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शुरू हो आईबीसी का कामकाज

संपादकीय /  December 22, 2020

ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के सबसे बड़े सुधारों में से एक है। इस संहिता का लक्ष्य है बाजार को पूंजी के लिए अधिक लचीला बनाना और उस समस्या को दूर करना जिसे पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने 'निर्गम समस्या' कहा था। यह कानून पूंजी के अनिश्चित समय तक विधिक विवादों में फंसे रहने को रोकता है और उसे अधिक उत्पादक कार्यों के लिए मुक्त करता है। सरकार द्वारा आईबीसी के सामान्य संचालन की निलंबन अवधि बढ़ाए जाने को पर्यवेक्षकों द्वारा इसी आलोक में देखा जाना चाहिए। मार्च में देशव्यापी लॉकडाउन लगते ही आईबीसी को डिफॉल्ट के नए मामलों के लिए स्थगित कर दिया गया था। इस स्थगन को 24 दिसंबर तक बढ़ाया गया था। कानून के मुताबिक इसे तीन महीने के लिए और स्थगित किया जा सकता है। शुरुआती स्थगन समझ में आता है क्योंकि आईबीसी का लक्ष्य उन कारोबारों से निपटना है जो ऋणशोधन में अक्षम हैं। यह कानून उन मामलों के लिए नहीं है जहां कारोबारों को अस्थायी रूप से नकदी का संकट हो। महामारी के शुरुआती सप्ताहों में नकदी का जिस तरह का संकट उत्पन्न हुआ वैसे में आईबीसी को निलंबित करना चुनिंदा विकल्पों में से एक था।

प्रश्न यह है कि क्या इतने महीने बाद भी वह दलील लागू है? यह दलील दी जा चुकी है कि अधिकांश मामले पुनर्गठन के बजाय नकदीकरण की दिशा में बढ़े हैं। सितंबर तिमाही में जो मामले निपटाए गए उनमें से 60 फीसदी का नकदीकरण हुआ। ये आमतौर पर विरासती मामले थे। उनमें से तीन चौथाई, औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्गठन बोर्ड की पुरानी व्यवस्था के समय के थे। ऐसे में इसे आईबीसी की विफलता नहीं माना जा सकता बल्कि इससे यह तथ्य उजागर होता है कि ऐसी व्यवस्था की कितनी मांग थी। इस अवधि के दौरान सरकार को इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि कहीं सक्रिय कर्जदाता आईबीसी का अतिशय इस्तेमाल तो नहीं कर रहे हैं। क्योंकि अब तक किए गए 4,000 से अधिक आवेदनों में से आधे उन्होंने ही किए हैं। आईबीसी इसलिए बनी ताकि परिचालन के काबिल न रह गए कारोबारों को व्यवस्थित तरीके से बंद किया जा सके। इसका उद्देश्य अनुबंध के विवादों को हल करना नहीं है। इनमें से कई मामले आईबीसी में औपचारिक रूप से लाए जाने के पहले ही हल हो गए। यदि आईबीसी का छोटे दावों की अदालत के रूप में दुरुपयोग नहीं किया जाता तो सरकार पंचाट में सामान्य गतिविधि बहाल करने को लेकर अधिक आत्मविश्वास से भरी होती।

अर्थव्यवस्था में सुधार की प्रक्रिया शुरू करने की दृष्टि से आईबीसी अहम है। संघर्षरत लेकिन चलने लायक उपक्रमों में पूंजी डालना अहम है। यह पहचानना भी अहम है कि इस विकल्प की उपलब्धता अपने आप में भरोसा देने वाली बात है। सरकार को अपने सबसे बड़े सुधारों में से एक को अनावश्यक रूप से निलंबित नहीं रखना चाहिए। खासतौर पर इसलिए क्योंकि वह स्वयं यह दावा कर रही है कि अर्थव्यवस्था सुधार की दिशा में है और वृद्धि के संकेत नजर आ रहे हैं। बड़ी तादाद में कारोबार कर्ज के पुनर्गठन के लिए बैंकों के पास भी नहीं जा रहे हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि नियामकीय सहनशीलता की आवश्यकता कम हो रही है। कई लोगों की शिकायत है कि फिलहाल संकटग्रस्त परिसंपत्तियों की अधिक मांग नहीं है। हालांकि सच यह है कि एक बार आकर्षक परिसंपत्तियों के बाजार में आने पर मांग भी तैयार हो जाएगी। यह तभी होगा जब आईबीसी सामान्य कामकाज शुरू करे।

Keyword: आईबीसी, कानून, पूंजी, डिफॉल्ट, पुनर्गठन,
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