बिजनेस स्टैंडर्ड - चीन की प्राथमिकताएंऔर भारत की स्थिति
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चीन की प्राथमिकताएंऔर भारत की स्थिति

श्याम सरन /  January 20, 2021

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) के केंद्रीय आर्थिक कार्य सम्मेलन (सीईडब्ल्यूसी) की सालाना बैठक 16 से 18 दिसंबर तक आयोजित की गई। इसमें इस बात का व्यापक संकेत मिलता है कि चीन अपने आर्थिक हालात का आकलन कैसे करता है और चालू वर्ष में उसकी प्राथमिकताएं क्या हैं। सन 2021 खासतौर पर महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह वर्ष सीपीसी की स्थापना की 100वीं वर्षगांठ वाला वर्ष भी है। यह 14वीं पंचवर्षीय योजना का पहला वर्ष भी है और इस दौरान न केवल कोविड-19 महामारी के नकारात्मक प्रभावों से उबरने की चुनौतियों को ध्यान में रखना होगा बल्कि बाहरी राजनीतिक और आर्थिक माहौल में व्याप्त अनिश्चितता और उथलपुथल पर भी ध्यान देना होगा। पुरानी घोषणाओं के दोहराव के अलावा इस बात के भी स्पष्ट संकेत हैं कि चीन का नेतृत्व नए वर्ष में किन बातों को अपनी ताकत के रूप में देखता है और किन्हें कमजोरी के रूप में।

सीईडब्ल्यूसी की रिपोर्ट घरेलू मांग आधारित तथा निर्यात एवं निवेश आधारित अर्थव्यवस्था की बात कहती है। आदर्श स्थिति में ये सभी कारक एक दूसरे को ताकत प्रदान करते हैं। परंतु सीईडब्ल्यूसी का कहना है कि मौजूदा दौर में जब बाहरी स्तर पर इतनी अनिश्चितता है तब एक नए घटनाक्रम में घरेलू वितरण प्रभावी होगा। सरकारी स्वामित्व वाले उपक्रमों की भूमिका भविष्य में और मजबूत होगी और वे राष्ट्रीय सामरिक तकनीक को मजबूत करने और नवाचार को बढ़ावा देने में मददगार साबित होंगे। राष्ट्रीय सामरिक तकनीक ऐसी तकनीक हैं जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अहम हैं। इनमें कृत्रिम मेधा, सेमीकंडक्टर और उच्च तकनीक वाले उद्योगों में काम आने वाले अन्य घटक शामिल हैं।

एक अन्य क्षेत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा काफी अहमियत रखती है और वह है औद्योगिक आपूर्ति शृंखलाओं को नियंत्रित रखने की राज्य की स्वतंत्र क्षमता को मजबूत बनाना। विदेशी कंपनियों के नियंत्रण वाली विस्तारित आपूर्ति शृंखलाओं में केवल एक कड़ी बनने के बजाय चीन स्वयं की आपूर्ति शृंखलाओं का नेतृत्व करना पसंद करेगा। आर्थिक साझेदारों के कारण होने वाली उथलपुथल का शिकार होने की आशंका के बजाय वह ऐसी स्थिति में रहना चाहेगा जहां आपूर्ति शृंखलाओं में पारस्परिक निर्भरता हो ताकि इसका इस्तेमाल चीन के सुरक्षा हितों को बढ़ाने में किया जा सके। शी चिनफिंग ने एक अन्य संदर्भ में कहा कि चीन को सक्षम होना होगा ताकि अपने आर्थिक संपर्कों की राजनीतिक लागत अपने साझेदारों पर डाल सके। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दंडात्मक व्यापारिक कदमों के साथ वह ऐसा कर चुका है। आर्थिक पारस्परिक निर्भरता को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की इस कोशिश को समझना होगा और इसका प्रतिरोध करना होगा।

एक अन्य तत्त्व एकाधिकार विरोधी शमन और नियमविरुद्ध पूंजी विस्तार निरोध से ताल्लुक रखता है। यहां इशारा चीन के निजी कॉर्पोरेट क्षेत्र की ओर है और यह सरकारी उपक्रमों को बढ़ावा देने का विपरीत पक्ष है। इस नीति को नियामकीय निगरानी के आलोक में तथा टेनसेंट तथा अलीबाबा जैसी अत्यधिक कामयाब हाई-टेक और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ उठाए गए कदमों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उनके तेज विस्तार और चीन में उनके व्यापक आर्थिक और सामाजिक प्रभाव को सीपीसी के प्रभुत्व को चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। भुगतान कारोबार से परे फिनटेक कारोबार में अलीबाबा के प्रवेश को भी चीन सरकार की सॉवरिन डिजिटल करेंसी तथा चीनी बैंकों को बिचौलिया बनाकर राष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था कायम करने के प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जाने लगा। वित्तीय स्थिरता को लेकर भी चिंता हो सकती है। एक दलील यह है कि निजी हाई टेक कंपनियों का आकार इतना बड़ा हो गया है कि अगर वे नाकाम हुए तो अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा झटका लगेगा। परंतु राजनीतिक कारक भी महत्त्वपूर्ण हैं। संदेश एकदम स्पष्ट है: चीन के निजी क्षेत्र को सीपीसी के नेतृत्व और निगरानी में काम करना होगा। ऐसे में विदेशी उपक्रम चीन की निजी कंपनियों के साथ चाहे जो सौदा करें, चीन की सरकार और सीपीसी उसमें जरूर रुचि रखेगी।

सीईडबल्यूसी द्वारा चिह्नित एक अन्य प्राथमिकता वाले क्षेत्र खाद्य सुरक्षा एवं कृषि क्षेत्र को लेकर भी सुरक्षा चिंताएं हैं। चीन का कृषि उत्पादन उल्लेखनीय है लेकिन वह खाद्यान्न तथा अन्य कृषि उत्पादों मसलन सोयाबीन का सबसे बड़ा आयातक भी है। वह बीफ, पोर्क और पोल्ट्री उत्पादों का भी प्रमुख आयातक है। वर्ष 2014 से ही उसका सालाना खाद्यान्न आयात 10 करोड़ टन रहा है। सन 2020 में तो यह सन 2019 के आयात से 30 गुना अधिक रहा। आमतौर पर कीमतें स्थिर रहती हैं लेकिन इसके बावजूद खाद्य मुद्रास्फीति चिंता का विषय है। पोर्क की कीमत जो खासी संवेदनशील मानी जाती है, उसमें काफी इजाफा हुआ है क्योंकि आपूर्ति कमजोर रही है। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता सूची में रखा गया है। उन्नत बीज और जेनेटिक शोध के माध्यम से उपज बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। अनाज भंडारण क्षमता बढ़ाने और कृषि भूमि को बरकरार रखने का प्रयास किया जा रहा है। खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 12 करोड़ हेक्टेयर का न्यूनतम रकबा सुनिश्चित करने की बात कही गई है। पुरानी नीतिगत घोषणाओं से भी कुछ बातें चुनी गई हैं। इनमें जलवायु परिवर्तन संबंधी प्रतिबद्धता दोहराना शामिल है। इसके अलावा घरेलू मांग को बढ़ाना और स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सार्वजनिक सेवाओं में खपत के जरिये सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इजाफा करना शामिल है।

हालांकि इस बात का कोई संकेत नहीं है कि सरकार घरेलू मांग बढ़ाने के लिए कोई प्रोत्साहन पैकेज देने जा रही है। स्थिर राजकोषीय नीति और विवेकपूर्ण मौद्रिक नीति पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। इस बात को लेकर संतुष्टि का भाव है कि चीन इकलौती अर्थव्यवस्था है जो 2020 में सकारात्मक रहेगी और 2021 में जिसके 8 फीसदी की दर से विकसित होने की आशा की जा रही है। किसी और अर्थव्यवस्था के साथ ऐसा नहीं है। चीन ने आपूर्ति क्षेत्र की बाधा उत्पन्न होने उनके चीन से दूरी बनाने की आशंकाओं को झूठा साबित कर दिया है। बल्कि इनके चालू रहने में चीन पर निर्भरता बढ़ी है। कम से कम पूर्वी और दक्षिण पूर्वी एशिया के मामले में तो ऐसा ही है। चीन के आरसेप में साझेदार बनने तथा बेल्ट और रोड पहल को लगातार बढ़ावा देने के कारण एशिया और विश्व में वृद्धि के वाहक की उसकी भूमिका और मजबूत होगी। सीईडब्ल्यूसी ने यह भी दोहराया कि चीन प्रशांत पार साझेदारी के लिए व्यापक एवं प्रगतिशील समझौते का सदस्य बनना चाहता है। नए साल में चीन के दबदबे के बीच भारत को एशियाई आर्थिक जगत में अपनी जगह बनानी है। आत्मनिर्भर भारत को इस हकीकत से दो चार होना होगा।

(लेखक पूर्व विदेश सचिव एवं सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर फेलो हैं)
Keyword: चीन, भारत, प्राथमिकता, सीपीसी, सीईडब्ल्यूसी, निर्यात, निवेश,
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