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डिजिटल मुद्रा दौड़ में पीछे न रह जाए भारत

श्याम सरन /  October 21, 2020

इतालवी यात्री मार्को पोलो ने 13वीं सदी में चीन की अपनी यात्रा का ब्योरा देते हुए वहां कागज की मुद्र्रा के इस्तेमाल का जिक्र किया तो यूरोप में इसे एक फंतासी मान लिया गया। चीन ने थांग साम्राज्य के समय नौवीं सदी में ही प्रॉमिसरी नोट के तौर पर कागजी मुद्र्रा का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था। इसके कई सौ साल बाद यूरोप में कागजी मुद्र्रा का चलन शुरू हुआ। इस लिहाज से देखें तो दुनिया की पहली संप्रभु डिजिटल मुद्र्रा (सीबीडीसी) के चलन में चीन की पहल से कोई भी फंतासी नहीं जुड़ी है। चीन कई शहरों में इस मुद्र्रा से संबंधित परीक्षण शुरू भी कर चुका है।

चीनी जनवादी बैंक (पीबीओसी) के मुताबिक इन परीक्षणों के तहत 1.13 लाख निजी डिजिटल वॉलेट और 9,000 कॉर्पोरेट वॉलेट ई-युआन के लिए बनाए गए हैं जिनके जरिये 16 करोड़ डॉलर से भी अधिक राशि का लेनदेन किया जा चुका है। डिजिटल मुद्र्रा दो चरणों वाली एक प्रणाली के जरिये काम करेगी। वाणिज्यिक बैंक ई-युआन के वितरण के लिए प्रवेशद्वार के रूप में काम करेंगे, जैसे कि बैंक मौजूदा दौर में ग्राहकों को नकद बांटते हैं। हालांकि एक वॉलेट में रखे जाने वाले ई-युआन की अधिकतम संख्या तय होगी ताकि वित्तीय मध्यस्थता में बैंकिंग प्रणाली की भूमिका खतरे में न पड़े।

ई-युआन के प्रायोगिक इस्तेमाल को बिलों के भुगतान, कैटरिंग सेवाओं, परिवहन, खरीदारी एवं सरकारी सेवाओं में परखा जा चुका है। पीबीओसी इस डिजिटल मुद्र्रा का विस्तार सीमापार भुगतान में भी करने की योजना बना रहा है। इसके डिप्टी गवर्नर फान यिफी का कहना है कि 'सीमापार भुगतान में हम अंतर-परिचालन क्षमता हासिल कर लेंगे और कम लागत, कम जोखिम एवं उच्च असरकारिता के असमंजस का भी हल खोज निकालेंगे। हम निजी क्षेत्र के साथ भागीदारी में डिजिटल साख मुद्र्रा का इस्तेमाल और निरंतर दीर्घकालिक तकनीकी प्रगति के साथ डिजिटल साख मुद्र्रा का एक गठजोड़ भी बनाएंगे। यह गठजोड़ न्याय-क्षेत्र से परे जाने वाले नियमों को लागू करने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का पालन भी करेगा।'

स्पष्ट है कि फान जिस वैश्विक गठजोड़ का जिक्र कर रहे हैं, उसमें बेल्ट एवं सड़क अभियान (बीआरआई) के साझेदार देश शामिल हो सकते हैं। वित्तीय एकीकरण इस अभियान का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है और इसे हासिल करने के लिए ई-युआन आधारित डिजिटल भुगतान प्रणाली के इस्तेमाल से बेहतर तरीका भला क्या हो सकता है? चीन ने डिजिटल मुद्र्रा की होड़ में शुरुआती पहल कर दी है और इस संबंध में अंतरराष्ट्रीय मापदंड तय कर वह बढ़त भी ले सकता है।

वित्तीय विशेषज्ञों एवं अंतरराष्ट्रीय बैंकरों के मुताबिक 'सीबीडीसी का आना अपरिहार्य दिखने लगा है। सीबीडीसी की ट्रेन स्टेशन से चल पड़ी है और अब रफ्तार पकडऩे लगी है। इस ट्रेन में चढऩे का मौका गंवाने वाले लोग पीछे छूट जाएंगे और हमारे वक्त की शायद सबसे अहम भूराजनीतिक एवं वृहद-आर्थिक प्रगति से वंचित रह जाएंगे।'

इस साल की शुरुआत में छह केंद्रीय बैंकों ने सीबीडीसी पर तालमेल करने का फैसला किया था और इसके संभावित डिजाइन, संरचना, नियमन एवं कानूनी मसलों के अध्ययन के लिए एक कार्यसमूह भी बनाया गया था। इस समूह को मौजूदा बैंकिंग प्रणाली एवं भुगतान व्यवस्थाओं के साथ सीबीडीसी के सामंजस्य के तरीके भी सुझाने थे। ब्रिटेन, कनाडा, जापान, स्वीडन, स्विट्जरलैंड एवं यूरोपीय केंद्रीय बैंक अंतरराष्ट्रीय समाधान बैंक (बीआईएस) के बनाए इस गठजोड़ का हिस्सा थे। बाद में अमेरिका का फेडरल रिजर्व भी इसमें शामिल हो गया। इस कार्य समूह की रिपोर्ट हाल ही में जारी हुई है और इस पर गहरी नजर डालने की जरूरत है।

बीआईएस ने डिजिटल मुद्र्रा की एक परिभाषा तय की है। इसके मुताबिक, 'एक सीबीडीसी को परिवर्तनीय, सहज, आसान पहुंच एवं कम लागत वाला होना चाहिए। अंतर्निहित व्यवस्था  में लचीलापन, 24 घंटे उपलब्धता, अंतर-परिचालन क्षमता और निजी एवं आम जनता के लिए सुरक्षित होना चाहिए। इसके साथ सीबीडीसी जिस भुगतान प्रणाली पर मौजूद होता है उसमें नवाचार, प्रतिस्पद्र्धा एवं सहयोग से लाभान्वित होने के लिए निजी क्षेत्र को भी शामिल करना चाहिए।' मकसद यह है कि एक जोखिम-मुक्त केंद्रीय बैंक मुद्र्रा बनाई जाए जो नकदी की पूरक हो, न कि उसकी जगह ले। अगर एक विदेशी डिजिटल मुद्र्रा (जैसे ई-युआन) या निजी डिजिटल मुद्र्रा (फेसबुक द्वारा समर्थित लिब्रा की तरह) पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने लगें तो उससे जुड़े जोखिमों का भी ध्यान रखना होगा। डिजिटल मुद्र्रा के निजी एवं विदेशी होल्डिंग पर सीमाएं तय करने का फैसला भी लिया जा सकता है।

साफ है कि निजता का मसला अहम है। चीन की डिजिटल मुद्र्रा प्रणाली में निजता पर कम ध्यान दिया गया है और वह अपनी प्रणाली को 'नियंत्रित स्वायत्तता' सुनिश्चित करने वाला बताता है। चीनी ई-युआन का लक्ष्य परिवर्तनीयता न होकर अंत:परिचालन क्षमता हासिल करना है। लेकिन चीन की तरह पश्चिमी संकल्पना में भी वाणिज्यिक बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों की भूमिका को कमतर न करने की दृढ़ इच्छाशक्ति है। प्रतिभागी केंद्रीय बैंकों ने परीक्षण के पहले दो अवधारणा साक्ष्य (पीओसी) कदमों का खाका तैयार करने का फैसला किया है। पहले चरण का पीओसी मार्च 2021 में पूरा हो जाएगा।

ये बड़े केंद्रीय बैंक चीन की तरफ से पहले ही उठाए जा चुके कदमों की वजह से सीबीडीसी को आत्मसात करने से जुड़े कदम उठाते रहे हैं। संयोग से उनकी प्रतिक्रिया चीन में ईजाद की गई कागजी मुद्र्रा के चलन को अपनाने से कहीं अधिक तीव्र है। वे लिब्रा जैसी निजी क्रिप्टो मुद्र्राओं की वजह से केंद्रीय बैंकों की सार्वभौम गतिविधियों को कमतर करने की आशंका को भी ध्यान में रख रहे हैं।

दुनिया भर के 80 केंद्रीय बैंक अपनी डिजिटल मुद्रा के सृजन, विकास एवं क्रियान्वयन की संभावनाएं तलाश रहे हैं। इनमें सिंगापुर एवं थाईलैंड जैसे एशियाई देश भी शामिल हैं। इस मामले में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का रवैया सुस्ती भरा रहा है और लंबे वक्त में यह नुकसानदेह साबित हो सकता है। वर्ष 2017 में ऐसी खबरें थीं कि आरबीआई 'लक्ष्मी' नाम की डिजिटल मुद्र्रा की संभावना पर गौर कर रहा था। रुपये के समर्थन पर आधारित इस डिजिटल मुद्र्रा के चलन की संभावना तलाशने के लिए एक कार्यसमूह भी बनाया गया था। वर्ष 2018 में आर्थिक मामलों के विभाग की एक अंतर-मंत्रालय समिति को निजी क्रिप्टो मुद्र्राओं के नियमन के लिए प्रावधान तय करने का दायित्व सौंपा गया। इस समिति ने भी सार्वभौम डिजिटल मुद्रा का जिक्र करते हुए कहा था कि 'भारत में एक सरकारी डिजिटल मुद्र्रा शुरू करने के बारे में खुला दिमाग रखना उचित होगा।'

हालांकि आरबीआई गवर्नर का मत है कि डिजिटल मुद्र्रा जारी करने के बारे में कुछ कहने के लिए अभी बहुत जल्दबाजी होगी। उन्होंने कहा कि इसके लिए 'जरूरी तकनीक अभी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाई है और वह तो अभी आरंभिक दौर में ही है।' लेकिन यह तकनीक पहले ही विकसित हो चुकी है और चीन की अगुआई में तमाम बड़ी अर्थव्यवस्थाएं डिजिटल सार्वभौम मुद्र्राओं को अपनाने की कगार पर पहुंच चुके हैं।  

भारत को भी इस दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहिए। उसे डिजिटल मुद्र्रा की संभाव्यता एवं जरूरी सुरक्षा प्रावधानों का अध्ययन कर रहे सात केंद्रीय बैंकों के समूह में शामिल हो जाना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक डिजिटल इंडिया का नारा दिया है और देश का डिजिटल बैंकिंग एवं भुगतान क्षेत्र बड़ी तेजी से बढ़ रहा है। इस खेल में आगे बने रहने के लिए इन बातों का भी फायदा उठाया जाना चाहिए। पीछे रहने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

(लेखक पूर्व विदेश सचिव एवं सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के वरिष्ठ फेलो हैं)

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