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अमेरिका में बदलाव

संपादकीय /  11 09, 2020

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनावों के बाद मतगणना का सिलसिला जारी रहा और चंद रोज बीतने पर समाचार माध्यम इस नतीजे पर पहुंच गए कि पूर्व उपराष्ट्रपति जो बाइडन को पर्याप्त मत मिले हैं और वह राष्ट्रपति चुनाव जीत गए हैं। निवर्तमान राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप हार स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं और कानूनी सहायता लेने के साथ-साथ उन राज्यों में मतों की पुनर्गणना की मांग कर सकते हैं जहां मतों का अंतर कम रहा है। बहरहाल, बाइडन की जीत तय लग रही है और वह दुनिया भर के बड़े नेताओं की ओर से मिल रही बधाइयां स्वीकार कर रहे हैं। बधाई देने वालों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हैं। बाइडन के अलावा कैलिफोर्निया की सीनेटर कमला हैरिस को उपराष्ट्रपति चुना गया है। यह बात भारत के लिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वह तमिलनाडु से अमेरिका गईं एक प्रवासी की बेटी हैं।

जीत के बाद बाइडन ने अपने गृह राज्य डेलावेयर से दिए एक भाषण में बतौर 46वें अमेरिकी राष्ट्रपति अपनी कुछ प्राथमिकताओं का जिक्र किया। इसका ज्यादातर हिस्सा विभाजित हो चुके देश को एकजुट करने और उसके घाव भरने से संबंधित था लेकिन उन्होंने अपनी कुछ नीतिगत प्राथमिकताओं के संकेत भी दिए। उन्होंने कोविड-19 महामारी को नियंत्रित करने की तात्कालिक प्राथमिकता पर बल दिया। गौरतलब है कि अमेरिका में इस समय रोज रिकॉर्ड संख्या में संक्रमण के नए मामले सामने आ रहे हैं। उन्होंने जलवायु परिवर्तन को भी अपनी अहम प्राथमिकता बताया।

भारत के लिए बाइडन की जीत मिलीजुली है। आमतौर पर भारत के रिश्ते डेमोक्रेट के बजाय रिपब्लिकन राष्ट्रपतियों के साथ बेहतर रहे हैं। वे एक लोकतंत्र के रूप में भारत के कद पर ध्यान देते हैं और अधिनायकवाद के खिलाफ उसे उपयोगी मानते हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति मानवाधिकारों, धार्मिक आजादी और (अतीत में) परमाणु अप्रसार को लेकर अधिक चिंतित रहे हैं। मोदी ने अपने ट्वीट में नवनिर्वाचित राष्ट्रपति को बधाई देते हुए याद किया कि कैसे बतौर उपराष्ट्रपति बाइडन ने दोनों देशों के रिश्तों को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। उपराष्ट्रपति बनने से पहले भी 2008 में बाइडन ने भारत-अमेरिका परमाणु समझौते को लेकर अमेरिकी कांग्रेस में समर्थन जुटाने में अहम भूमिका निभाई थी। उस वक्त उन्होंने आशा जताई थी कि भारत-अमेरिका के रिश्ते 21वीं सदी के सबसे करीबी रिश्ते होंगे। बराक ओबामा के कार्यकाल के आखिरी वर्षों में ऐसे कई अवसर आए जब दोनों देशों के आपसी रिश्ते काफी करीबी से विकसित हुए। खासतौर पर सैन्य और सामरिक क्षेत्र में। भारत चाहेगा कि वह गतिशीलता बरकरार रहे।

इस लिहाज से कुछ चिंता की बात भी है। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि 21वीं सदी में व्यक्तिगत कूटनीति बहुत अहम है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसका बखूबी इस्तेमाल करते हैं। परंतु खेद की बात यह भी है कि हाल के वर्षों में भारत सरकार ने खुद को राजनीतिक रूप से ट्रंप प्रशासन से जोड़ लिया। उसने पारंपरिक द्विपक्षीय पहुंच के बजाय 'हाउडी मोदी' जैसी रैली में शिरकत की। सरकार ने अमेरिका के कुछ प्रगतिशील डेमोक्रेटिक सांसदों से अनावश्यक दूरी बना ली जो अब बाइडन प्रशासन में अहम पद पा सकते हैं। इन अपरिपक्व गलतियों से निजात पाने के लिए काफी प्रयास करने होंगे। बहरहाल, भारत-अमेरिका रिश्ते की गतिशीलता को नकारा नहीं जा सकता। वीजा और आव्रजन जैसी बातों में अब कम समस्या आएगी और व्यापार वार्ताएं भी पहले से आसान होंगी। भारत सरकार ने जलवायु परिवर्तन पर ध्यान केंद्रित किया है और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में उसने अंतरराष्ट्रीय पहुंच बढ़ाई है। अब उसे अमेरिका के रूप में एक उत्साही साथी मिलेगा। थोड़े प्रयास से अमेरिकी सत्ता का यह बदलाव भारत के पक्ष में किया जा सकता है।

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