रही। योगी ने मार्च 2017 में कार्यभार संभाला जब नया वित्त वर्ष शुरू होने को था। अगले तीन साल तक वृद्धि दर में गिरावट आई और वह 2017-18 के 7.24 फीसदी से कम होकर 2018-19 में 5.3 प्रतिशत और 2018-19 में 4.38 फीसदी रहा। उनके कार्यकाल के आरंभिक तीन वर्ष में वृद्धि दर आधी रह गई। महामारी वाले इस वर्ष की बात ही क्या।

इन बातों के बावजूद उन्हें भाजपा का भविष्य माना जा रहा है। वह इकलौते भाजपा नेता हैं जो अपने दम पर कदम उठा सकते हैं। वह धु्रवीकरण करने में सबसे आगे हैं। यदि मोदी और शाह ने कांग्रेस मुक्त भारत का सपना देखा था तो वह मुस्लिम मुक्त उत्तर प्रदेश के विचार पर काम कर रहे हैं, यानी वह पांच करोड़ भारतीयों को हाशिये पर धकेलना चाहते हैं।

उनके जैसा व्यक्तित्व, ताकत और राजनीति किसी और की नहीं है। उन्होंने उत्तर प्रदेश की बेहतरी के लिए कुछ खास नहीं किया है लेकिन अगर मोदी और शाह को 2022 में दोबारा उत्तर प्रदेश और 2024 में पूरा देश जीतना है तो उन्हें योगी की जरूरत होगी। यह इस बात का संकेत है कि मोदी के अधीन भी भाजपा की राजनीति में ऐसा बदलाव आया है जो योगी आदित्यनाथ पर केंद्रित है।

Keyword: उत्तर प्रदेश, नरेंद्र मोदी, योगी आदित्यनाथ, मीडिया, संपादक,
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