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भारत के लिए 2021 की नीतिगत भूलभुलैया

राजेश कुमार /  December 31, 2020

नए साल में लिए जाने वाले नीतिगत निर्णय ही भारतीय अर्थव्यवस्था में रिकवरी की मजबूती एवं स्थायित्व को तय करेंगे। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं राजेश कुमार

 
कोविड-19 महामारी के नए मामलों में आई कमी और टीके के मोर्चे पर हालिया घटनाक्रम ने उम्मीदें जगाने का काम किया है। उम्मीद है कि ब्रिटेन में कोरोनावायरस की नई किस्म सामने आने से भी हालात में बहुत बदलाव नहीं होंगे। जहां 2021 के 2020 की तुलना में बेहतर होने की संभावना है, वहीं नीतिगत प्रबंधन काफी हद तक जटिल बने रहने के आसार हैं। नए साल में उठाए जाने वाले नीतिगत कदम ही भारतीय अर्थव्यवस्था में रिकवरी की मजबूती एवं टिकाऊपन को तय करेंगे। वर्ष 2021 का पहला बड़ा नीतिगत कदम निश्चित रूप से आम बजट होगा जो आगामी दिशा को काफी हद तक तय कर देगा। अर्थव्यवस्था कोविड से पैदा हुए गतिरोधों से उबर रही है और अधिकतर विश्लेषकों ने अपने वृद्धि पूर्वानुमानों को संशोधित करते हुए अपेक्षा से अधिक मजबूत होने की बात कही है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का मानना है कि अर्थव्यवस्था तीसरी तिमाही में ही संकुचन के दौर से बाहर निकल आएगी। 
 
भले ही अर्थव्यवस्था में सुधार का दौर जारी रहेगा लेकिन यह अगले वित्त वर्ष के अंत तक ही जाकर वर्ष 2019-20 के आउटपुट स्तर को दोबारा हासिल कर पाएगी। इस अनुमान का आगामी बजट पर निहितार्थ जरूर देखने को मिलेगा। केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष में अपना व्यय बहुत अधिक नहीं बढ़ाया है और इसकी संभावना बहुत कम है कि वह बजट पूर्वानुमान को बड़े अंतर से पार कर जाएगी। लेकिन राजस्व संग्रह के अनुमान से काफी कम रहने के आसार हैं। इस कमी को उधारी बढ़ाकर पूरा किया जा रहा है। भले ही राजस्व में अगले साल सुधार आना तय है लेकिन यह आधार आंकड़ा काफी कम होने की वजह से होगा। अक्टूबर तक राजस्व संग्रह बजट अनुमान का सिर्फ 34 फीसदी ही हो पाया था। व्यय में खासी बढ़ोतरी अगले वित्त वर्ष में भी घाटे को बढ़ाकर ही रखेगी और सार्वजनिक ऋण में भी बढ़ोतरी होगी। ऐसी स्थिति में सरकार से यह अपेक्षा होगी कि वह अगले साल से अपने वित्त को मजबूती देना शुरू करे और एक मध्यम-अवधि का राजकोषीय खाका पेश करे। लेकिन सार्वजनिक व्यय में तीव्र कटौती होने से रिकवरी पर भी बुरा असर पड़ सकता है।
 
इस पर भी बहस हो रही है कि क्या सरकार को राजकोषीय घाटा लक्ष्यों का एक दायरा रखना चाहिए? कम-से-कम मौजूदा समय में सरकार को ऐसे विचारों से दूर ही रहना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से संशय पैदा हो सकता है। बुनियादी कहानी यह है कि सरकार एक बड़े घाटे पर चल रही है और उसे इस समस्या का हल निकालने की जरूरत है। मौजूदा राजकोषीय घाटे के उच्च स्तर एवं बढ़ते सार्वजनिक ऋण ने सरकार को एक संकटपूर्ण साल में व्यय बढ़ाने से रोक रखा था। इस तरह गोलपोस्ट को पुनर्परिभाषित करने से काम नहीं चलेगा। यह बेहद अहम होगा कि सरकार यथार्थपरक तस्वीर पेश करे। राजस्व संग्रह के बारे में अव्यावहारिक मान्यताओं से चीजें सिर्फ जटिल होंगी और आगे चलकर व्यय में अचानक भारी कटौती की वजह से रिकवरी को भी संभावित तौर पर प्रभावित कर सकता है। 
 
जहां सरकार को कड़ा संतुलन साधने की जरूरत होगी, वहीं आरबीआई की नीतिगत राह कहीं अधिक मुश्किल होगी। भारतीय केंद्रीय बैंक ने पिछली कुछ तिमाहियों में काफी बोझ उठाया है और अब उसे बाजार में किसी तरह का व्यवधान डाले बगैर ही इन प्रोत्साहन कदमों को वापस लेने की प्रक्रिया भी शुरू करने की जरूरत होगी। अभी तक आरबीआई ने मुद्रास्फीतिकारी दबावों को कम करके आंका है। लंबे समय तक ऊंची मुद्रास्फीति होने से अपेक्षाएं प्रभावित हो सकती हैं और महंगाई पर लगाम की अंतिम लागत भी बढ़ सकती है। लेकिन महंगाई पर काबू पाने की कोशिशें संक्षिप्त अवधि में आर्थिक गतिविधियों को भी प्रभावित कर सकती हैं। 
 
आरबीआई ने वित्तीय प्रणाली में तरलता को इस हद तक बढ़ा दिया है कि अल्पावधि बाजार दरें नीतिगत पथ के काफी नीचे चली गई हैं। जहां बढ़ी हुई तरलता ने वित्तीय परिस्थितियों को सहज बनाया और सरकार एवं कारोबार जगत दोनों को ही बॉन्ड बाजार में रिकॉर्ड योग हासिल करने में मदद की, वहीं मौजूदा स्थिति को जारी नहीं रखा जा सकता है। उच्च तरलता एवं आसान ऋण परिस्थितियां मुद्रास्फीति जोखिमों को बढ़ा सकती हैं। लेकिन तरलता पर सख्ती बरतने से पैसे की लागत बढ़ेगी और तात्कालिक तौर पर इससे रिकवरी भी प्रभावित हो सकती है। हालांकि यह एक आसान फैसला नहीं होगा। आरबीआई को सरकारी उधारी भी संभालने की जरूरत है जिसके अगले वित्त वर्ष में भी अधिक रहने के आसार हैं। 
 
इसके अलावा भुगतान संतुलन अधिशेष अधिक होने एवं मुद्रा बाजार में आरबीआई के दखल से तरलता बढ़ी है। वैश्विक जिंस कीमतों में उछाल आने और आयात गतिविधियां फिर से तेज होने के साथ ही आर्थिक गतिविधि सुधरने से डॉलर की मांग बढ़ेगी लेकिन विदेशी मुद्रा आवक आगे भी मजबूत रहने की संभावना है। इसके फलस्वरूप आरबीआई को रुपये की कीमत चढऩे से रोकने के लिए मुद्रा बाजार में दखल का काम जारी रखना होगा। इससे घरेलू स्तर पर तरलता बढ़ेगी। अभी तक आरबीआई के पास 120 अरब डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार है। लेकिन अधिक मुद्रा भंडार होने की भी अपनी जटिलताएं हैं। लेकिन बाजार में दखल नहीं देने का नतीजा रुपये की कीमत में तीव्र बढ़ोतरी के रूप में निकलेगा जिससे न केवल भारत की बाह्य प्रतिस्पर्धा क्षमता प्रभावित होगी बल्कि अर्थव्यवस्था में लंबे समय तक असंतुलन की स्थिति भी पैदा हो सकती है। 
 
इस तरह मौजूदा हालात को देखते हुए आरबीआई को अल्पावधि में वृद्धि के जोखिम कम करते समय मुद्रास्फीति काबू में रखने की भी जरूरत होगी। बॉन्ड बाजार में किसी तरह का गतिरोध डाले बगैर तरलता कम करने एवं सरकारी उधारी के प्रबंधन की जरूरत होगी। इसके अलावा उसे यह भी सुनिश्चित करना है कि विदेशी मुद्रा आवक से रुपया तेज न हो जाए। रुपये का मूल्य किसी भी सूरत में वास्तविक संदर्भ में चढ़ा हुआ है। ऐसी स्थिति में आरबीआई को तरलता पर नजर रखनी होगी। उसे न केवल जटिल फैसले करने होंगे बल्कि उनका समय भी सही रखना होगा। निर्णय-निर्माण में विलंब के अपने दुष्प्रभाव भी होंगे। 
 
इसके अलावा आरबीआई का मुद्रास्फीति लक्ष्य भी वर्ष 2021 में समीक्षा का विषय बनेगा। सरकार संभवत: इस लक्ष्य को शिथिल करने के बारे में सोच रही है। अगर ऐसा होता है तो केंद्रीय बैंक वृद्धि पर अधिक ध्यान दे पाएगा। सरकार को एक सुविचारित नजरिया अपनाने एवं अल्पावधि जरूरतों से परे देखने की सलाह दी जाएगी। मुद्रास्फीति लक्ष्य को शिथिल करने से आरबीआई एवं उसकी मौद्रिक नीति समिति दोनों का ही रुख प्रभावित होगा। इसे उन्हें मुद्रास्फीति पर काबू पाने की अक्षमता के तौर पर देखा जा सकता है जो दीर्घकालिक लागत की वजह से भारतीय नीति प्रतिष्ठान की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करेगा। 
 
भले ही राजकोषीय एवं मौद्रिक नीति का आर्थिक परिदृश्य पर खासा असर होगा लेकिन कुछ अन्य पहलू भी हैं जो भारत के वृद्धि परिपथ को तय करेंगे। मसलन, किसानों के मौजूदा विरोध प्रदर्शन से निपटने के सरकार के तरीके का भावी आर्थिक सुधारों पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है। 
Keyword: covid, economy, growth,,
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