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सब्सिडी-शुल्क-परमिट राज की वापसी?

शंकर आचार्य /  December 14, 2020

गत तीन वर्षों के दौरान हमारा आयात शुल्क चरणबद्ध तरीके से बढ़ाया गया ताकि देश में मौजूद विनिर्माण क्षेत्रों का संरक्षण और उनकी मदद की जाए। यह कदम बीते 25 वर्षों के दौरान विभिन्न सरकारों द्वारा अपनाए गए व्यापार उदारीकरण के तौर तरीकों को उलटने के समान है। अब नीतिगत क्षेत्र में एक नई व्यवस्था का जिक्र है जिसे उत्पादन से संबद्ध प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना का नाम दिया गया है। इसका लक्ष्य है चुनिंदा क्षेत्रों में विनिर्माण उत्पादन को बढ़ावा देना। यह बढ़ावा देसी और निर्यात दोनों क्षेत्रों के लिए दिया जाना है।

योजना को अप्रैल 2020 में मोबाइल टेलीफोन और विशिष्ट इलेक्ट्रॉनिक उपकरण कलपुर्जों के निर्माण के क्षेत्र में धूमधाम से इस योजना की शुरुआत की गई थी। इसके अलावा चिकित्सा उपकरणों और औषधि तत्त्वों के क्षेत्र में भी इसकी शुरुआत की गई। लेकिन यह योजना बीते 12-18 महीनों से चर्चा में थी। इस अवधि में मोबाइल हैंडसेट पर सीमा शुल्क बढ़ाने जैसे कदम उठाए गए ताकि इसकी बुनियाद तैयार हो सके। शुरुआती सफलता के संकेतों के बाद कैबिनेट ने पीएलआई योजना का विस्तार 10 नये क्षेत्रों में करने का निर्णय किया जिसमें वाहन और वाहन कलपुर्जे, उन्नत इलेक्ट्रिकल बैटरी, औषधि उत्पाद, निजी कंप्यूटर और लैपटॉप, वातानुकूलक, दूरसंचार उपकरण और विशिष्ट खाद्य उत्पाद आदि शामिल हैं।

मोबाइल हैंडसेट क्षेत्र से उदाहरण लें तो पीएलआई योजनाओं के तहत सरकार एक सीमित अवधि के लिए (मोबाइल फोन के लिए 5 वर्ष की) सब्सिडी प्रदान करती है। यह सब्सिडी 6 फीसदी से घटती दर पर 4 फीसदी तक की दर पर होती है। इसके लिए तयशुदा निवेश और बिक्री को अर्हता मानक बनाया जाता है। प्रत्येक पीएलआई योजना का संचालन संबंंधित मंत्रालय और उसकी अधिसूचित परियोजना प्रबंधन एजेंसी (पीएमए) करती है। सब्सिडी राशि की सीमा तय की गई है। मोबाइल फोन और विशिष्ट इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्जों के लिए यह पांच वर्ष में 40,000 करोड़ रुपये तक सीमित है। 10 नये क्षेत्रों के लिए इसके 145,000 करोड़ रुपये रहने की बात कही गई है। इसका करीब एक तिहाई हिस्सा वाहन और उनके कलपुर्जों के क्षेत्र में जाएगा।

विशिष्ट विनिर्माण उप क्षेत्रों के विकास के उपाय के रूप में पीएलआई सब्सिडी का इस्तेमाल शुल्क की तुलना में बेहतर हो सकता है। पहली बात, इन्हें सरकार पारदर्शी ढंग से वहन करती है जबकि शुल्क के मामले में सब्सिडी की लागत उपभोक्ताओं और उनका इस्तेमाल करने वाले उद्योगों द्वारा वहन किया जाता है। दूसरी बात, पीएलआई सब्सिडी प्रदर्शन से संबंधित होती हैं। इनका भुगतान केवल तभी होता है जब चरणबद्ध बिक्री नजर आती है। तीसरी बात, सब्सिडी आयात प्रतिस्थापन के लिए उत्पाद बनाम निर्यात के लिए उत्पादन में भेद नहीं करती। चौथा, राजकोषीय लागत की सीमा तय की जा सकती है। कम से कम सैद्धांतिक तौर पर ऐसा संभव है। पांचवीं बात, हर लाभार्थी उपक्रम के लिए सब्सिडी एक सीमित समय के लिए होती है। कम से कम फिलहाल तो यही योजना है।

परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि पीएलआई योजनाएं समस्यारहित हैं। पहली बात तो यह कि इनकी लागत बहुत है। खासतौर पर अतिरंजित राजकोषीय दबाव को देखते हुए। यदि अर्हता हासिल करने वाली फर्म और किसी खास क्षेत्र में चरणबद्ध उत्पादन बेहतर है तो राशि की अधिकतम सीमा तय कर पाना आसान नहीं है। दूसरा, क्षेत्र विशेष के शुल्क के मामले में पीएलआई से जुड़ा बुनियादी सवाल भी पैदा होता है: सरकार चुनिंदा क्षेत्रों पर मेहरबान क्यों होना चाहती है? प्रतिस्पर्धी बाजार में काम करने वाले कारोबारियों की तुलना में अफसरशाहों के पास कौन सी बेहतर जानकारी है? तीसरा, चरणबद्ध उत्पादन वृद्धि का आकलन कैसे होगा? कंपनियों के लिए व्यवस्था को धता बताना कितना कठिन या आसान होगा? खासतौर पर तब जबकि उत्पादन मौजूदा फर्म में हो रहा हो? चौथा, योजना क्रियान्वयन के लिए आवेदन, अनुमति  प्रणाली की आवश्यकता है ताकि अहम भेदकारी तत्त्वों को इजाजत दी जा सके। पांचवां, यदि प्रत्येक पीएलआई योजना को अलग-अलग मंत्रालय और उनकी एजेंसियां चलाएंगी तो बहुशाखीय अफसरशाही के विकास की कल्पना की जा सकती है। समय के साथ प्रत्येक पीएलआई अपने आप में एक छोटे लाइसेंस-परमिट राज में बदल जाएगी। स्पष्ट कहें तो सब्सिडी-परमिट राज में।

अधिक बुनियादी ढंग से देखें तो तमाम उप क्षेत्रों में किसी खास उप क्षेत्र (मसलन मोबाइल) आदि के लिए अपेक्षाकृत पारदर्शी पीएलआई सब्सिडी और अधिक अस्पष्ट सीमा शुल्क लाभ दोनों से लाभान्वित होना आसान हो सकता है। इन हालात में किसी सरकारी एजेंसी के लिए यह आकलन करना मुश्किल हो जाता है कि विभिन्न उप क्षेत्रों को बढ़ावा देने वाले हस्तक्षेपों से दरअसल कितना लाभ हुआ। वास्तविक व्यवहार में इसका पता लगा पाना खासा मुश्किल होगा। वैसे ही जैसे सन 1991 के पहले के लाइसेंस परमिट राज में हुआ करता था। वैसे भी निजी फर्म और उसके प्रवर्तकों को उनके औद्योगिक लाइसेंस से हासिल हुए लाभ, विभिन्न प्रकार के आयात लाइसेंस, उच्च और भिन्न-भिन्न सीमा शुल्क ढांचे आदि से हासिल लाभ का आकलन, कर पाना मुश्किल रहा। वह दरअसल लाइसेंस-परमिट का एक जंगल था जो लाभार्थी उप क्षेत्रों को मिलने वाले वित्तीय लाभों के परिमाणन को निरर्थक करता था। माना जाता था कि जिन कारोबारियों को लाइसेंस मिलता है वे अत्यंत खुशनसीब और सत्ता के चहेते भी।

जैसा कि हम सभी जानते हैं यह व्यवस्था उचित साबित नहीं हुई। उत्पादन में कमी और भ्रष्टाचार इसकी पहचान रहे। यही कारण है कि सन 1990 के दशक के शुरुआती सुधार औद्योगिक लाइसेंसिंग और आयात लाइसेंसिंग से संबंधित थे। इसके बाद ही सीमा शुल्क में कमी की चौथाई सदी की शुरुआत हुई। बीते तीन वर्ष में इस व्यवस्था को पलट दिया गया है जो ठीक नहीं। ऐसे में क्षेत्र विशेष से संबंधित पीएलआई की नई व्यवस्था शायद ही दीर्घावधि में विनिर्माण की उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा बढ़ा सके। लेकिन यह आरसेप जैसे क्षेत्रीय मुक्त व्यापार समझौतों में हमारे प्रवेश को भी मुश्किल बनाएगा। आरसेप में शामिल 15 एशियाई देश दुनिया के कुल व्यापार और उत्पादन में 30 फीसदी के हिस्सेदार हैं।

चाहे जो भी 13 उप क्षेत्रों के लिए बनी पीएलआई योजनाएं बरकरार रहेंगी। मुझे आशा है कि उनका कम से कम तब तक विस्तार नहीं होगा जब तक आयात शुल्क बढ़ाने का मौजूदा दौर वापस पलट नहीं जाता। बेहतर होगा कि सरकार विभिन्न मंत्रालयों के अधीन इन योजनाओं के क्रियान्वयन में अधिकतम पारदर्शिता, स्वायत्तता, एकरूपता और जवाबदेही सुनिश्चित करे। यदि ये नई योजनाएं भी पुराने लाइसेंस-परमिट राज की तरह हो गईं तो यह दुखद होगा।

(लेखक इक्रियर के मानद प्रोफेसर और भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं)

Keyword: सब्सिडी, परमिट राज, पीएलआई योजना, लाइसेंस, आयात शुल्क,
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