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स्वनिधि योजना में रेहड़ी-पटरी वालों के आगे बाधाएं

गीतिका श्रीवास्तव /  December 29, 2020

सरकार द्वारा प्रधानमंत्री स्ट्रीट वेंडर आत्मनिर्भर योजना (पीएम स्वनिधि योजना) शुरू करने की घोषणा के कई महीने  बाद भी इसके कार्यान्वयन में रेहड़ी-पटरी वालों को कई बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। लॉकडाउन से कामकाज प्रभावित होने के मद्देनजर इस योजना के तहत रेहड़ी-पटरी वालों को राहत देने के लिए न्यूनतम कागजी प्रक्रिया के साथ 10,000 रुपये तक का कर्ज देने की व्यवस्था की गई है।  हालांकि यह रास्ता भी इतना आसान नहीं है। जब से यह योजना शुरू की गई हैं, तब से रेहड़ी-पटरी वाले नैशनल एसोसिएशन ऑफ स्ट्रीट वेंडर्स ऑफ इंडिया (एनएएसवीआई) की मदद से अपनी समस्याओं को उठाते रहे है।

 
महाराष्ट्र में एनएएसवीआई के सह-संयोजक गुरुनाथ सावंत कहते हैं, 'शुरुआत में वेंडिंग सर्टिफिकेट, लेटर ऑफ रिकमंडेशन (एलओआर) और योजना को लेकर जागरूकता जैसी चुनौतियां थीं।' दिशानिर्देशों में कहा गया है कि  वेंडिंग सर्टिफिकेट के बिना केवल शहरी स्थानीय निकाय या टाउन वेंडिंग कमेटी से एलओआर लेकर भी ऋण के लिए आवेदन किया जा सकता है। हालांकि कई लोग इस बात की जानकारी नहीं होने से इस योजना से वंचित रहे।  बड़े पैमाने पर शहरी क्षेत्रों में पंजीकरण शिविर लगाने के बावजूद कई विक्रेता इससे वंचित हैं क्योंकि वे लॉकडाउन के चलते अपने गांव चले गए थे। सावंत कहते हैं, भले ही उन्हें किसी तरह इसका पता चल गया हो, लेकिन ऋण के लिए आवेदन करने के लिए वे शहर आने में सक्षम नहीं है। इसके अलावा, विक्रेताओं का आरोप है कि बैंक प्रबंधक अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर रहे हैं और मनमाने ढंग से कार्य कर रहे हैं। दिल्ली स्थित प्रीत विहार में चाय विक्रेता का कम करने वाले कुलदीप का दावा है कि वह भारतीय स्टेट बैंक की शाखा में गए थे जहां उन्हें बताया गया कि यह योजना केवल उत्तर प्रदेश के निवासियों के लिए उपलब्ध है, दिल्ली के लिए नहीं। वह अब इसके लिए एनएएसवीआई से परामर्श ले रहे हैं।
 
नई दिल्ली के मंडावली के रहने वाले रेहड़ी-पटरी वाले भोपाल सिंह जैसे लोगों के लिए भी कर्ज लेना आसान नहीं रहा। सिंह का कहना हैं कि ऋण प्राप्त करने में उन्हें कई महीने लग गए। जब वे एलओआर लेकर पंजाब नैशनल बैंक की एक स्थानीय शाखा में गए, तो उन्हें कर्मचारियों से कई बहाने सुनने को मिले। कुछ बैंक कर्मियों ने यह तक कहा कि इस ऋण की मंजूरी के लिए ऊपर से बैंक को अनुमति नही मिली हैं। इस ऋण को प्राप्त करने के लिए सिंह को सात-आठ से अधिक चक्कर लगाने पड़े।
 
रेहड़ी-पटरी वालों को अक्सर पैसे के लिए बैंकों में जाने के लिए दुकान बंद करनी पड़ती है और यात्रा का खर्च उठाना पड़ता है। एनएएसवीआई के दिल्ली के समन्वयक इरफान खान बताते हैं कि कई बार चक्कर लगाने से 10,000 रुपये के कर्ज का एक बड़ा भाग इसी में खर्च हो जाता हैं। मुंबई जैसी जगहों पर, जहां लॉकडाउन के चलते लोकल ट्रेनें बंद रहीं, वहां यात्रा करना पहले की तुलना में महंगा हो गया है। कई वेंडरों की शिकायत हैं कि बैंक में जाने पर उन्हें यह कहकर लौटा दिया जाता हैं कि बैंक मैनेजर वहां नहीं हैं। इस योजना में कागजी समस्या भी एक मुद्दा है। कई विक्रेताओं का कहना है कि उन्हें आवश्यकता से अधिक प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए कहा गया। कुछ को महंगे स्टांप पेपर पर हलफनामा जमा करने के लिए कहा गया था। एनएएसवीआई समन्वयक का कहना है कि सरकार ने इसका संज्ञान लिया है और बैंकरों को उदासीनता न बरतने  को कहा है। ऋण वितरण अनुपात भी एक चिंता का विषय है। सरकार का कहना है कि उसे 30.5 लाख से अधिक आवेदन प्राप्त हुए हैं, जिनमें से उसने 11.7 लाख से अधिक को ऋण वितरित किया गया है। हालांकि हर जगह इसके वितरण की दर समान नहीं है।
 
उदाहरण के लिए, उत्तरी दिल्ली नगर निगम को ऋण के लिए 5,400 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए हैं। हालांकि, इसमें अब तक केवल 534 आवेदनों पर ही ऋण वितरित किए गए हैं। वहीं, 5,875 से अधिक आवेदन प्राप्त करने के बाद भी दक्षिणी दिल्ली नगर निगम ने केवल 364 लोगों को ऋण वितरित किया है। वृहद मुंबई में 21,100 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए हैं, लेकिन संवितरण संख्या 4,000 से थोड़ी ही अधिक है। अगर बिहार के भागलपुर की बात करें तो यहां लगभग 2,770 आवेदन प्राप्त हुए हैं, पर राशि केवल 234 को वितरित की गई है।
 
यहां पर राज्यों के बीच असमानता स्पष्ट रूप से देखने को मिल रही है। एनएएसवीआई समन्वयकों का कहना है कि उत्तर प्रदेश जैसी जगहों पर चीजें सुचारु रूप से चल रही हैं। यहां अन्य राज्यों की तुलना में ऋण-वितरण का अनुपात भी अधिक है। जिन सौभाग्यशाली रेहड़ी पटरी वालों ने इनसभी बाधाओं को पार करके ऋण हासिल कर भी लिया है, अब वे दूसरी समस्याओं का समना कर रहे हैं। एनएएसवीआई के राष्ट्रीय समन्वयक अरविंद सिंह कहते हैं, 'जब विक्रेता अपने व्यवसाय को चलाने के लिए धन लगते हैं, तो पुलिस कोरोना से संबंधित प्रतिबंधों की आड़ में उन्हें परेशान करती है और उन्हें दुकान बंद करने के लिए कहती है। एक तरफ, सरकार इन विक्रेताओं को अपने व्यवसाय को वापस पटरी पर लाने के लिए ऋण लेने के लिए प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर, विक्रेताओं को ऋण हासिल हो जाने के बाद, पुलिस उन्हें सुचारु रूप से कार्य करने की अनुमति नहीं देती है। इस पर ध्यान देने की जरूरत है।'
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