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मुस्लिमों तक मोदी की पहुंच: सुनियोजित बदलाव

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  December 27, 2020

यह पहला मौका है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के अलग-थलग महसूस कर रहे मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय की ओर अपना हाथ बढ़ाया है। इस मामले में हमारी खास दिलचस्पी की वजह भी यही है। पहली वजह तो यह है कि सन 2019 की तरह इस बार भी उन्होंने साल का अंत भारतीय मुस्लिमों को प्रभावित करने के प्रयास के साथ किया। दूसरा, इसलिए कि उन्होंने इसके लिए अचानक ही 22 दिसंबर का दिन चुना। याद रहे गत वर्ष उन्होंने दिल्ली के रामलीला मैदान में ऐसा ही संबोधन दिया था जब नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) विरोधी आंदोलन चरम पर था। तीसरा उनका लहजा और राजनीतिक बातें दोनों मुस्लिमों को लेकर उनकी पार्टी की राजनीति और उसकी गतिविधियों से एकदम अलग थे। दिलचस्पी की चौथी वजह यह थी कि उनके वक्तव्य के ठीक पहले देश के गृहमंत्री और उनके सिपहसालार अमित शाह ने पश्चिम बंगाल की अपनी यात्रा के दौरान स्पष्ट कहा था कि सीएए के क्रियान्वयन की प्रक्रिया फिलहाल स्थगित की गई है।

 
नए कानून के तहत नियम तैयार करने की अंतिम तिथि 31 दिसंबर को समाप्त हो रही है और यदि ऐसा नहीं किया गया तो सरकार को तीसरे विस्तार के लिए वापस संसदीय समिति के पास जाना होगा। शाह ने कहा कि महामारी के प्रसार के बीच कानून का क्रियान्वयन कैसे किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि टीकाकरण की प्रक्रिया आरंभ होने तक प्रतीक्षा करना बेहतर होगा। इन बातों को देखते हुए हम यह कहने का जोखिम उठा सकते हैं कि सरकार को यह अहसास हो गया है कि इस नीति पर बहुत अधिक जोर देने का अंतरराष्ट्रीय संबंधों और आंतरिक सुरक्षा पर बुरा असर हो सकता है। कारण, इसे लेकर पक्ष विपक्ष में चाहे जो दलील हो लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और देश के आलोचकों के बीच इसे मुस्लिमों को अलग-थलग करने वाली नीति के रूप में देखा जाता है।
 
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पहल के लिए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) की वर्षगांठ का दिन चुना। इससे पहले इस विश्वविद्यालय में विरोध प्रदर्शन, पुलिसिया ज्यादती और झूठे अभियोगों को लेकर बवाल मचा हुआ था। अब मोदी ने इसे 'मिनी इंडिया' करार दिया है और यहां के छात्रों तथा शिक्षकों से कहा है कि वे दुनिया के सामने देश की अच्छी और निष्पक्ष छवि पेश करें। जाहिर है उनका इशारा उन विदेशी छात्र-छात्राओं की ओर था जो एएमयू में अध्ययन के लिए आते हैं। मुझे जानकारी दी गई कि इस समय वहां अध्ययनरत 22,000 विद्यार्थियों में से 615 विदेशी हैं। अनिवासी भारतीयों का आंकड़ा इससे अलग है। इनमें अफगानिस्तान के 42, बांग्लादेश के 68, इंडोनेशिया के 66, जॉर्डन के 49, नेपाल के 20, फिलीस्तीन के 13, ईरान के 15, थाईलैंड के 117, तुर्कमेनिस्तान के 21, यमन के 151 और इराक के 29 विद्यार्थी शामिल हैं। अमेरिका, मॉरीशस, न्यूजीलैंड और नाइजीरिया के भी कुछ विद्यार्थी हैं। ये सभी मित्र राष्ट्र हैं और हमारे लिए राष्ट्रीय रणनीतिक महत्त्व वाले देश हैं। जानकारी के लिए बता दें कि एएमयू के दंत चिकित्सा विभाग में एक पाकिस्तानी छात्रा भी है। ये विद्यार्थी भारत के बारे में जो भी छवि बनाते हैं वह एएमयू परिसर में हुए अनुभवों पर आधारित होती है। बीते एक वर्ष में उनका अनुभव पूरी तरह नकारात्मक रहा। युवा और जागरूक मुस्लिम जो यहां के छात्रों और शिक्षकों में बहुलता से हैं, उनके नाराज और अलग-थलग महसूस करने की पर्याप्त वजह है। इसके बावजूद मोदी को क्यों परवाह होनी चाहिए? मुस्लिम उन्हें वोट नहीं देते। हां, पश्चिम बंगाल और असम में आगामी विधानसभा चुनावों में ध्रुवीकरण की जरूरत पड़ेगी ही। यह तो भाजपा का चुनावी अस्त्र ही है। मोदी और शाह के नेतृत्व में भाजपा ने अल्पसंख्यकों को हाशिये पर रखकर सीमित क्षेत्र में मतदाताओं को आकर्षित करने का अद्भुत चुनावी करिश्मा कर दिखाया है। उन्होंने व्यापक तौर पर मुस्लिम मतों को अप्रासंगिक बना दिया है। ऐसे में अब वे उन तक पहुंच बनाने की परवाह भला क्यों कर रहे हैं? बल्कि नाराज, हताश, अलग-थलग और अकेले छोड़ दिए गए मुसलमान तो उनकी बुनियाद मजबूत करने वाले हैं। 
 
हमें ठीक एक वर्ष पीछे यानी 22 दिसंबर, 2019 में जाना होगा और मोदी के रामलीला मैदान में दिए भाषण से संकेत तलाशने होंगे। अपने उस भाषण में मोदी ने इस बात की सराहना की थी कि मुस्लिम प्रदर्शनकारी तिरंगे झंडे और संविधान का प्रयोग कर रहे हैं। उन्होंने यह सुझाव भी दिया कि इसके साथ ही इन प्रदर्शनकारियों को आतंकवाद के खिलाफ भी आवाज बुलंद करनी चाहिए। देश के अल्पसंख्यकों के लिए भाजपा/आरएसएस के पास यही टेबिट जांच है। युवा पीढ़ी अथवा क्रिकेट में रुचि न रखने वालों को बता दूं कि इसका संदर्भ ब्रिटेन के कंजरवेटिव राजनेता नॉर्मन टेबिट से जुड़ा है। उन्होंने क्रिकेट खेलने वाले उपनिवेशों के ब्रिटिश नागरिकों के सामने यह कुख्यात सवाल रखा था कि टेस्ट मैच में वे इंगलैंड का समर्थन करते हैं या अपने मूल देश का।
 
परंतु इसके बाद मोदी ने तत्काल दोस्ताना लहजा अपना लिया और जोर देकर कहा कि उनकी किसी कल्याण योजना में अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव नहीं किया गया। यह बात सही भी है। इसके बाद उन्होंने उन तमाम प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानों का उल्लेख किया जो उन्हें प्रमुख मुस्लिम देशों से मिले हैं। हमें उनकी सोच का संभावित संकेत वहीं मिलता है। सम्मान, पुरस्कार और तारीफ किसे पसंद नहीं। व्यक्तिगत तौर पर मोदी के लिए यह सब चाहे जो अहमियत रखता हो लेकिन महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह मुस्लिम देशों तक पहुंच बढ़ाने की उनकी कोशिश का नतीजा था, खासकर अरब देश। यह उन देशों के बीच पाकिस्तान को सफाई से मात देने की कवायद थी। लेकिन पूर्व में स्थित देशों के बीच चीन के साथ यही करने की उनकी कोशिश नाकाम रही।
 
चीन के मामले में मोदी विफल रहे, उसके सैनिक हमारे सैनिकों की आंख में आंख डाले खड़े हैं और पाकिस्तान एक तरह से उसका अनुयायी बन गया है। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि शी चिनफिंग को इसमें लाभ नजर आया। अरब जगत में मोदी अब तक कामयाब रहे हैं। सऊदी अरब और यूएई पाकिस्तान के सबसे करीबी मित्र होने के साथ-साथ उसे धन मुहैया कराते रहे हैं लेकिन अब वे उससे दूर हैं। सऊदी अरब अपना कर्ज वापस मांग रहा है, चीन पाकिस्तान को उबारने की भूमिका में है और यूएई ने पाकिस्तानी कर्मियों को वीजा देना बंद कर दिया है। 
 
मोदी तेजी से बदलती दुनिया में यह लाभ गंवाना नहीं चाहते। संभव है कि मित्रवत इस्लामिक दुनिया से भी इस दिशा में दबाव बढ़ा हो। यदि भाजपा की राजनीति यूं ही ध्रुवीकरण की रहेगी तो वे पाकिस्तान के खिलाफ भारत का समर्थन कैसे जारी रखेंगे? ऐसा तब है जब उन्हें भी उम्मत की आंतरिक चुनौतियों से निपटना है। ईरान और तुर्की दोनों अपना प्रभाव बढ़ाने को लेकर बेकरार हैं और अमेरिका दबाव बना रहा है कि इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य किए जाएं। ऐसे समय पर जबकि मलेशिया और पाकिस्तान इजरायल से रिश्ते सुधार रहे हैं, भारत नहीं चाहेगा कि वह अरब के मित्र गंवाए।
 
डॉनल्ड ट्रंप की विदाई के बाद जो बाइडन अमेरिका के राष्ट्रपति बनने वाले हैं। वह ईरान के साथ नए सिरे से रिश्ते कायम करेंगे। ऐसे में इस्लामिक देशों के लिए नई संभावनाएं खुलेंगी। ईरान के खमैनी तुर्की के एर्दोआन या मलेशिया के महातिर जैसे बुरे नहीं हैं लेकिन हाल के दिनों में उन्होंने मुस्लिमों के साथ भारत के बरताव की आलोचना की है। जबकि ईरान हमारा मित्र राष्ट्र है। उसके साथ हमारे तमाम आर्थिक और सामरिक हित हैं। पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश की बात करें तो एएमयू में भाषण से पहले शेख हसीना के साथ मोदी की शिखर बैठक थी। सीएए-एनएआरसी के कारण और 'दीमकों को बंगाल की खाड़ी में फेंकने' जैसी बातों के कारण हुए नुकसान की भरपाई और पड़ोसी मुल्क के साथ रणनीतिक रिश्तों में सुधार का प्रयास स्पष्ट था। भारत प्याज से टीके तक हर चीज की पेशकश कर रहा था। चीन और पाकिस्तान दोनों भारत में बने बांग्लादेश विरोधी माहौल का हरसंभव लाभ लेने की कोशिश में हैं।
 
यह हृदय परिवर्तन के बाद यह ऐसे समय में अपनी नीति बदलने की कोशिश अधिक है जब दुनिया बदल रही है। आर्थिक वृद्धि गंवाने के साथ खुद भारत की स्थिति कमजोर हुई है। आंतरिक राजनीतिक कदमों को व्यापक सामरिक हितों और अंतरराष्ट्रीय रिश्तों के साथ खिलवाड़ करने देने के नुकसान हमारे सामने हैं। यह सब तब हुआ है जब चीन के समक्ष हमारी कमजोरियां बढ़ी हैं और पांच दशक पहले की तुलना में हमें दोस्तों की जरूरत अधिक है। 
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