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समाचार माध्यमों पर विज्ञापनों का वर्चस्व समाप्त करने का वक्त

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  January 24, 2021

अर्णव गोस्वामी और पार्थो दासगुप्ता की सार्वजनिक हुई बातचीत को लेकर जो तमाशा हुआ है उससे एक बात स्पष्ट है। अब वक्त आ गया है कि समाचार मीडिया में विज्ञापन को लेकर एकाधिकार समाप्त किया जाए और सबस्क्रिप्शन आधारित राजस्व पर जोर दिया जाए। ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (बार्क) के संस्थापक सीईओ दासगुप्ता और रिपब्लिक टीवी के संस्थापक गोस्वामी पर आरोप है कि उन्होंने टेलीविजन रेटिंग के साथ छेड़छाड़ की। मुंबई पुलिस के आरोपपत्र में दोनों के बीच की व्हाट्सऐप चैट 500 पन्नों में है। विपक्ष ने मामले की जांच संयुक्त संसदीय समिति से कराने की मांग रखी है। दोनों की बातचीत राजनीति और मीडिया के गठजोड़ पर रोशनी डालती है। बातचीत यह भी दिखाती है कि समाचार प्रसारक दर्शकों के आंकड़ों को लेकर बेहद बेसब्र हैं। रेटिंग से जुड़ा घोटाला दरअसल एक बड़ी समस्या का प्रमाण है। वह यह कि समाचार मीडिया विज्ञापनों पर निर्भर है इसलिए वह अपने पक्ष में झूठे आंकड़े पेश करने की फिराक में रहता है। देश के 400 से अधिक समाचार चैनलों ने सन 2019 में विज्ञापनों से 3,000 करोड़ रुपये की राशि अर्जित की। जाहिर है यह एक ऐसा उद्योग है जहां तमाम ब्रांड बड़ी तादाद में लोगों का ध्यान अपनी ओर चाहते हैं। दर्शकों के यही आंकड़े विज्ञापनदाताओं के सामने रखे जाते हैं। भारतीय समाचार चैनलों पर तो खराब पत्रकारिता के लिए वैश्विक अध्ययन किया जाना चाहिए। इन चैनलों पर प्रस्तोता घृणा और गलत जानकारियों का प्रसार करते हैं।

29,570 करोड़ रुपये का समाचार पत्र उद्योग अपने कुल राजस्व का 70 प्रतिशत विज्ञापनों से हासिल करता है। समाचार पत्र अपनी उत्पादन लागत का कुछ हिस्सा अपनी कीमत से वसूल कर पाते हैं। अधिकांश समाचार पत्र अपने प्रसार के आंकड़ों को लेकर चिंतित रहते हैं और वे अपनी पाठक या प्रसार संख्या बरकरार रखने का हरसंभव प्रयास करते हैं। हालांकि मोटे तौर पर देश के अखबार खबरों का ही प्रकाशन करते हैं और उनके समक्ष टेलीविजन की तरह विश्वसनीयता का संकट नहीं उत्पन्न हुआ है।

ऑनलाइन समाचार कारोबार के बारे में अनुमान लगाना मुश्किल है और उसे सारा राजस्व विज्ञापनों से ही मिलता है। ऑनलाइन समाचार माध्यमों में पेज व्यू या यूनिक विजिटर (किसी सामग्री को पढ़ा जाना और नए पाठक) को लेकर कोई स्पष्ट मानक नहीं है। वेबसाइट और ऐप खुद को सबसे बड़ा बताने के लिए अपने सर्वर के डेटा को अपनी पसंद से इस्तेमाल करते हैं।

सन 1990 के दशक के अंत में जब समाचार ऑनलाइन माध्यमों की ओर स्थानांतरित हो रहे थे तब यही अपेक्षा थी कि गहरी रिपोर्टिंग क्षमता वाले समाचार पत्र भले ही ऑफलाइन पाठक और राजस्व खो दें लेकिन वे जल्दी ही उसे ऑनलाइन वापस पा जाएंगे। ऐसा नहीं हुआ। गूगल और फेसबुक ने समाचारपत्रों की सामग्री को एकत्रित करके लाभ उठा लिया। परिणामस्वरूप अमेरिका में कुल डिजिटल विज्ञापनों में 56 फीसदी उनके पास जाता है। बाकी हिस्से में बड़ा भाग एमेजॉन के पास जाता है। एक दशक से अधिक समय से अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों में समाचारपत्रों के प्रकाशक इसके खिलाफ हैं।

भारत में विज्ञापनदाताओं ने 2019 में जो 22,100 करोड़ रुपये ऑनलाइन खर्च किए, उसका 70 प्रतिशत गूगल और फेसबुक के पास गया। चूंकि प्रिंट माध्यम दो अंक में बढ़ रहे थे इसलिए 25 प्रतिशत के परिचालन मार्जिन से काम करने वाले प्रकाशकों ने बहुत तवज्जो नहीं दी। परंतु गत दो-तीन साल में प्रसार वृद्धि कमजोर हुई है। महामारी के आगमन के बाद अखबारों का प्रसार और विज्ञापन राजस्व डूब गया जबकि अधिकांश अखबारों के ऑनलाइन पाठक 5 से 10 गुना बढ़ गए। प्रसार संख्या दोबारा बढ़ रही है लेकिन ज्यादातर अखबारों के ऑनलाइन पाठकों में वृद्धि बरकरार है। अधिकांश प्रकाशक दो काम कर रहे हैं।

पहला, वे अखबारों की कीमत बढ़ा रहे हैं और दूसरा अंग्रेजी, हिंदी या अन्य भाषाओं के प्रकाशक अपने ई-पेपर के लिए तथा तमाम ऑनलाइन सामग्री के लिए सबस्क्रिप्शन मॉडल पर काम कर रहे हैं। बड़े ब्रांड धीरे-धीरे अपनी वेबसाइट पर सामग्री को प्रतिबंधित कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि पाठक इसके लिए भुगतान करें और उन्हें कम से कम 50 प्रतिशत राजस्व इस तरह हासिल हो।

मनोरंजन जगत में यह फॉर्मूला कामयाब रहा है। बड़ी कंपनियां सीधे उपभोक्ताओं से जुड़ रही हैं। टेलीविजन चैनलों के लिए भुगतान हो या नेटफ्लिक्स, एमेजॉन प्राइम वीडियो जैसी स्ट्रीमिंग या थिएटर, दर्शक विशिष्ट और उच्च गुणवत्ता वाली सामग्री के लिए भुगतान करके प्रसन्न हैं।

देश के टेलीविजन प्रसारक नियामकीय नियंत्रण के कारण कीमत बढ़ाने और कार्यक्रमों में निवेश करने में सफल नहीं रहे। फिल्मों और स्ट्रीमिंग कंपनियों ने सीधे उपभोक्ताओं से जुडऩे का मॉडल अपनाया। द न्यूयॉर्क टाइम्स, द इकनॉमिस्ट और फाइनैंशियल टाइम्स, जैसे ब्रांड भी इसमें कामयाब रहे। भारत में बहुत छोटे पैमाने पर इस समाचार पत्र अथवा व्यापार समाचार वेबसाइट द केन ने इसे अपनाया है।

कीमत बढ़ाकर या सबस्क्रिप्शन से राजस्व बढ़ाना अच्छी खबर है। यदि समाचार मीडिया का 50-60 फीसदी राजस्व भुगतान से आए तो वह अधिक स्वतंत्र रह सकेगा। इससे वे विज्ञापनदाता भी आकर्षित होते हैं जिन्हें आंकड़ेबाजी नहीं बल्कि विशिष्ट पाठक चाहिए। यानी रेटिंग, पाठक संख्या और विज्ञापनदाताओं पर निर्भरता कम होगी और बेहतर पत्रकारिता पर यकीन बढ़ेगा। देश के शीर्ष हिंदी प्रकाशकों में से कई अब शोध और विषय विशेषज्ञता पर ध्यान दे रहे हैं ताकि विशिष्ट पाठकों को अपने साथ जोड़ सकें। इस प्रक्रिया में बतौर पाठक और दर्शक हमें शामिल होना होगा। पश्चिम में द गार्जियन जैसे ब्रांड इसलिए वापसी कर सके क्योंकि यह मान्यता बनी कि अच्छी पत्रकारिता को फंड करने और उसे कुटिल मालिकों और विज्ञापनदाताओं से मुक्त करने की जरूरत है। भारत में भी पाठकों का योगदान धन जुटाने का स्वीकार्य माध्यम है।

यह आसान नहीं है लेकिन यदि देश के बड़े मीडिया घराने ऐसा कर सकते हैं तो यह देखने लायक घटनाक्रम होगा।

Keyword: समाचार माध्यम, विज्ञापन, वर्चस्व, अर्णव गोस्वामी, बार्क,
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