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बेहतर निगरानी आवश्यक

संपादकीय /  January 24, 2021

देश के वित्तीय तंत्र में गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। ऋण देने वाले संस्थान के रूप में वे बैंकिंग तंत्र की कमी को पूरा करती हैं और इसे इस क्षेत्र की वृद्धि से भी समझा जा सकता है। सन 2010 में जहां एनबीएफसी का आकार बैंकिंग परिसंपत्तियों के 12 प्रतिशत के बराबर था, वहीं अब यह उसका एक चौथाई हो चुका है। इस विस्तार ने जहां अर्थव्यवस्था की सहायता की, वहीं इस क्षेत्र में नियमन कम होने के कारण व्यवस्थागत जोखिम भी बढ़ सकता है। कुछ एनबीएफसी की बैलेंस शीट का आकार काफी बड़ा है।

इस संदर्भ में देखें तो क्षेत्र का नियामकीय ढांचा मजबूत करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने गत सप्ताह एक परिचर्चा पत्र प्रकाशित किया है। ये प्रस्ताव सही दिशा में हैं। उदाहरण के लिए सन 2006 में आरबीआई ने इस क्षेत्र के लिए विशिष्ट नियमन प्रस्तुत किए और इसके एक हिस्से को व्यवस्थागत दृष्टि से महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया। इस क्षेत्र में पूंजी पर्याप्तता और जोखिम मानक लागू किए गए। सन 2014 में एक बार फिर एनबीएफसी की विभिन्न श्रेणियों में नियामकीय आवश्यकताओं को संशोधित किया गया। बीते पांच वर्ष में एनबीएफसी ने न केवल महत्त्वपूर्ण वृद्धि हासिल की है बल्कि वे वित्तीय तंत्र में सबसे बड़ी विशुद्ध ऋणदाता बन चुकी हैं। इससे उच्च व्यवस्थागत जोखिम को लेकर चिंता बढ़ी है। उदाहरण के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज लिमिटेड के पतन के कारण भी तंत्र को काफी क्षति पहुंची जिससे बड़ी और छोटी दोनों एनबीएफसी प्रभावित हुईं। ऐसे दोहराव से बचा जाना चाहिए। अब आरबीआई ने परिमाण आधारित नियमन और चार स्तरों वाली परिकल्पना पेश की है जिसे पिरामिड के रूप में देखा जा सकता है। सबसे निचले या बुनियादी स्तर में ऐसी फर्म शामिल होंगी जो व्यवस्थागत दृष्टि से महत्त्वपूर्ण न हों और जिन्हें न्यूनतम नियामकीय हस्तक्षेप की आवश्यकता हो। व्यवस्थागत महत्त्व की सीमा को बढ़ाकर 1,000 करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव है। यदि यह सीमा बढ़ाई जाती है तो कुल 9,425 गैर जमा वाली एनबीएफसी में से 9,200 इस श्रेणी में आ जाएंगी। प्रस्तावित नियामकीय बदलाव इन कंपनियों को बहुत अधिक प्रभावित नहीं करेंगे हालांकि विशुद्ध स्वामित्व वाले फंड की आवश्यकता दो करोड़ रुपये से बढ़कर 20 करोड़ रुपये हो जाएगी। मध्यम स्तर में व्यवस्थागत महत्त्व वाली गैर जमा और जमा लेने वाली एनबीएफसी शामिल होंगी। इस श्रेणी में कड़े संचालन मानक और जोखिम की निगरानी शामिल होगी। इस स्तर की फर्म को मुख्य अनुपालन अधिकारी की नियुक्ति करनी होगी।

उच्चतर स्तर में सीमित एनबीएफसी होंगी जहां जोखिम प्रबंधन के लिए बैंक जैसे कड़े नियमन होंगे। इस श्रेणी की कंपनियों का निर्धारण अंत:संबंधों, जटिलता, नकदी की स्थिति और गतिविधियों की प्रकृति से होगा। इस श्रेणी में 25 से 30 संस्थान होंगे जिनमें शीर्ष 10 शामिल होंगे। उच्च स्तर की एनबीएफसी को अनिवार्य रूप से सूचीबद्ध होना होगा। सबसे ऊपरी स्तर रिक्त रहेगा और नियामक उन कंपनियों को वहां रखेगा जिन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होगी। इस स्तर पर नियामकीय संबद्धता अधिक होगी।

आरबीआई पूंजी, संचालन और निगरानी ढांचे को मजबूत बनाने पर ध्यान दे रहा है ताकि जोखिम कम किया जा सके। परंतु अधिकांश एनबीएफसी अभी भी न्यूनतम नियामकीय हस्तक्षेप के साथ प्रगति कर सकेंगी। कुल मिलाकर प्रस्ताव इस क्षेत्र के लिए सकारात्मक होने चाहिए। बेहतर नियमन से बाजार का भरोसा मजबूत होगा। नियामकीय मनमानी में कमी आने से बड़ी एनबीएफसी बैंक भी बन सकती हैं। इसके साथ ही आरबीआई को निगरानी क्षमता बढ़ाने की भी आवश्यकता है। जरूरी नहीं कि हाल के वर्षों में बैंकों और एनबीएफसी की नाकामी का कारण नियामकीय कमजोरी रही हो। बेहतर निगरानी से भी नुकसान रोका जा सकता था।

Keyword: निगरानी, वित्तीय तंत्र, एनबीएफसी, ऋण, बैंकिंग तंत्र,
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