बिजनेस स्टैंडर्ड - कृषि सुधार: तीन कदमों वाली आपदा की कहानी
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कृषि सुधार: तीन कदमों वाली आपदा की कहानी

देवाशिष बसु /  01 01, 2021

केंद्र सरकार ने गत जून में कृषि क्षेत्र के सुधार के लिए तीन कानून लाने के प्रस्ताव को स्वीकृति दी। पहला कानून अनाज, दालों, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज एवं आलू की कीमतें भंडारण सीमा से मुक्त करने वाला था। दूसरा कानून किसानों को कहीं भी और किसी को भी अपनी उपज बेचने की छूट देता है। तीसरा कानून किसानों को अनुबंध खेती में शामिल होने की मंजूरी देता है। इन कानूनों से किसी परी-कथा जैसा नतीजा बेहतर कृषि ढांचे एवं बाजार पहुंच के रूप में निकलने की बात कही गई जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाई देगा। अभी लागू कृषि कानूनों के तहत किसान केवल कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) की मंडियों में लाइसेंसधारक कारोबारियों को ही अपनी उपज बेच सकते हैं। इन मंडियों पर स्थानीय नेताओं का ही कब्जा होता है जो इस कारोबार शृंखला से होने वाले अधिकतम लाभ को गटक जाते हैं। अब उम्मीद है कि नई व्यवस्था में कीमतों पर लगी तमाम बंदिशें हटने से किसानों को फायदा होगा। वहीं यह सपना देखा गया है कि अनुबंध खेती के जरिये किसानों को पूंजी एवं नई तकनीकें मिल पाएंगी। अथक दुष्प्रचार ने इस खुशनुमा तस्वीर में यकीन करने के लिए करोड़ों लोगों को भरमाने का काम किया है।

लेकिन सुधारों के नाम पर लाए गए इन कानूनों ने किसानों को संघर्ष की राह पर चलने के लिए उकसाया है। सत्तारूढ़ पार्टी की तरफ से प्रदर्शनकारियों को बदनाम करने के लिए सोशल मीडिया के जरिये लगाए गए तमाम आरोप, खंडन एवं स्पष्टीकरणों के बीच किसी को भी नहीं मालूम है कि कौन सा पक्ष सही है या किस पक्ष की दलीलें विवेकपूर्ण हैं। मुझे पता नहीं है कि मोदी सरकार ने किसानों के प्रदर्शन की तीव्रता का अंदाजा लगाया था या नहीं।

इन विरोध प्रदर्शनों से चाहे जिस तरह निपटा जाए, सरकार को इन कानूनों के क्रियान्वयन से जुड़े मुद्दों का निपटारा करना होगा। अगर इन कानूनों को राज्य सरकारों की गर्दन पर दबाव डालकर लागू कराया जाएगा तो किसानों को अधिक वाजिब भाव देने के लिए एक अधिक भरोसेमंद कारोबारी एवं भाव शिनाख्त व्यवस्था लागू करने के लिए मौजूदा समय की शोषणकारी एवं बाधक मंडी व्यवस्था से कहीं अधिक गंभीर कोशिश की जरूरत पड़ेगी। लेकिन कृषि उपजों का भाव इस मुद्दे का केवल एक पहलू है। किसानों को अपनी उपज की आपूर्ति करनी होगी और ऑर्डर पूरे करने के लिए उन्हें शुरू से अंत तक भौतिक वितरण की एक व्यवस्था बनानी होगी। कीमत एवं आपूर्ति दोनों को समर्थन देने के लिए हमें सख्त प्रावधानों वाले अनुबंधों की जरूरत होगी। ऐसे अनुबंधों को तेजी से, आसानी से एवं सस्ते में कौन लागू कराएगा? यह इस परी-कथा का वह हिस्सा है जो सबसे ज्यादा काल्पनिक नजर आता है और इसकी वजह से जबरदस्त तनाव पैदा हो सकता है। वित्तीय क्षेत्र में बनी स्थिति पर फौरी नजर डालने से ही पता चल जाएगा कि यह कितनी आपाधापी वाली स्थिति हो सकती है।

मनीलाइफ में हम उपभोक्ता वित्तीय क्षेत्र (म्युचुअल फंड, स्टॉक, बीमा, फिक्स्ड आय, ऋण) में 15 वर्षों से सेवाएं दे रहे हैं। इनमें से हरेक क्षेत्र का कड़ा नियमन होता है। हरेक फर्म को संबंधित नियामक के पास अपना पंजीकरण कराना होता है। हरेक पक्ष का आचरण अच्छी तरह से परिभाषित है। लगभग पूरा कारोबार ही तकनीक से संचालित होता है जिससे इसमें पूर्ण पारदर्शिता बरतना एवं घटनाक्रम का ब्योरा रख पाना संभव हो जाता है। इसमें प्रतिस्पद्र्धा बेहद कड़ी है। गलत काम करने वालों पर जुर्माने एवं हर्जाने के प्रावधान नियमों में ही वर्णित हैं। सभी फर्मों को आंतरिक शिकायत निपटान व्यवस्था बनाने के लिए कहने के साथ ही हरेक नियामक ने अपने स्तर पर भी बहुस्तरीय शिकायत निपटान व्यवस्था बनाई हुई है।

इसके बावजूद एक अंदरूनी शख्स होने के नाते हासिल जानकारी के आधार पर मैं पूरे भरोसे से कह सकता हूं कि जमीनी स्तर पर हालात भयानक रूप से उपभोक्ता के खिलाफ हैं। मैंने इन मुद्दों के बारे में अनगिनत बार लिखा है। आम तौर पर ताकतवर फर्में सरेआम  नुकसानदायक उत्पाद बेच रही हैं और वे उन्हें खरीदने के लिए उपभोक्ताओं को लुभाने के वास्ते वितरकों को प्रोत्साहन भी दे रही हैं। या फिर वे उपभोक्ताओं से मनमाने शुल्क लेती हैं जिनमें से कुछ तो खराब नियमन की वजह से कानूनी दायरे में भी होती हैं। पकड़े जाने पर वे या तो बेदाग छूट जाते हैं या फिर उन्हें मामूली जुर्माना ही भरना पड़ता है। इंसाफ का मतलब यह नहीं होता है कि हम कितने कानून एवं नियम बना सकते हैं। इसका मतलब यह है कि ताकत का गलत इस्तेमाल करने वाले लोगों को इसका भारी खमियाजा भुगतना पड़े। इसका इकलौता तरीका यही है कि त्वरित एवं कठोर सजा दी जाए जो दूसरों के लिए याद रखने लायक सबक हो और वे उससे सीख लें। लेकिन रसूखदार कंपनियों के दबदबे वाले नियामक उपभोक्ताओं को उनका पैसा वापस दिलाने के तरीके अपनाने या कठोर सजा देने के बारे में सोच भी नहीं पाते हैं। इस बात को परखने का माकूल तरीका यह है कि व्यवस्था बेचारे गरीब को इंसाफ दे पा रही है या नहीं। आज तो ऐसा नहीं हो पा रहा है।

धोखाधड़ी में अपने पैसे गंवाने के बाद उसकी वापसी के लिए मनीलाइफ फाउंडेशन की मदद लेने वाले लोगों में एक अव्वल गायक एवं अभिनेत्री, एक बड़ी विज्ञापन एजेंसी के प्रमुख, रिलायंस उत्पादों के एक बड़े वितरक, डॉक्टर एवं कुछ बैंकर भी शामिल रहे हैं। अब मुक्त बाजार की इस परी-कथा में एपीएमसी मंडी के बाहर ग्रामीण भारत में हुए एक लेनदेन के बारे में थोड़ा सोचिए जिसमें एक तरफ एक छोटा किसान है तो दूसरी तरफ बड़ा कृषि कारोबारी या कंपनी का ठेकेदार है। एक ऐसी व्यवस्था जिसमें न तो सुरक्षा का कोई उपाय है, न नियंत्रण एवं संतुलन के इंतजाम हैं और न ही बड़ी एवं ताकतवर पक्ष की गलत हरकत को साबित करने का कोई तरीका ही है। इससे भी बुरा यह है कि ऐसे लेनदेन के विवादित होने पर किसान अदालत भी नहीं जा पाएगा क्योंकि यह कानून इसकी इजाजत ही नहीं देता है। आम लोगों की नजरों से दूर जबरदस्त एवं एकतरफा शोषण होगा। मैं पहले भी इसका जिक्र कर चुका हूं कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के शासन वाले किसी राज्य में एक प्रायोगिक परियोजना चलाकर इन कानूनों के बारे में फीडबैक लिया जाए और उस आंकड़े का इस्तेमाल व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए किया जाए। लेकिन कुछ अजीब कारणों से यह सरकार इस तरीके को नहीं अपनाना चाहती है, भले ही इसके अपने बुद्धिजीवी यह दावा करते हैं कि फीडबैक लेकर क्रियान्वयन से जुड़े भूल-सुधार करना असल में शासन का एक नया तरीका है।

वास्तव में, मुझे अक्सर अचरज होता है कि यह सरकार आर्थिक मुद्दों पर क्या किसी भी तौर-तरीके का पालन करती भी है? आखिर ऐसा क्यों है कि अपने राजनीतिक उद्देश्यों के प्रति इतनी प्रतिबद्ध, समर्पित एवं व्यवस्थित तरीके से आगे बढऩे वाली वही टीम आर्थिक सुधारों पर इस कदर लडख़ड़ाने क्यों लगती है? रातोरात सियासी खेल के नियम बदल देने की काबिलियत रखने वाली एक टीम को कांग्रेस के आर्थिक विचार क्यों उधार लेने पड़ते हैं और नए-चमकदार नारों की चाशनी में लपेटकर उन्हें अपना बनाकर पेश करना पड़ता है? मैंने इस अजीब अवधारणा के बारे में कोई भी व्याख्या नहीं देखी है। मैंने तो सिर्फ कमजोर अफसरों और वित्त मंत्रियों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराकर ही इस सरकार के लिए खेद जताने की स्थिति देखी है। पिछले जून में मैंने इस बात पर कौतूहल जताया था कि तीन नए कृषि कानून क्या अब तक के सबसे बड़े सुधार साबित होंगे या महज दिखावा ही रह जाएंगे। अभी तो ये सुधार तीन कदमों वाली विपदा ही साबित हो रहे हैं।

(लेखक मनीलाइफ डॉट इन के संपादक हैं)

Keyword: कृषि कानून, अनाज, भंडारण, किसान, एपीएमसी, लाइसेंस,
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