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भारत में सबसे पहले बुजुर्गों को लगाया जाए कोविड का टीका

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  December 27, 2020

भारत के बारे में कहा जा सकता है कि महामारी का सबसे बुरा दौर समाप्त हो गया है। देश में कोरोना संक्रमण का आंकड़ा एक करोड़ के पार हो चुका है लेकिन नए मामले सामने आने की दर कभी भी सितंबर के उच्चतम स्तर पर नहीं लौटी। नवंबर में त्योहारी मौसम के बाद इसमें तेजी अवश्य आई लेकिन मोटे तौर पर नए संक्रमण कम हुए हैं। शायद कुछ ही सप्ताहों में देश में एक या अधिक टीकों को आपातकालीन मंजूरी मिल जाएगी। इनमें सबसे आगे है ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय/एस्ट्राजेनेका का टीका जिसे भारत में पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट बना रहा है। आने वाले दिनों में फाइजर/बायोनटेक और रूस के स्पूतनिक-5 समेत अन्य टीकों को भी मंजूरी मिल सकती है। रूस में तीन लाख से अधिक लोगों को यह टीका लगाया जा चुका है। ये तमाम मंजूरी तीसरे चरण के परीक्षण के बाद ही होगी।

 
सरकार ने यकीन जताया है कि भारत टीकाकरण के लिए तैयार है लेकिन सच यह है कि कई सवालों के जवाब अभी बाकी हैं। मसलन टीके की लागत तथा राज्यों और केंद्र के बीच इसके खर्च वहन की व्यवस्था काफी विवादित हो सकती है। विपक्षी कांग्रेस ने पहले ही सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के चुनाव प्रचार को तूल देना शुरू कर दिया है जिसमें कहा गया था कि बिहार की जनता को नि:शुल्क टीका लगाया जाएगा। यदि भाजपाशासित राज्यों को सहूलियत मिलती है तो अन्य राज्य शिकायत कर सकते हैं। टीके को लेकर बुनियादी ढांचे का भी प्रश्न है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने हाल ही में अपनी वेबसाइट पर कहा कि टीके का भंडारण और परिवहन समस्या नहीं होंगे क्योंकि हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण कार्यक्रम चलाता है। यह बात सही है लेकिन कोविड टीकाकरण के लिए अधिक विशिष्ट जरूरतों का ध्यान रखना होगा। 
 
प्राथमिकता का प्रश्न भी है। अमेरिका में पहले ही इसे लेकर विवाद हो चुका है। वहां भी भारत जैसा संघीय ढांचा है। वहां संघीय प्राधिकार यह तय करने में लगा है कि पहले किस समूह को टीका लगेगा और इसका क्या क्रम रहेगा। भारत में सरकार ने संकेत दिया है कि वह प्राथमिकता के मामले में विश्व स्वास्थ्य संगठन के सुझावों का पालन करेगा। परंतु केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने हाल ही में कहा है कि सबसे पहले स्वास्थ्यकर्मियों और अग्रिम पंक्ति में काम करने वालोंं को टीका लगेगा। दूसरे समूह में 50 वर्ष से अधिक के लोग तथा 50 से कम उम्र के ऐसे लोग होंगे जिन्हें अन्य घातक बीमारियां हैं। 
 
यहां सवाल यह होगा कि स्वास्थ्य कर्मी कौन है? इसकी स्पष्ट परिभाषा आवश्यक है। अमेरिका में अस्पतालों में काम करने वालों को प्राथमिकता दी जा रही है लेकिन उन सामान्य चिकित्सकों को नहीं जो प्राय: सबसे पहले कोविड-19 की पहचान करते हैं। भारत में श्रम कानूनों के कारण रोजगार अनुबंधों के जटिल होने के कारण और अधिक सवाल पूछे जाएंगे। माना जा सकता है कि सार्वजनिक क्षेत्र के चिकित्सालयों के पूर्णकालिक कर्मचारी स्वाभाविक तौर पर पहले दौर में टीकाकरण के दावेदार होंगे। निजी क्षेत्र के अस्पतालों, क्लिनिक और नर्सिंग होम का क्या? सरकारी अस्पतालों में अनुबंध पर काम करने वालों का क्या? क्या केवल उन्हीं लोगों को पहली खुराक मिलेगी जो कोविड-19 के पीडि़तों से सीधे संपर्क में आते हैं? या फिर उन सभी को टीका लगाकर अस्पतालों को वास्तव में सुरक्षित क्षेत्र में बदला जाएगा? 
 
स्वास्थ्यकर्मियों के अलावा मामला विवादित होना तय है। उदाहरण के लिए अग्रिम पंक्ति के कर्मी कौन हैं? सरकार की ओर से जारी शुरुआती जानकारी के मुताबिक इनमें सैनिक और पुलिसकर्मी भी आते हैं। इन्हें प्राथमिकता देने के पीछे कोई दलील नहीं दी गई। अमेरिका में बैंक कैशियरों और आपूर्ति सेवाओं से जुड़े कर्मियों समेत कुछ जरूरी कर्मचारियों को प्राथमिकता देने पर विवाद हो गया है। वही बात भारत पर भी लागू होती है। कोविड-19 से जुड़ी मौत के आंकड़े दर्शाते हैं कि इस बीमारी में उम्र की बहुत अहमियत है। मौत के आंकड़े कम करने के लिए जरूरी है कि सबसे पहले 80 से अधिक उम्र के लोगों का टीकाकरण किया जाए। इसके बाद 70 वर्ष से कम उम्र तथा अन्य लोगों का क्रम आना चाहिए। 
 
टीकों की तादाद पर विचार किया जाए तो यह सवाल और अहम हो जाता है। किस टीके के लिए कब मंजूरी मिलती है इसे देखते हुए कह सकते हैं कि तत्काल तो केवल कुछ लाख टीके ही उपलब्ध होंगे। यदि उन्हें स्वास्थ्य कर्मियों और अग्रिम पंक्ति के सरकारी कर्मचारियों को लगा दिया गया तो बुजुर्गों को आने वाले कई महीनों तक टीके का इंतजार करना होगा। ऐसे में मृतकों की तादाद बढ़ेगी। कुछ लोग कह सकते हैं कि सबसे पहले संक्रमण की चेन तोडऩे की जरूरत है इसलिए अग्रिम पंक्ति के लोगों को टीका लगाना जरूरी है। यह सोच गलत और अधूरे आंकड़ों पर आधारित है। हम जानते हैं कि टीके से गंभीर बीमारियां रुकती हैं लेकिन हमें यह नहीं पता कि क्या ये संक्रमण भी रोकते हैं? ऐसे में सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता की बात या टीके के माध्यम से संक्रमण रोकने की बात अपरिपक्व है। 
 
ब्रिटेन में आबादी के बड़े हिस्से में मौत के मामलों को लेकर गहन अध्ययन किए गए और राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा के सलाहकारों ने एक व्यापक आकलन तैयार किया कि कैसे टीकाकरण किया जाए। तथ्यात्मक रुख के कारण स्वास्थ्यकर्मियों के साथ उन लोगों को प्राथमिकता दी गई जो 65 वर्ष से अधिक उम्र के हैं। ऐसे सभी लोगों को टीका लगने के बाद ही गंभीर बीमारियों से ग्रसित लोगों और फिर 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को टीका लगेगा। भारत सरकार ने महामारी के दौरान लोगों की जान बचाने के क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन किया है। अब अंतिम चरण में भी उसे प्रमाण आधारित नीति निर्माण करना चाहिए, न कि विशेष हित समूहों को प्रसन्न करने का प्रयास करना चाहिए। बुजुर्गों के देशव्यापी टीकाकरण के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
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