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गलत चीज को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश

ए के भट्टाचार्य /  October 27, 2020

हालिया मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है कि केंद्र सरकार अपने वित्त पर कोविड-19 महामारी के दुष्प्रभावों के मद्देनजर राजकोषीय दायित्व एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) अधिनियम की समीक्षा कर रही है। ऐसा ही एक विचाराधीन प्रस्ताव राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को एक अंक में सीमित रखने के बजाय एक लचीले दायरे में रखने का है।

इस महीने के अंत में 15वें वित्त आयोग की अंतिम रिपोर्ट आने वाली है। आयोग की भी सोच यही है कि राजकोषीय घाटे का एक दायरा तय करने के विचार का वक्त आ गया है। लिहाजा उम्मीद यही है कि तीन महीने बाद पेश होने वाले वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में राजकोषीय घाटा लक्ष्य का एक आंकड़ा देने के बजाय एक दायरा तय कर दिया जाए। अर्थव्यवस्था के नॉमिनल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के एक प्रतिशत के रूप में यह आंकड़ा पेश किया जाता है।

अधिकांश देशों की तरह भारत ने हमेशा ही राजकोषीय घाटे का लक्ष्य एक अंक का ही रखा है। एफआरबीएम अधिनियम लागू होने के बाद केंद्र सरकार को तय राजकोषीय घाटा लक्ष्यों के मुताबिक चलना जरूरी था। वर्ष 2018 में इस कानून को संशोधित किए जाने के बाद कुछ खास परिस्थितियों में लक्ष्य से 0.5 फीसदी अंक विचलन की अनुमति दे दी गई।

कुछ साल पहले इस पर चर्चा हो रही थी कि सरकार के राजकोषीय मजबूती लक्ष्यों को क्या इसके ऋण स्तर से जोड़ा जाना चाहिए? लेकिन केंद्र सरकार ने राजकोषीय घाटे को अपना प्राथमिक लक्ष्य बनाने का फैसला किया। राजकोषीय घाटे के पैमाने से सरकार के प्रदर्शन को आंकने की प्रवृत्ति में गत 10 वर्षों में कुछ नरमी आई है। मसलन, चार मौकों पर वास्तविक राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष के शुरू में निर्धारित लक्ष्य से अधिक निकला। तीन वर्षों में राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को हासिल किया गया जबकि तीन बार ये लक्ष्य से बेहतर रहे।

हालांकि इन 10 वर्षों में राजकोषीय समेकन का रास्ता थोड़ा बेहतर रहा। वर्ष 2010-11 में जीडीपी के 4.9 फीसदी रहा राजकोषीय घाटा वर्ष 2011-12 में बढ़कर 5.9 फीसदी हो गया था। लेकिन बाद के लगातार सात वर्षों में केंद्र सरकार का घाटा लगातार नीचे ही आता गया है। इस गिरावट का बड़ा कारण तेल कीमतों में आई कमी और इस क्षेत्र से सरकार का मोटा राजस्व वसूलना था। लेकिन बीते एक साल में राजकोषीय घाटे का पथ एक बार फिर से चिंताजनक दिशा में जाता दिख रहा है। वर्ष 2018-19 में 3.4 फीसदी रहा राजकोषीय घाटा 2019-20 में 4.6 फीसदी हो गया।

वित्त वर्ष 2020-21 में बने हालात से कोई भी अनजान नहीं है। इसका मतलब है कि इस साल राजकोषीय समेकन लक्ष्य से कम रहेगा। वर्ष 2020-21 के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी का 3.5 फीसदी तय किया गया था लेकिन सरकार के राजस्व में बड़ी गिरावट आने से इसका व्यय बोझ भी बजट अनुमानों से अधिक ही रहेगा। सरकार ने इस साल 4 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त उधारी की योजना पहले ही बनाई हुई है, लिहाजा इस साल राजकोषीय घाटे के बजट अनुमान से काफी अधिक रहने के आसार हैं।

ध्यान रहे कि एक तीव्र राजकोषीय ह्रास के इस संदर्भ में ही लचीले दायरा-उन्मुख घाटा लक्ष्यों का विचार पेश किया गया है। सरकार के राजकोषीय समेकन प्रयासों को परखने की नई व्यवस्था बनाने से सार्वजनिक विमर्श को एक दायरा-केंद्रित लक्ष्य निर्धारण की तरफ ले जाने में मदद मिलनी चाहिए। राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी का 3 फीसदी तय करने और उसमें 0.2 फीसदी विचलन की गुंजाइश का विचार पिछले दो वर्षों में हुई तीव्र राजकोषीय फिसलन से कहीं बड़ी घटना होगी। अगले साल फिसलन होने पर विमर्श आसानी पर इस पर केंद्रित हो सकता है कि 5 फीसदी की सीमा भी नहीं छुई गई है। फिर भी नीति विश्लेषकों एवं रेटिंग एजेंसियों के नजरिये से देखें तो 3 फीसदी घाटे का लक्ष्य रखा जाएगा जिसे सरकार हासिल करना चाहती है। उसी समय यह दलील भी दी जाएगी कि घाटा राजकोषीय समेकन की राह में निर्दिष्ट व्यापक दायरे के भीतर ही सीमित है। वर्ष 2021-22 में 3.3 फीसदी या 2022-23 में 3.1 फीसदी का राजकोषीय घाटा लक्ष्य हासिल करने में बहुत दिक्कत नहीं आएगी। सरकार के हालिया मध्यम-अवधि राजकोषीय नीति-सह-राजकोषीय नीति रणनीति वक्तव्य में यह अनुमान जताया गया है।

लिहाजा दायरा-उन्मुख लचीला घाटा लक्ष्य तय करने की तरफ बढऩे का वक्त इस विचार से कहीं ज्यादा अहम है। सिद्धांत रूप में यह एक अनुकरणीय विचार है। लेकिन लागू होने के समय के चलते आलोचक इस बदलाव को एक भुलावे और राजकोषीय समेकन की चुनौतियों से ध्यान भटकाने की कोशिश के रूप में देख सकते हैं। यह बदलाव पिछले वर्षों में राजकोषीय मोर्चे पर सरकार के प्रदर्शन की तुलना को भी थोड़ा मुश्किल बना देगा। आखिर आप अगले साल के दायरा-उन्मुख लक्ष्य की तुलना बीते वर्षों के तय लक्ष्यों एवं उनके अनुपालन से कैसे कर सकते हैं?

15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष एन के सिंह ने कहा है कि एक संख्या के बजाय एक दायरे को लक्ष्य बनाना अधिक मुफीद है क्योंकि यह मौद्रिक नीति लक्ष्यों के साथ संगति में होगा और इससे 'कम लेखांकन इंजीनियरिंग' की जरूरत होगी। वर्ष 2016 से मौद्रिक नीति समीक्षाओं को 4 फीसदी की खुदरा मुद्रास्फीति लक्ष्य प्राप्ति से जोड़ा जा चुका है जिसमें इधर या उधर 2 फीसदी अंक के विचलन की अनुमति है। लचीले खुदरा मुद्रास्फीति लक्ष्य- निर्धारण ने मौद्रिक नीति के मामले में निश्चित रूप से काम किया है। मुद्रास्फीति एवं राजकोषीय घाटे का लक्ष्य तय करने में जिस तरह से एकरूपता सुनिश्चित की गई है वह सिद्धांत रूप में एक बढिय़ा विचार है, भले ही इस निर्णय का समय समस्या पैदा कर सकता है। लेकिन क्या इससे लेखांकन इंजीनियरिंग में भी कमी आएगी?

केंद्र सरकार की राजकोषीय फिसलन पैदा करने वाली प्रमुख समस्या एक साल में जुटाए जा सकने वाले राजस्व एकत्रीकरण का सटीक अनुमान लगा पाने में इसकी असफलता है। पिछले 10 बजटों में से छह में सरकार का वास्तविक शुद्ध कर संग्रह इसके प्रारंभिक अनुमान से 4-18 फीसदी तक कम रहा है। पिछले 10 में से सात वर्षों में राजकोषीय फिसलन दर्ज की गई और गैर-कर राजस्व 3 से लेकर 33 फीसदी तक कम रहा। विनिवेश प्रक्रिया के संदर्भ में पिछले 10 में सात साल फिसलन रही और राजस्व न्यूनता 14 फीसदी से लेकर 55 फीसदी तक रही।

यह सच है कि राजस्व संग्रह का बढ़ा-चढ़ाकर अनुमान लगाने की समस्या गत दो वर्षों में और भी बढ़ी है और इस साल के हालात देखते हुए स्थिति और बिगडऩे की ही आशंका है। लेकिन इस समस्या का जन्म हाल ही में नहीं हुआ है। कई वर्षों से राजस्व संग्रह का अधिक अनुमान लगाने की वजह से सरकार राजकोषीय मजबूती की राह पर चलने में असफल रही है। राजस्व व्यय को काबू में रख पाने की इसकी क्षमता सीमित रही है। पूंजीगत व्यय में की गई कटौती का बहुत कम प्रभाव रहा है क्योंकि सरकार के कुल खर्च में पूंजीगत व्यय का हिस्सा 13-14 फीसदी के निम्न स्तर पर ही रहा है।

इस तरह बजट पेश करते समय राजस्व आकलन को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने की एक स्पष्ट प्रवृत्ति रही है। इसे यह दिखाने के लिए किया जाता है कि राजकोषीय घाटा लक्ष्य एफआरबीएम अधिनियम के अनुरूप है। इसके अलावा यह सरकार की छवि राजकोषीय रूप से सक्षम दिखाने में भी मददगार होता है। अगर दायरा-उन्मुख राजकोषीय घाटा लक्ष्य निर्धारण का मकसद लेखांकन इंजीनियरिंग में कमी लाना है तो राजस्व पूर्वानुमान की कवायद को अधिक सटीक एवं वास्तविक बनाने से अधिक तीव्र एवं टिकाऊ परिणाम निकलने चाहिए। फिर घाटे को एक दायरे में लक्षित करने की जरूरत भी नहीं रह जाएगी। सरकार अपने राजकोषीय घाटा लक्ष्य को एक अंक में ही निर्धारित करने की मौजूदा परंपरा जारी रख सकती है।

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