बिजनेस स्टैंडर्ड - नव वर्ष में भारत की दो चुनौतियां
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नव वर्ष में भारत की दो चुनौतियां

जैमिनी भगवती /  January 05, 2021

समाप्त हुए कैलेंडर वर्ष 2020 को सामूहिक स्मृति में कोविड-19 महामारी की वजह से पैदा हुए जबरदस्त आघात के लिए याद रखा जाएगा। मध्य दिसंबर 2020 तक दुनिया भर में इस जानलेवा वायरस ने करीब 17 लाख लोगों की जान ली है और इसकी वजह से लगे गहरे झटके से उबरकर फिर से वृद्धि की राह पर आने में अर्थव्यवस्थाओं को एक दशक भी लग सकता है। बीते साल साम्यवादी चीन ने भारत के प्रति अपनी गहराई तक समाई दुश्मनी को खुलकर जाहिर कर दिया। भले ही यह नीति-कुशल नहीं था लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मई 1998 के नाभिकीय परीक्षणों को सही ठहराते समय चीन के खतरे से निपटने को लेकर सही समझ रखते थे।

भारतीय अर्थव्यवस्था की बेडिय़ों पर गौर करें तो छह साल पहले बड़े दीर्घकालिक ऋण को चुकाने में कंपनियों की नाकामी और उसकी वजह से सार्वजनिक बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) में वृद्धि देखी गई थी। उसके बाद से नाकाम उद्यमों के मालिकों की चालबाजियों से ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) को बार-बार आघात का सामना करना पड़ा है। भारतीय ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया बोर्ड ने पुनर्भुगतान में चूक से जुड़े मामलों के निपटान की कोशिश की है लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक, सरकार एवं अदालतें पर्याप्त रूप से एकनिष्ठ नहीं होने की सूरत में जानबूझकर देरी से सब निष्फल हो जाता है। दुर्भाग्य से कुछ समाधान पेशेवर भी चूक करने वाली कंपनियों की ही जमात में शामिल हैं।

अगर केंद्र सरकार दीर्घावधि की बैंक उधारी में जान फूंकने को लेकर गंभीर है तो उसे चरित्र एवं जरूरी विशेषज्ञता वाले नियामकीय प्रमुखों की पहचान करने की जरूरत है। सरकार को बड़ी कंपनियों से दूर-दूर तक भी किसी तरह का रिश्ता रखने वाले अधिकारियों को अमूमन इन पदों पर नियुक्त नहीं करना चाहिए। कानूनी ढांचे में सुधारों की शिनाख्त सापेक्षिक रूप से सरल है। क्रियान्वयन के मामले में यह दलीय संबद्धता से परे सियासी रसूखदारों के सामूहिक स्व-हित के आगे कमजोर पड़ा है।

बहरहाल कृषि में सुधार से संबंधित तीन कानून संसद द्वारा पारित किए जाने के विरोध में जारी किसानों का मौजूदा प्रदर्शन इसका ज्वलंत उदाहरण है कि सार्थक सुधार को भी कुछ लोग किस तरह गलत समझ सकते हैं और इसके विरोध में खड़े हो सकते हैं? कांग्रेस पार्टी के तीव्र विरोध एवं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खुलेआम इन कानूनों की प्रतियां फाडऩे जैसे अटपटे व्यवहार के बारे में कम कहना ही बेहतर है। लंबे समय से बिजली एवं उर्वरक पर सब्सिडी देने का नतीजा नकदी फसलें उगा सकने वाले इलाकों में गेहूं, चावल एवं गन्ने की अतिरिक्त पैदावार के रूप में निकला है। यह खाद्यान्न पैदा करने वाले किसानों की सापेक्षिक गरीबी को समझने का सुनिश्चित तरीका है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार को कानून पारित करने के पहले बुनियादी बिंदुओं के बारे में समझाने और किसानों के लिए इनके फायदे बताने के लिए हर भाषा में उपलब्ध मंच का इस्तेमाल करना चाहिए था। मसलन, खेती में लगे 41 फीसदी परिवारों के पास एक एकड़ से भी कम कृषि-योग्य जमीन हैं और भारत पानी की ज्यादा खपत वाली फसलों (चावल एवं गन्ने) का अधिक उत्पादन कर रहा है। जहां तक विदेश नीति का सवाल है तो हर देश अपने हिस्से का केक खाना चाहता है। भारत के लिए अमेरिका एवं पश्चिमी लोकतांत्रिक देश एक तरफ हैं तो चीन और रूस दूसरी तरफ हैं। लद्दाख क्षेत्र में चीन की सशस्त्र घुसपैठ और चीन को पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर रूस की खासी निर्भरता ने भारत के विकल्पों को सीमित कर दिया है। रूस की 1.2 लाख करोड़ डॉलर जीडीपी वाली अर्थव्यवस्था जिंसों पर काफी हद तक केंद्रित है और इसके निर्यात में 60 फीसदी हिस्सेदारी तेल एवं गैस की है। तेल कीमतें मार्च 2020 से ही भारी गिरावट पर हैं जिससे रूस की आर्थिक चिंताएं बढ़ी हैं। भारत को पश्चिमी लोकतंत्रों के साथ अधिक तालमेल बिठाने की जरूरत है। बौद्धिक संपदा अधिकारों, भारतीय पेशेवरों की अधिक खुली आवाजाही और वैश्विक तापमान जैसे मुद्दों पर काफी कुछ कहा जाएगा लेकिन इन पर काम किया जा सकता है।

खास तौर पर 9 दिसंबर को रूस के विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोव ने कहा था कि हिंद-प्रशांत की अवधारणा के जरिये अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया मिलकर हिंद-प्रशांत रणनीतियों को प्रोत्साहन देकर भारत को चीन-विरोधी खेल में शामिल करना चाहते हैं। लावरोव को भारत की चिंताओं के बारे में कहीं अधिक संवेदनशील होना चाहिए था, खासकर लद्दाख में घटित घटनाओं के बाद। इसमें कोई शक नहीं है कि भारत के लिए रूस उन्नत रक्षा उपकरणों एवं संवेदनशील क्षेत्रों में गोपनीय तकनीकों का एक भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता रहा है। रूस ने भारत को ऐसे रक्षा उपकरण एवं तकनीक मुहैया कराई हैं जो जी-7 देश या तो देने को नहीं तैयार थे या फिर उनके दाम काफी अधिक थे। भारत ने अमेरिकी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए हाल ही में रूस से एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली खरीदने का करार किया है।

भले ही चीन के साथ संबंधों को एक हद तक सामान्य बनाने के लिए हरसंभव कोशिश करने की जरूरत है लेकिन भारत के पास अपनी रक्षा क्षमता को एक साथ दो मोर्चों पर जंग लडऩे लायक बनाने के सिवाय कोई चारा नहीं है। नतीजतन, भारत के रक्षा बजट को 1.5 फीसदी जीडीपी स्तर से बढ़ाकर कम-से-कम 2 फीसदी तक ले जाना चाहिए। भारत को उत्तर अटलांटिक संधि संगठन के साथ औपचारिक 'संवाद'  संबंध कायम कर नजदीकी संपर्क की अपनी चाहत दर्शानी चाहिए। रूसी चिंताओं को दूर करने के लिए भारत इस बात पर जोर दे सकता है कि रूस मध्य एशिया में सर्वश्रेष्ठ होने का हकदार है और शांघाई सहयोग संघ के भीतर भी इसे जाहिर किया जा सकता है। भारत रूस के सुदूर पूर्व में श्रमशक्ति तैयार करने में मदद की पेशकश कर सकता है क्योंकि रूस उस क्षेत्र में चीनी श्रमिकों पर बढ़ती निर्भरता को लेकर फिक्रमंद है।

साफ-साफ कहें तो मध्य एशियाई देश रूसी भालू के चंगुल से बचने और आग उगलने वाले चीनी ड्रैगन की आर्थिक गतिविधियों को बेअसर करने के लिए भारतीय हाथी की तरफ देखते हैं। रूस की सापेक्षिक रूप से कम एवं गिरती हुई आबादी उसे चीन की तुलना में कम खतरनाक बनाती है। अगर चीन मध्य एशियाई देशों में अपने कुछ श्रमिक बसाता है तो उससे वहां की स्थानीय जनांकिकी बदल जाएगी और वहां की सरकारें चीन की तरफ झुकने लगेंगी। किर्गिजस्तान एवं कजाकस्तान की आबादी क्रमश: 64 लाख एवं 1.86 करोड़ है और चीन के साथ इनकी सीमाएं क्रमश: 1,063 एवं 1,783 किलोमीटर लंबी हैं।

सार रूप में कहें तो भारत की घरेलू मूर्खताएं अक्सर आधी-अधूरी अक्लमंद आर्थिक एवं विदेश नीतियों से भी ध्यान भटका देती हैं। मसलन, देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश का वर्ष 2018-19 में प्रति व्यक्ति वार्षिक राज्य घरेलू उत्पाद 66,152 रुपये ही था जो सबसे निचले पायदान पर मौजूद बिहार से महज एक क्रम ऊपर था। तमिलनाडु एवं पश्चिम बंगाल के लिए यही आंकड़ा क्रमश: 193,964 एवं 101,138 रुपये था। इसके बावजूद इस महामारी काल में भी उत्तर प्रदेश की सरकार अंतर-धार्मिक युगलों को तंग करने के लिए 'लव-जिहाद' अध्यादेश पारित करने का वक्त निकाल लेती है।

(लेखक पूर्व भारतीय राजदूत, वित्त मंत्रालय के पूर्व अधिकारी एवं विश्व बैंक ट्रेजरी के पेशेवर हैं)

Keyword: नव वर्ष, चुनौतियां, महामारी, नाभिकीय परीक्षण, एनपीए, आईबीसी,
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