बिजनेस स्टैंडर्ड - भारतीय बैंक: वर्तमान और भविष्य
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भारतीय बैंक: वर्तमान और भविष्य

तमाल बंद्योपाध्याय /  December 28, 2020

उद्योग जगत को आवंटित ऋण के अटकने को लेकर जितनी आशंका जताई गई थी हालात उतने खराब नहीं है। नौकरियां जाने से बैंकों के खुदरा ऋण खातों पर चोट पड़ सकती है। बता रहे हैं तमाल बंद्योपाध्याय

 
चालू वित्त वर्ष की दिसंबर तिमाही समाप्त होने वाली है। अधिकांश बैंकों के प्रमुखों ने दावे किए हैं कि वे कोविड-19 महामारी के दुष्प्रभावों से पूरी हिम्मत के साथ लड़े हैं। दिसंबर तिमाही में बैंकों के नतीजे कैसे रहेंगे यह कुछ दिन बाद पता चलेगा, फिलहाल इस पर नजर डालते हैं कि दूसरी तिमाही में सूचीबद्ध भारतीय बैंकों का वित्तीय प्रदर्शन कैसा रहा है। कुल मिलाकर 31 सूचीबद्ध बैंकों ने सितंबर तिमाही में 27,717 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा अर्जित करने की घोषणा की है। पिछले वर्ष इसी अवधि के दौरान उन्होंने महज 7,166 करोड़ रुपये मुनाफा दर्ज किया था। समूह के तौर पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का प्रदर्शन बेहतर रहा है। यह अलग बात है कि पहले उनके आंकड़े कम रहे थे, इसलिए बढ़त तुलनात्मक रूप में अधिक रही है। 
 
निजी बैंकों में केवल लक्ष्मी विलास बैंक (एलवीबी) को 397 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इससे पिछली तिमाही में बैंक का नुकसान 112 करोड़ रुपये रहा था। हाल में ही डीबीएस बैंक की भारतीय सहायक इकाई के रूप में इसका विलय हो गया है। सभी सरकारी बैंक मुनाफे में हैं। विलय के बाद उनकी फेहरिस्त छोटी हो गई है, इसलिए पिछले प्रदर्शनों से उनकी सटीक तुलना नहीं की जा सकती। कुछ दूसरे बैंकों के साथ यूको बैंक और इंडियन ओवरसीज बैंक (आईओबी) ने अपना अस्तित्व बनाए रखा है और उनका बेहतर प्रदर्शन जारी है। सितंबर तिमाही में यूको बैंक का शुद्ध मुनाफा 30 करोड़ रुपये रहा, जो जून तिमाही में 21 करोड़ रुपये और मार्च तिमाही में 17 करोड़ रुपये रहा था। इस बैंक को मुनाफा दर्ज करने में 17 तिमाहियां लग गईं और इससे पहले कुल 16,000 करोड़ रुपये के नुकसान से जूझना पड़ा। आईओबी का भी शुद्ध मुनाफा जून तिमाही के 121 करोड़ रुपये से बढ़कर सितंबर में 148 करोड़ रुपये हो गया। बैंक को इससे पहले 16 तिमाहियों से नुकसान हो रहा था , जो बढ़कर करीब 25,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। 
 
आईडीबीआई बैंक भी मुनाफे में लौट आया है। सितंबर तिमाही में उसका शुद्ध मुनाफा 324 करोड़ रुपये पहुंच गया। जून में यह आंकड़ा 144.43 करोड़ और मार्च तिमाही में 139 करोड़ रुपये रहा था। मुनाफे में आने से पहले 13 लगातार तिमाहियों में बैंक का नुकसान बढ़कर 42,000 करोड़ रुपये हो गया था। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) का शुद्ध मुनाफा सितंबर तिमाही में 4,574 करोड़ रुपये रहा था, जो पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 52 प्रतिशत अधिक रहा है। जून तिमाही में 864 करोड़ रुपये नुकसान झेलने के बाद बैंक ऑफ बड़ौदा ने 1,679 करोड़ रुपये शुद्ध मुनाफा दर्ज किया। सितंबर तिमाही में यूनियन बैंक का शुद्ध मुनाफा 517 करोड़ रुपये रहा। पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इसे 1,194 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा हुआ था। निजी क्षेत्र के बैंकों में आईसीआईसीआई बैंक का प्रदर्शन दमदार रहा। सितंबर तिमाही में बैंक ने 4,215 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया, जबकि पिछले एक वर्ष पहले इसी अवधि में यह आंकड़ा 655 करोड़ रुपये रहा था। जून तिमाही में बैंक ने 2,599 करोड़ रुपये मुनाफा दर्ज किया था। 
 
एलवीबी को छोड़कर सभी बैंकों को परिचालन मुनाफा प्राप्त हुआ है, लेकिन शुद्ध मुनाफे से तुलना करने पर बैंकिंग उद्योग के परिचालन मुनाफे में वृद्धि मामूली दिख रही है। सितंबर तिमाही में यह 92,074 करोड़ रुपये रहा, जो सितंबर 2019 तिमाही में 77,088 करोड़ रुपये रहा था। जून तिमाही में यह आंकड़ा 90,010 करोड़ रुपये रहा था। यहां भी निजी बैंकों के मुकाबले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का प्रदर्शन अच्छा रहा है। एसबीआई सहित चार बैंकों के परिचालन मुनाफे में एक वर्ष पहले की समान अवधि के मुकाबले कमी आई है। अब सवाल है कि परिचालन मुनाफे में मामूली वृद्धि के बाद भी उनका शुद्ध मुनाफा कई गुना कैसे बढ़ गया? फंसी परिसंपत्तियों के मद में कम प्रावधान उनका मुनाफा बढऩे की प्रमुख वजह है। सितंबर 2019 तिमाही के मुकाबले चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में प्रावधान 4.65 प्रतिशत की कमी के साथ 53,742 करोड़ रुपये रहा। जून तिमाही के मुकाबले तो इसमें 14.75 प्रतिशत की बड़ी कमी आई। 
 
वे इसलिए ऐसा कर पाए कि फंसे ऋण का अंबार लगातार कम हो रहा था। सूचीबद्ध भारतीय बैंकों की सकल गैर-निष्पादित आस्तियां (एनपीए) जून तिमाही की 8.35 लाख करोड़ रुपये से कम होकर सितंबर तिमाही में 7.91 लाख करोड़ रुपये रह गईं। एक वर्ष पहले सकल एनपीए 8.08 लाख करोड़ रुपये था। सरकारी बैंकों के एनपीए का अनुपात बैंकिंग उद्योग के कुल ऋण पोर्टफोलियो में उनकी हिस्सेदारी के मुकाबले काफी अधिक है। साधारण प्रावधान के बाद भी शुद्ध एनपीए में गिरावट तेज रही है। यह सितंबर 2019 के 2.95 लाख करोड़ रुपये से कम रहकर  सितंबर 2020 में 2.10 लाख करोड़ रुपये यानी 29 प्रतिशत रह गई। 
 
ऋण खाते के प्रतिशत के रूप में आईडीबीआई बैंक का सकल एनपीए 25.08 प्रतिशत के साथ सर्वाधिक रहा है। दो अन्य बैंकों सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और येस बैंक लिमिटेड के सकल एनपीए 15 प्रतिशत से अधिक हैं। कम से कम पांच सरकारी बैंकों-यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ इंडिया, पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी), आईओबी और यूको बैंक-का सकल एनपीए 11.62 प्रतिशत से 14.71 प्रतिशत के बीच रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में एसबीआई का सकल एनपीए 5.28 प्रतिशत के साथ सबसे कम रहा है, जबकि आईसीआईसीआई सहित चार निजी बैंकों का एनपीए 5 प्रतिशत से अधिक अधिक लेकिन 10 प्रतिशत से कम रहा। 
 
केवल सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया का शुद्ध एनपीए 5 प्रतिशत से अधिक है और चार अन्य बैंकों का 4 प्रतिशत से अधिक है। इनमें पीएनबी (4.75 प्रतिशत), येस बैंक (4.71 प्रतिशत), आईओबी (4.30 प्रतिशत) और यूनियन बैंक (4.13 प्रतिशत) हैं।  सभी बैंकों के सकल एवं शुद्ध एनपीए में प्रतिशत और आंकड़ों के स्तर पर गिरावट दर्ज हुई है। यह एक अच्छी बात है, लेकिन यह जारी नहीं रहेगी। भारतीय रिजर्व बैंक (आबीआई) की जुलाई में जारी वित्तीय स्थायित्व रिपोर्ट (एफएसआर) में कहा गया था कि मौजूदा स्तर पर सभी वाणिज्यिक बैंकों का सकल एनपीए मार्च 2020 के 8.5 प्रतिशत से बढ़कर मार्च 2021 में 12.5 प्रतिशत रह सकता है। रिपोर्ट के अनुसार अत्यंत ही कठिन परिस्थितियों में यह 14.7 प्रतिशत तक  पहुंच सकता है। सबसे अधिक असर सार्वजनिक बैंकों पर होगा, जिनका एनपीए मार्च 2020 के 11.3 प्रतिशत से बढ़कर मार्च 2021 तक बढ़कर 15.2 प्रतिशत हो सकता है। 
 
चूंकि, ज्यादातर बैंकों के ग्राहकों ने ऋण का भुगतान करना शुरू कर दिया है और काफी कम ग्राहकों ने ऋण पुनर्गठन का विकल्प चुना है, इसलिए ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि एनपीए में अधिक इजाफा नहीं होगा। बैंकिंग नियामक ने भी जुलाई में लगभग ऐसा ही अनुमान जताया था। कंपनियों को आवंटित ऋण को लेकर जितनी चिंता जताई गई थी हालात उतने खराब नहीं है। बैंकों की असल चिंता खुदरा ऋणों को लेकर होगी। बड़े पैमाने पर नौकरियां जाने से खुदरा ऋण पर असर हो सकता है। आम तौर पर खुदरा ऋण बैंकों के लिए सुरक्षित दांव समझे जाते हैं।  
 
अधिकांश बैंकों ने फंसे ऋणों के लिए प्रावधान अधिक कर दिए हैं और कई बैंकों ने कोविड-19 महामारी के असर से निपटने के लिए एक निश्चित रकम अलग कर दी है, लेकिन कहानी यही खत्म नहीं होती। कुछ तिमाहियां और गुजर जाने के बाद ही हम कह पाने की स्थिति में होंगे कि बैंकिग क्षेत्र मंदी के बाद भी मजबूती से खड़े रहने की क्षमता रखता है। 
 
(लेखक बिजनेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड में वरिष्ठï सलाहकार हैं।)
Keyword: bank, loan, NPA, LVB, IOB,,
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