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कोविड संकट को अवसर में बदल रही सरकार

इंदिवजल धस्माना / नई दिल्ली November 24, 2020

मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन ने आज कहा कि सरकार श्रम बहुल आर्थिक वृद्धि के लिए कोविड संकट को एक मौके में तब्दील कर रही है। उन्होंने कहा कि यह बीते वर्षों में रोजगार रहित वृद्धि से अलग है।

उन्होंने कहा कि मोदी सरकार की तरफ किए जा रहे सुधारों का शांत अधिकतर आबादी को फायदा मिलेगा, लेकिन यथास्थिति के पक्षधर कुछ थोड़े लोग ज्यादा मुखर हैं। सुब्रमण्यन ने भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा, 'अगर आप कृषि क्षेत्र के बदलावों, एमएसएमई की परिभाषा के बदलावों, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना, श्रम सुधारों को देखेंगे तो पाएंगे कि असल में ये सभी प्रयास अर्थव्यवस्था के वृहद आर्थिक संगठन को विशेष रूप से कृषि एवं विनिर्माण जैसे उन क्षेत्रों पर आधारित बनाने के लिए हैं, जो ज्यादा रोजगार देने वाले हैं।'

ऐसा करना इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि लगातार वृद्धि अर्थव्यवस्था में भरपूर रोजगार सृजन से ही संभव है न कि रोजगार रहित वृद्धि के। उन्होंने कहा, 'असल में रोजगार रहित वृद्धि के दौर खत्म हो जाते हैं, जबकि रोजगार सृजन के साथ आने वाली वृद्धि से ही लोगों के हाथ में पैसा आता है, उत्पाद एवं सेवाओं के लिए मांग पैदा होती है और इसलिए सतत वृद्धि पैदा होती है।' सुब्रमण्यन ने कहा कि पिछले 50 वर्षों की ज्यादातर आर्थिक वृद्धि श्रम बहुल नहीं रही है।

उन्होंने कहा, 'असल में यही वजह चीज है, जो हमें मांग सृजित करके सतत वृद्धि के लिए बदलनी होगी। अगर आप उन देशों को देखेंगे, जिन्होंने कम से कम एक दशक में पांच फीसदी वृद्धि हासिल की है तो आप उनमें अलग चीज यह पाएंगे कि वहां वेतन में बढ़ोतरी हुई, वहां रोजगार में बढ़ोतरी हुई और इसलिए लोगों के हाथ में खर्च करने के लिए पैसा आया, इसलिए उनमें सतत वृद्धि बनी रही।'

सुब्रमण्यन ने कहा कि कोविड संकट पहले के संकटों से अलग था। पहले के संकटों में अर्थव्यवस्था की ओवरहीटिंग नजर आई और इसलिए चालू खाते के घाटे और महंगाई अधिक रही। मौजूदा संकट अर्थव्यवस्था की अंडरहीटिंग का है, इसलिए चालू खाता सरप्लस है। अर्थव्यवस्था में यह सरप्लस 2020-21 में बना रह सकता है, भले ही वित्त वर्ष की शेष तीन तिमाहियों मेंं पहली तिमाही के चालू शेष में 19.8 अरब डॉलर की अतिरिक्त राशि का दोहराव न हो।

उन्होंने अपने इस तर्क के समर्थन में आंकड़े पेश किए। टैपर टन्ट्रम संकट के दौरान चालू खाते का घाटा जीडीपी का करीब छह फीसदी था और महंगाई दो अंक में थी।

उन्होंने कहा कि जब यह अंतर साफ तौर पर समझ में आ गया तो कृषि और विनिर्माण में सतत वृद्धि सृजित करने के लिए विशेष सुधार किए गए।

कोविड-19 के चलते लॉकडाउन के कारण आर्थिक वृद्धि पर असर थोड़े समय रहेगा। लेकिन सरकार इस बड़े पहलू को समझना चाहती थी कि इस संकट का आर्थिक विस्तार पर मध्यम एवं लंबी अवधि पर क्या असर पड़ेगा।

सुब्रमण्यन ने कहा, 'हम नहीं चाहते कि कोविड का अर्थव्यवस्था पर स्थायी असर हो। संकट को अवसर में बदलकर हम अर्थव्यवस्था को बढ़ाना चाहते हैं...संभावित आर्थिक वृद्धि की दर ऊंची रखने के लिए सुधारों को आवश्यक समझा गया।'

मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा कि श्रम और अन्य सुधारों से अर्थव्यवस्था औपचारिक बनेगी, जिससे वृद्धि भी तेज होगी और अर्थव्यवस्था में गिरकर उठने की क्षमता भी आएगी। उदाहरण के लिए 41 श्रम कानूनों को केवल चार कानूनों में तब्दील कर दिया गया है। धाराओं की संख्या 60 फीसदी घटा दी गई और न्यूनतम वेतन की संख्या 2,200 से घटाकर 40 कर दी गई।

मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा, 'आप अनुपालना को आसान बनाने को समझ सकते हैं। आपको मांग पूरी करने में लचीलापन दिया गया है। अगर मांग कम होती है तो भी नियुक्ति का डर खत्म कर दिया गया है।  आप औपचारिक क्षेत्र में ज्यादा लोगों को भर्ती करने पर ध्यान दे सकते हैं, जिससे अर्थव्यवस्था में अहम मांग पैदा होती है।'

उन्होंने कहा कि हाल में पीएलआई योजना शुरू की गई है और सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्योगों की परिभाषा में बदलाव किया गया है। ये सरकार की इस मंशा को दर्शाती हैं कि एमएसएमई क्षेत्र में रोजगार के भरपूर मौकों का सृजन हो। एमएसएमई क्षेत्र लंबे समय से मौजूद है, लेकिन बढ़ नहीं पाया और छोटा ही बना हुआ है।

उन्होंने कहा कि सुधारों पर सहमति बनाना बहुत मुश्किल है। उन्होंने कहा कि देश में बहुत से हितधारक होते हैं। आम तौर पर सुधारों से शांत बहुमत और मुखर अल्पसंख्यकके बीच तनाव पैदा होता है। इन सुधारों से शांत बहुमत को लाभ होता है और मुखर अल्पसंख्यकों को नुकसान होता है या यथास्थिति से लाभ होता है, इसलिए वे यथास्थिति बनाए रखने की कोशिश करते हैं।

उन्होंने कहा, 'इसलिए यह विचार हासिल करना मुश्किल है कि सुधारों के लिए सहमति की जरूरत होती है। शांत बहुमत के हितों को सबसे ऊपर रखना जरूरी है, जिसके पास मुखर अल्पसंख्यकों की तुलना में कम अधिकार हैं। इसी वजह से इन सुधारों को अमलीजामा पहनाया गया है।'

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