बिजनेस स्टैंडर्ड - समझदारी भरा नियमन
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समझदारी भरा नियमन

संपादकीय /  11 22, 2020

दीर्घावधि में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि के दायरे को तय करने वाले अहम कारकों में से एक है वित्तीय क्षेत्र की मजबूती। खासतौर पर बैंकिंग क्षेत्र की मजबूती। परंतु वर्तमान हालात को देखें तो भारतीय बैंकिंग जगत में सरकारी बैंकों का दबदबा है और फंसे हुए कर्ज का उनका स्तर काफी अधिक है। यह स्थिति वृद्धि संभावनाओं को कमजोर कर सकती है। भारत को अर्थव्यवस्था के उत्पादक क्षेत्रों के वित्त पोषण के लिए और अधिक निजी बैंकों की आवश्यकता है। इस संदर्भ में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने निजी बैंकों के लाइसेंसिंग और नियामकीय दिशानिर्देश की जांच के लिए कार्य समूह गठित कर बेहतर किया है। समूह ने गत सप्ताह अपनी रिपोर्ट पेश की और कई अनुशंसाएं कीं। इनमें बड़े कारोबारी घरानों को बैंकों का प्रवर्तन करने देने की अनुशंसा भी शामिल है। भारत में यह विषय हमेशा विवादास्पद रहा है। नए निजी बैंकों के लिए लाइसेंस के 2013 के दिशानिर्देशों में कुछ ढांचागत जरूरतों के साथ इसकी इजाजत दी गई थी मगर उपाय कारगर नहीं रहा। सन 2014 में छोटे वित्त बैकों की लाइसेंसिंग आवश्यकताओं में बड़े कारोबारी घरानों को बैंक खोलने से साफ मना कर दिया गया। अपनी रिपोर्ट में कार्य समूह ने कहा है कि दुनिया में कुछ ही ऐसे देश हैं जहां बड़े कारोबारियों को बैंक चलाने से रोका गया है। उसने अपनी अनुशंसा में कहा कि बैंकिंग नियमन अधिनियम, 1949 में संशोधन करके संबद्ध ऋण की समस्या को हल किया जाए।

परंतु बड़े कारोबारी घरानों को बैंक चलाने देने से जुड़े जोखिम भी जाहिर हैं। औद्योगिक और वित्तीय पूंजी का मेलजोल अच्छा विचार नहीं है। इससे संचालन संबंधी समस्याएं और हितों के टकराव सामने आ सकते हैं। भारतीय संदर्भ में देखें तो इससे गिने-चुने हाथों में बहुत अधिक ताकत आ जाएगी और व्यवस्थागत जोखिम खड़ा हो जाएगा। इसके अलावा नियामकीय निगरानी पहले ही काफी दबाव में है। कई वित्तीय संस्थानों के पतन और नियामकीय हस्तक्षेप में देरी के रूप में हमें इसका उदाहरण देखने को भी मिला है। ऐसे में नियामक और सरकार दोनों के लिए बेहतर यही होगा कि वे सतर्कता  बरतें। बैंकिंग व्यवस्था में जोखिम बढ़ाने के पहले पर्याप्त नियामकीय क्षमताएं विकसित करना कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है।

समूह की अन्य अहम अनुशंसाओं की बात करें तो 50,000 करोड़ रुपये से अधिक परिसंपत्ति वाली बड़ी गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को बैंक में बदला जा सकता है। इनमें कॉर्पोरेट घरानों द्वारा संचालित संस्थान भी शामिल हो सकते हैं मगर शर्त यह है कि उनके संचालन को 10 वर्ष पूरे हो चुके हों और वे कुछ शर्तों को पूरा करते हों। एनबीएफसी को बैंक में बदलने का विचार बेहतर है। बैंकों का नियमन बेहतर है और भारत को ज्यादा निजी बैंकों की आवश्यकता है। परंतु बड़ी कंपनियों द्वारा संचालित एनबीएफसी को बैंकों में बदलने से चिंता भी बढ़ेगी। शायद आरबीआई केवल उन एनबीएफसी के आवेदन पर विचार करे, जो वित्तीय क्षेत्र में ही ज्यादा परिचालन करने वाले समूह का हिस्सा हैं।

आरबीआई समिति ने दीर्घावधि में प्रवर्तक हिस्सेदारी को चुकता वोटिंग इक्विटी पूंजी के 15 फीसदी से बढ़ाकर 26 फीसदी करने की अनुशंसा की है। इससे स्वामित्व में विविधता लाने में मदद मिलेगी और प्रवर्तक को जरूरत पडऩे पर बैंक में और अधिक पूंजी डालने की इजाजत होगी। एक तरह से अनुशंसा में यह बात समझी गई है कि हिस्सेदारी को जबरन घटाकर 15 फीसदी पर लाने की पिछली नीति व्यर्थ है। इस बात में कोई संदेह नहीं कि भारत को बचत का प्रवाह व्यवस्थित करने और वित्तीय सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने के लिए और निजी बैंक चाहिए। नियामक को यह तय करना होगा कि नए बैंक ऐसे न हों, जिनसे जोखिम बढ़े।

स्पष्टीकरण: कोटक परिवार के नियंत्रण वाली संस्थाओं का बिज़नेस स्टैंडर्ड प्राइवेट लिमिटेड में महत्त्वपूर्ण स्वामित्त्व है।

Keyword: नियमन, वित्तीय क्षेत्र, बैंकिंग, आरबीआई, निजी बैंक, लाइसेंसिंग,
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