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भाजपा का नववर्ष संकल्प: हर चुनाव में जीत

राधिका रामशेषन /  December 31, 2020

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए साल 2020 का आगाज दिल्ली विधानसभा चुनाव में करारी हार के साथ हुआ। साल गुजरने के साथ कोविड महामारी ने दस्तक दी जिसके बाद लगाए गए लॉकडाउन में शहरों से लाखों की संख्या में प्रवासी कामगार अपने गृह राज्यों की तरफ लौटने के लिए मजबूर हुए जिनमें से तमाम लोगों को सैकड़ों मील का सफर तपती धूप में पैदल एवं साइकिल से ही तय करना पड़ा। इन घटनाओं ने केंद्र एवं वहां की सत्तासीन पार्टी दोनों को ही परेशान रखा। साल 2020 को भाजपा जीत के पास पहुंचकर भी चूक जाने के लिए याद करेगी। लेकिन वह बिहार में पूरे उत्साह से चुनाव लड़ रहे राष्टï्रीय जनता दल (राजद) से कड़ी टक्कर मिलने के बावजूद अपने सहयोगी जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के साथ मिलकर किसी तरह सरकार बनाने में सफल रही। भाजपा के लिए संतोषजनक बात यह रही कि उसे गठबंधन सरकार के भीतर जदयू पर बढ़त मिल गई। पार्टी को एक बड़ी उपलब्धि तेलंगाना में भी मिली। भाजपा ने वृहत्तर हैदराबाद नगर निगम के चुनाव में सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्टï्र समिति (टीआरएस) को मात देने के करीब पहुंच गई थी और विधानसभा की एक सीट के उपचुनाव में उसे हरा ही दिया। 

 
भाजपा ने साल की आखिरी विजयी पताका जम्मू कश्मीर में पुनर्गठन के बाद हुए पहले जिला विकास परिषद के चुनाव में जम्मू क्षेत्र में शानदार जीत के साथ फहराई।  सवाल है कि भाजपा के समक्ष 2021 में किस तरह की चुनौतियां हैं? पार्टी के एक महासचिव के मुताबिक पश्चिम बंगाल के दंगल, किसानों के प्रदर्शन के समाधान और हरेक चुनाव में जीत के लिए तैयार रहने के वास्ते संगठन के भीतर संरचनात्मक बदलाव करना अहम चुनौतियां हैं। इन प्राथमिकताओं से उस धारणा की पुष्टि होती है कि भाजपा के लिए चुनावी जीत शासन चलाने से अगर अधिक नहीं तो उसके बराबर अहमियत जरूर रखता है। राष्टï्रीय सचिव एवं उत्तर प्रदेश के मामले देख रहे वाई सत्य कुमार कहते हैं, 'हम पूरे देश में हरेक विधानसभा क्षेत्र के भीतर बूथ स्तर, शक्ति केंद्र एवं मंडल स्तर पर खुद को मजबूत बनाने में जुटे हुए हैं। यह काम पूरा होने तक हम कोई शिथिलता नहीं बरतेंगे। यह रोजाना 18 घंटे काम करने जैसा है।'
 
आंध्र प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल के कुछ इलाकों का जिम्मा संभाल रहे राष्टï्रीय सचिव सुनील देवधर की मानें तो केंद्र सरकार की नीतियों एवं फैसलों के बारे में विपक्ष द्वारा फैलाई गई गलत धारणाओं को दुरुस्त करना सबसे बड़ी परीक्षा है। देवधर कहते हैं, 'प्रधानमंत्री के फैसले एवं नीतियां सही भावना के साथ संकल्पित हैं लेकिन उनकी गलत ढंग से व्याख्या की जा रही है। हमारी सोशल मीडिया टीम एवं जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए चुनौती है कि इन कदमों को सही परिप्रेक्ष्य में पेश करें और इससे भी अहम है कि इन कदमों के फायदे समाज के आखिरी इंसान तक पहुंचाए जा सकें।'
 
प्रधानमंत्री मोदी ने गत 25 दिसंबर को किसानों के लिए 2,000 रुपये भुगतान की अंतिम किस्त जारी की। यह प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) योजना के तहत छोटे एवं सीमांत किसानों को दी जाने वाली कुल 6,000 रुपये की मदद राशि की आखिरी किस्त थी। इस कार्यक्रम का भाजपा ने व्यापक प्रचार-प्रसार किया और मंच पर टीवी लगाकर इसे आम जनता को सुनाया भी गया। पार्टी को उम्मीद है कि इससे कृषि सुधार कानून पारित होने के बाद बनाई जा रही भाजपा की किसान-विरोधी छवि से निपटने में थोड़ी मदद मिलेगी। हालांकि पार्टी नेताओं को यकीन नहीं है कि इस कदम से वाकई में प्रदर्शनकारियों का गुस्सा शांत करने में कोई मदद मिलेगी या नहीं।  हालांकि सूचना एवं प्रसारण और पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर दावा करते हुए कहते हैं, 'इस सरकार ने किसानों को इतना कुछ दिया है और उनकी असली मांगों को पूरा किया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था जारी रहेगी और कृषि उत्पाद विपणन समिति की मंडी व्यवस्था के बारे में भी यही बात लागू होगी।' जावडेकर ने बिज़नेस स्टैंडर्ड के साथ बातचीत में कहा, 'सरकार ने किसानों के साथ बातचीत जारी रखने की अपनी मंशा जाहिर की है और इस बातचीत से समस्याओं का समाधान निकलेगा।'
 
चुनावी परिदृश्य के बारे में भाजपा सूत्र इसकी तस्दीक करते हैं कि नए साल में पार्टी के लिए पूर्व एवं दक्षिण भारत केंद्र में होंगे जहां पार्टी को अभी अपनी जमीन मजबूत करनी है। पार्टी के राज्यसभा सदस्य एवं भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के अध्यक्ष विनय सहस्रबुद्धे कहते हैं, 'हमारी रणनीति यह है कि बहुत मुफीद नहीं माने जाने वाले इलाकों में भी हम अच्छे नतीजे हासिल करें। इन जगहों पर हमने पहले अधिक निवेश नहीं किया था। पश्चिम बंगाल उनमें से ही एक राज्य है।' बंगाल में भाजपा के लिए खासे समर्थन (गृहमंत्री अमित शाह के हालिया दौर पर यह नजर भी आया) और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से कुछ बड़े नामों को अपने पाले में लाने के बावजूद पार्टी द्वि-ध्रुवीय चुनाव होने की संभावना से परेशान नजर आ रही है। भाजपा सूत्रों के मुताबिक सबसे बड़ी चिंता चुनाव के द्वि-धु्रवीय होने को लेकर है। एक पार्टी नेता कहते हैं, 'अगर ऐसा होता है तो उससे हमें फायदा नहीं होगा। कांग्रेस एवं वामदलों ने चुनावी मैदान एकदम खाली छोड़ दिया है। टीएमसी के मतों में कटौती के लिए हमें कांग्रेस एवं वाम की जरूरत होगी।' वह कहते हैं कि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के बंगाल में चुनाव लडऩे की घोषणा से भाजपा की उम्मीदों को बल मिला है क्योंकि ओवैसी की पार्टी टीएमसी के कुछ मुस्लिम मतों को काट सकती है।
 
तमिलनाडु में भाजपा का सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक के साथ एक तरह का समझौता है लेकिन पार्टी दिग्गज फिल्म स्टार रजनीकांत की गतिविधियों पर करीबी नजर रखे हुए है। कई वर्षों तक टालमटोल करते रहने के बाद रजनीकांत ने राजनीति में अपने प्रवेश के बारे में हाल ही में ऐलान किया, लेकिन बाद में उन्होंने सक्रिय राजनीति में आने से इनकार कर दिया।  भाजपा के लिए एक चुनाव जीतना हवा का एक झोंका हो सकता है लेकिन जीत के नतीजे हमेशा पीड़ा-मुक्त नहीं होते हैं। एक सूत्र ने यह माना कि भाजपा के सामने समस्याएं बेशुमार हैं, खासकर उन राज्यों में जहां दूसरे दलों से आए लोग सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मिलने पर बेचैन होने लगे हैं। सहस्रबुद्धे भी इससे इत्तफाक रखते हुए कहते हैं, 'विरोधी दलों से हमारे खेमे में आए लोगों के साथ सामंजस्य बिठाने की जरूरत है। वे अपेक्षाओं के साथ हमारे पास आते हैं और उनकी उम्मीदों पर खरा उतरने की जिम्मेदारी हम पर है।' सहस्रबुद्धे ने ही मध्य प्रदेश का प्रभारी रहते समय कांग्रेस छोड़कर भाजपा के पास आने वाले विधायकों को पार्टी में शामिल कराया था। त्रिपुरा में तो भाजपा की विप्लव कुमार देव सरकार में तमाम ऐसे मंत्री हैं जो कांग्रेस एवं टीएमसी से अलग होकर उसके पास आए थे। इन बाहरी लोगों को सत्ता में जगह देने से भाजपा की राज्य सरकार पर इतना दबाव पडऩे लगा कि मुख्यमंत्री विप्लव कुमार देव ने पद छोडऩे की धमकी भी दे दी। निश्चित रूप से विपक्ष की कमजोरी ने भाजपा को आगे बढ़ाने में मदद की है। लेकिन यह भी सच है कि जीत की भी एक कीमत अदा करनी पड़ती है। 
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