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निर्वात मशीनों से सफर करने के लिए हम हो रहे हैं तैयार

तकनीकी तंत्र
देवांशु दत्ता /  November 20, 2020

हाल ही में हाइपरलूप तकनीक का पहला मानव परीक्षण सफलतापूर्वक संपन्न हुआ है और अभी बहुत अधिक पूर्वानुमान लगाना थोड़ी जल्दबाजी भरा कदम होगा।  लेकिन इस बात में कोई दोराय नहीं है कि हाइपरलूप नेटवर्क एक बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

हाइपरलूप न्यूटन के नियम के तहत काम करते हैं। इसके अनुसार, अगर किसी वस्तु पर कोई बाहरी बल न लगाया जाए तो वह अपनी वर्तमान अवस्था (गति अथवा स्थिर) में ही रहती है। इस तकनीक में बाह्य घर्षण को कम करने पर काम किया गया और वाहन को निर्वात या आंशिक निर्वात ट्यूब में रखा जाता है। सैद्धांतिक स्थिति में ये वाहन अथवा पॉड बहुत कम ऊर्जा का उपयोग करके 1,000 किलोमीटर प्रति घंटे से तेज गति को हासिल कर सकते हैं।

वर्ष 2012 में एलन मस्क द्वारा इस तकनीक पर बात करने के बाद कई कंपनियों एवं शोधकर्ताओं ने इस पर काम किया। इससे जुड़ी अधिकांश प्रौद्योगिकी सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध है। इसमें उपयोग होने वाले चुंबकीय उत्तोलन तथा वैक्यूम ट्यूब 50 वर्षों से ज्यादा समय से उपलब्ध हैं लेकिन उन्हें आर्थिक रूप से व्यापक स्तर पर एक साथ लाना बड़ी चुनौती है।

इससे पहले कई मानव रहित परीक्षण हो चुके हैं और इससे संबंधित अवधारणात्मक मॉडल बनाने वाले छात्रों ने पुरस्कार भी जीते हैं। कई 'लूप' परियोजनाओं की भी घोषणा की गई है। पहला मानव परीक्षण करने वाली वर्जिन हाइपरलूप मुंबई-पुणे हाइपरलूप परियोजना को विकसित करना चाहती है और उसका यूरोप एवं पश्चिम एशिया में भी कई परियोजनाओं पर काम करने का विचार है। दावा किया गया है कि मुंबई-पुणे लूप से 160-किलोमीटर से अधिक की यात्रा को सिर्फ 25 मिनट में पूरा किया जा सकता है। दुबई-अबू धाबी के बीच एक लूप वर्ष 2020 में विकसित किया जाना था जिसे अगले साल तक पूरा किए जाने का अनुमान है।

मैरीटाइम रिसर्च इंस्टीट्यूट नीदरलैंड के शोध के अनुसार एक अंडाकार ट्रांसअटलांटिक लूप बनाया जा सकता है। इसकी सुरंग 5,500 किलोमीटर लंबी होगी जो 100 मीटर से अधिक की गहराई पर चल रही होगी, जिसमें 30 मीटर का पॉड 60 लोगों को ले जा सकेगा।

तो 17 वीं शताब्दी के भौतिकी का उपयोग करना वर्तमान इंजीनियरों के लिए इतना मुश्किल क्यों हो रहा है, जबकि इस तकनीक से लंबी यात्राएं करना काफी आसान हो सकता है।

पॉड एक ट्यूब या सुरंग के अंदर लगभग निर्वात की स्थिति में सफर करेगा। लंबी दूरी तक निर्वात की स्थिति को बनाना तथा उसे बनाए रखना काफी महंगा होता है। हाइपरलूप रास्ता वास्तव में एक लूप नहीं है। आंशिक झुकाव, मोड़ आदि के साथ यह एक सीधी रेखा में होना चाहिए और किसी भी आंशिक उतार-चढ़ाव से ऊर्जा खपत बढ़ जाएगी। इसके चलते केवल कुछ क्षेत्रों में ही लूप बनाए जा सकते हैं। साथ ही, भूमि अधिग्रहण भारत समेत सभी देशों में एक अहम मुद्दा है क्योंकि इसके लिए सीधी रेखा बहुत जरूरी है। अगर पानी के बाहरी दबाव को नियंत्रित कर लिया जाए तो पानी के अंतर लूप बनाए जा सकते हैं।

चुंबकीय उत्तोलन निश्चित तौर पर आगे की राह है तथा हवा के गद्दों जैसे होवरक्राफ्ट का उपयोग करने का भी सुझाव दिया जा रहा है। चुंबकीय उत्तोलन तकनीक (मैग्लेव) वाली ट्रेनें आसानी से 400 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार पकड़ सकती हैं, इसलिए सैद्धांतिक हाइपरलूप गति अवास्तविक नहीं है। यात्रियों को सांस लेने देने के लिए पॉड में दबाव रखना होगा और मानव शरीर पर पडऩे वाले गुरुत्वाकर्षण प्रभाव का भी ध्यान रखना होगा।


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पहली नजर में मानव सफर काफी निराशाजनक रहा। 107 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दो यात्रियों को 395 मीटर दूर तक ले जाया गया। लेकिन क्या इस गति से 10 गुना तेजी के साथ हजारों यात्रियों को सैकड़ों किलोमीटर दूर ले जाया जा सकता है? हालांकि हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि मानव द्वारा बनाई गई पहली गाड़ी घोड़ों से धीमा चलती थी।

अहम बात यह है कि क्या ऐसी प्रणाली लागत के हिसाब से वाजिब होगी? संभावित रूप से इससे काफी अधिक ऊर्जा बचत हो सकती है। इस ऊर्जा बचत को विनिर्माण एवं रखरखाव की उच्च लागत के खिलाफ संतुलित होना चाहिए। यदि एक एक्सप्रेसवे के निर्माण और रखरखाव के लिए एक्स प्रति किलोमीटर की लागत है, तो हाइपरलूप प्रणाली इससे कई गुना लागत के साथ विकसित होगी। हालांकि वहीं, पॉड के सफर में ऊर्जा खर्च कम हो जाएगा।

तो क्या यह समीकरण काम करेगा? लंदन से पेरिस तक के 480 किलोमीटर के यूरोस्टार को बनाने में 5 अरब डॉलर की लागत आएगी और यहां ट्रेन 300 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलेंगीं। सैन फ्रांसिस्को-लॉस एंजलिस हाइपरलूप प्रणाली में 650 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की रफ्तार होगी। इसकी अनुमानित लागत 7 अरब डॉलर है, लेकिन वास्तविक लागत इससे अधिक होने के अनुमान हैं।

यदि हाइपरलूप इन चुनौतियों का उपाय खोज लेते हैं और अपने वादे के अनुसार चलते हैं तो लोग भीड़भाड़ वाले शहरों से आसानी से बाहर आ सकते हैं और आवागमन कर सकते हैं। जिस तरह ऑटोमोबाइल के व्यवहार्य होने से पूरी दुनिया बदल गई, उसी तरह हाइपरलूप से एक बार फिर बड़ा बदलाव आ सकता है।

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