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खराब हवा का समाधान सही समझ से संभव

आयुष पटनायक और अजय शाह /  November 12, 2020

उत्तर भारत इन दिनों वायु गुणवत्ता के मामले में मुश्किल हालात से गुजर रहा है। इसका 60 करोड़ लोगों की सेहत पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। इस समस्या का समाधान करना नीति निर्माताओं के लिए पूरी तरह संभव है। इसका एक प्रमुख तरीका समस्या की जड़ पर प्रहार करना है- हवा में धूल की मात्रा कम करते हुए। लेकिन भारत में इस बारे में जुटाए गए आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं। इसके पुख्ता सबूत हैं कि पंजाब एवं हरियाणा में पराली जलाने के पीछे वर्ष 2009 में जल संरक्षण के इरादे से बनाए गए कानूनों की बड़ी भूमिका है। इन राज्यों में पराली जलाने की घटनाओं में तेजी 2009 के बाद ही आई है। लिहाजा दोनों ही राज्यों को अपने ये कानून निरस्त करने की जरूरत है।

उत्तर में हिमालय और दक्षिण में दक्खन के पठार के बीच उत्तर भारत के गंगा के मैदान एक कटोरे की तरह हैं। मॉनसून का असर कम होने के बाद हल्की हवा एवं बारिश ही रह जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि हवा में धूल बढ़ती जाती है और वहां देर तक रहती है। बीते दशक में इंसानी क्रियाकलापों की वजह से हवा में धूल की मात्रा पहले की तुलना में बढ़ी है और आज एक स्वास्थ्य आपदा बन चुकी है।

दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित पांच शहरों में से चार सिंधु-गंगा के मैदान में ही स्थित हैं। वायु गुणवत्ता का खराब होना केवल सांस की तकलीफों के ही लिए समस्या नहीं है, यह इंसानी सेहत के लिए दूसरी तरह की समस्याएं भी पैदा करता है जिनमें बुजुर्गों की गिरती सेहत भी शामिल है। सिंधु एवं गंगा नदी के मैदानी इलाकों में करीब 60 करोड़ की आबादी रहती है और पिछले दशक में हवा की गुणवत्ता खराब होने से इतने लोगों की सेहत के लिए एक बड़ा संकट पैदा हुआ है। भारत में स्वास्थ्य नीति की एक अहम प्राथमिकता यह है कि वायु गुणवत्ता को 15 साल पहले के स्तर पर ले जाया जाए।

हम हवा एवं बारिश को तो नहीं बदल सकते हैं, हमारे हाथ में केवल इतना ही है कि हवा में धूल फैलाने वाले क्रियाकलापों पर लगाम लगाई जाए। हवा में मौजूद धूल के बारे में सबसे अहम सवाल यह है कि यह धूल आती कहां से है? इसे 'स्रोत विभाजन अध्ययन' के जरिये अंजाम दिया जाता है जिसमें हवा का एक नमूना इक_ा कर उसमें मौजूद तत्त्वों की पहचान की जाती है। दुनिया भर के शहरों में ऐसे अध्ययन लगातार होते रहते हैं। लेकिन भारत में ऐसा एक अध्ययन वर्ष 2014-15 में ही किया गया था। इस तरह समुचित आंकड़ों की कमी ने समझ विकसित करने एवं समुचित कदम उठाने को प्रभावित किया है।

चीन हवा की गुणवत्ता बेहद खराब होने को लेकर बदनाम हुआ करता था लेकिन उसने इस दिशा में प्रगति की है। मसलन, दिल्ली में पिछले दिनों पीएम 2.5 मानक का स्तर 158 से लेकर 565 तक रहा जबकि इसी अवधि में पेइचिंग में इसका स्तर 109 से 184 तक ही रहा। सतत स्रोत विभाजन के लिए सांख्यिकीय ढांचे की स्थापना चीन को वायु गुणवत्ता के मोर्चे पर बेहतर मुकाम हासिल करने में अहम घटक बनकर उभरी है।

सतत स्रोत विभाजन प्रणाली नहीं होने से मॉडल-आधारित अनुमानों को बल मिला है और उत्तर भारत के वायु गुणवत्ता संकट के बारे में समझ एवं समाधान को लेकर संदेह बढ़ा है। लेकिन यह देखना महत्त्वपूर्ण है कि सिर्फ 15 साल पहले ही उत्तर भारत में वायु गुणवत्ता काफी बेहतर हुआ करती थी और इस अवधि में ही कुछ ऐसा हुआ है जिसने वायु गुणवत्ता संकट पैदा किया है। आखिर इस दौरान क्या बदला है?

इस बारे में एक अहम शोध-पत्र जून 2019 में 'नेचर सस्टेनेबिलिटी' में प्रकाशित हुआ था। बलविंदर सिंह एवं अन्य के इस शोध में पाया गया कि वर्ष 2009 में पंजाब और हरियाणा ने जल संरक्षण की दिशा में नए कानून बनाए थे। इन कानूनों ने सरकार को यह शक्ति दी थी कि वे धान की पौध से रोपाई पर रोक लगाने की तारीख तय कर सकते हैं। अर्थशास्त्र एवं लोक नीति के संदर्भ में ऐसे कानून एक खराब सोच हैं क्योंकि सरकार को किसानों की निजी पसंद में घुसपैठ नहीं करनी चाहिए। ऐसे जबरन दखल से अवांछनीय नतीजे सामने आ सकते हैं।

किसानों ने यह दलील दी है कि राज्य सरकारों के नीतिगत कदमों की वजह से खरीफ एवं रबी फसलों के बीच के दिनों में कमी आई है और इसके चलते खेतों को जल्दी से साफ करने के लिए किसानों में पराली को जलाने की प्रवृत्ति बढ़ी है। भारत में स्वास्थ्य संबंधी सांख्यिकीय प्रणाली पहले से ही कमजोर होने के बीच शोधकर्ता उपग्रहों से प्राप्त तस्वीरों का इस्तेमाल कर जलाई जा रही फसलों का आकलन करने में सक्षम हैं। वे जमीन पर मौजूद निगरानी केंद्रों से मिले पीएम 2.5 आंकड़ों का मिलान उपग्रहीय अनुमानों से कर सकते हैं और इस तरह वे 2009 में ये कानून बनाए जाने के बाद हुए बदलावों का परीक्षण करने में सक्षम हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इन कानूनों के आने से पराली जलाने की प्रवृत्ति में जबरदस्त तेजी देखी गई है। इसकी वजह से पराली जलाने का वक्त भी 24 अक्टूबर से लेकर 4 नवंबर हो गया जब तापमान कम होता है और हवा की रफ्तार भी कम होती है। इसकी वजह से वायु गुणवत्ता में 29 फीसदी की गिरावट आई।

अगर 2009 में बने इन कानूनों ने वायु गुणवत्ता संकट को जन्म दिया है तो फिर भावी नीतिगत कदम इस समस्या की जड़ पर प्रहार करने का ही होना चाहिए और इन कानूनों को खत्म कर देना चाहिए। निश्चित रूप से जल संरक्षण के कई दूसरे तरीके भी हो सकते हैं और कृषि विशेषज्ञ इनके बारे में पता कर सकते हैं। हमें खास तरह की आर्थिक गतिविधियां शुरू करने के बारे में किसानों को आदेश देने की राज्य की बाध्यकारी शक्ति वाले नजरिये के बजाय निश्चित रूप से नरम रुख वाले दखल की जरूरत है।

कानून बने हुए 11 साल हो चुके हैं और इस दौरान उत्तर भारत में साफ हवा होना तो बड़ी तेजी से बीतों दिनों की याद बनती जा रही है। फिर भी हमें हार नहीं माननी चाहिए, अगर सही बौद्धिक क्षमता का इस्तेमाल किया जाए तो ऐसी समस्याओं को हल किया जा सकता है। कई देशों को खराब वायु गुणवत्ता की समस्या का सामना करना पड़ा है और वे सही बौद्धिक तरीका अपनाकर इससे उबरे भी हैं। मसलन, वर्ष 2011 में 'एटमॉस्फेरिक एनवायरनमेंट' में प्रकाशित डेविड पैरिस एवं अन्य के एक लेख में लॉस एंजलिस के बारे में बताया गया था। इसमें कहा गया था, 'यह कहना सही है कि 50 साल पहले सबसे प्रदूषित शहरों में से एक रहा यह महानगर अब सबसे कम प्रदूषित शहरों में से एक है।'

भारत की मौजूदा स्थिति को देखते हुए दो काम जरूरी लगते हैं। पहला, वायु गुणवत्ता पर सटीक आंकड़े जुटाने के लिए एक ठोस सांख्यिकीय व्यवस्था और शोधकर्ताओं के एक समुदाय का सृजन। दूसरा कदम है पंजाब एवं हरियाणा में बने जल संरक्षण कानूनों  को खत्म करना। इन दोनों राज्यों को इसमें निहित अपना हित भी देखना चाहिए क्योंकि खराब हवा से उनके निवासियों की सेहत भी प्रभावित होती है। इसके साथ ऐसी व्यवस्था बनाने की भी जरूरत है जिसकी मदद से दूसरे राज्य पंजाब एवं हरियाणा से मुआवजे की मांग कर सकें। 

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