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भारत में नीति-निर्माण का सत्ता से जुड़ा मनोरोग

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  October 19, 2020

राजनीतिक दलों के बारे में एक दिलचस्प बात यह है कि वे सत्ता में होने पर प्रतिष्ठान का बचाव करने लगते हैं और विपक्ष में जाने पर निर्दयी दुश्मन बन जाते हैं। देश के दो बड़े राष्ट्रीय दलों भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस को भी यह रूपांतरण जद में लेता रहता है। पिछले तीन दशकों में दोनों दलों ने एक-दूसरे की नीतियों के विरोध को अपने आप में एक साध्य बनाया हुआ है, भले ही इससे कुछ हासिल न होता हो।

मसलन, संसद में अनुशासन के झंडाबरदार माने जाने वाले नेता विपक्ष में होने पर असभ्य एवं बाधक प्रदर्शनकारी की भूमिका में आ जाते हैं जो कार्यवाही के दौरान कागजात फाडऩे लगते हैं और सदन के आसन की तरफ दौडऩे लगते हैं। हाल ही में राज्यसभा में हमें यह नजारा खूब दिखा। नब्बे के पूरे दशक में भाजपा स्वदेशी की प्रबल समर्थक हुआ करती थी लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के दूसरे कार्यकाल में वह आर्थिक सुधारों की समर्थक बन गई जिसे कारोबारी जगत का समर्थन भी मिला। इस बीच आर्थिक उदारीकरण की पैरोकार रही कांग्रेस सोनिया गांधी के नेतृत्व में गरीबों एवं वंचितों की पार्टी बन गई।

सत्ता से उपजने वाली इस मानसिक व्याधि का मतलब है कि हरेक दल को संसद में हासिल बहुमत ही तय करता है कि सभी नीतियां सही हैं। वर्ष 2020 के मध्य के कुछ महीनों में यह फिर नजर आया। इस साल मई में नरेंद्र मोदी की सरकार को उसी कार्यक्रम पर आश्रित होना पड़ा जिसे उन्होंने कभी 'कांग्रेस की अगुआई वाली संप्रग सरकार की नाकामी का प्रतीक' बताया था। वह महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) थी जो महामारी के दौरान लगे सख्त लॉकडाउन में बढ़ती रोजगारी से निपटने के लिए सरकार का सहारा बनी। वित्त मंत्री ने लॉकडाउन में अपने गांव लौटने वाले प्रवासी मजदूरों को रोजगार देने के लिए मनरेगा के तहत 40,000 करोड़ रुपये आवंटित किए।

मोदी ने वर्ष 2005 में गुजरात का मुख्यमंत्री रहते समय कृषि कार्य एवं निर्माण उद्योगों के साथ सहानुभूति जताई थी। उन उद्योगों का कहना था कि मनरेगा की वजह से उनके पास कामगारों की कमी होने लगी है। मोदी ने ऐसा कानून लाने के लिए संप्रग सरकार की आलोचना भी की थी। वहीं वर्ष 2015 में मोदी ने प्रधानमंत्री के तौर पर कारोबार एवं मध्य वर्ग से परे अपनी पहचान बनाने के लिए किसी भी दूसरे चालाक नेता की तरह अपना रुख बदल लिया और कहा कि वह मनरेगा को बेहतर रूप देकर बरकरार रखेंगे।

अब भी संप्रग सरकार की इस प्रतिनिधि योजना के साथ भाजपा का असहज नाता है। शोधों से पता चला है कि मनरेगा ने ग्रामीण इलाकों में गरीबी कम करने में एक बड़ी भूमिका निभाई है। कृषि मंत्री ने 2019 में संसद में कहा था कि मोदी सरकार मनरेगा को खत्म करना चाहती है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ते असंतोष को देखते हुए मोदी सरकार ने उस साल और इस साल भी मनरेगा का खूब सहारा लिया। सोनिया गांधी ने इस अवसर का बखूबी इस्तेमाल किया, खासकर उस समय जब गांव लौट रहे प्रवासी मजदूरों को संभाल पाने में सरकार की नाकामी उजागर हो रही थी। सोनिया ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' में एक लेख लिखकर प्रधानमंत्री से अनुरोध किया था कि प्रवासियों की मदद के लिए मनरेगा का खुलकर इस्तेमाल किया जाए।

राजनीति का मकसद अगर वाकई में गरीबों या किसी भी वंचित भारतीय की मदद करना ही था तो फिर कांग्रेस पार्टी को पिछले महीने संसद में पारित हुए कृषि सुधार विधेयकों की इस कदर मुखालफत नहीं करनी चाहिए थी। किसी भी कांग्रेसी नेता ने यह नहीं बताया है कि खुद उसके 2019 चुनाव घोषणापत्र में दर्ज इसी तरह की नीति भाजपा की सरकार द्वारा लागू किए जाने पर अब इतनी खराब कैसे हो गई है? कुछ नेताओं की फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था खत्म हो जाने की शिकायत भी निर्मूल साबित हुई है।

सभी नीतियों की तरह इस नीति के भी कुछ दुष्प्रभाव होंगे, जैसा कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने मनरेगा के परिचालन में हो रही धांधलियों का खुलासा भी किया है। लेकिन बहुत पहले ही अपनी उपयोगिता खत्म कर चुकी एकल खरीदार व्यवस्था में बदलाव की समझ को लेकर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए और कांग्रेस को इसका स्वागत करना चाहिए।

अगर भाजपा के विरोध के लिए कांग्रेस को एक सटीक नीति की तलाश थी तो नए श्रम कानूनों में इसकी गुंजाइश मौजूद है। छोटी अवधि के अनुबंध और कामगारों के फायदे एवं मजदूर ठेकेदारों के लिए शर्तों में ढील देने के कदम सिद्धांत रूप में अच्छे हो सकते हैं लेकिन सामूहिक मोलभाव को थोक स्तर पर कमजोर करते हैं और नए श्रम कानूनों में अंतर्निहित श्रम अधिकार तो निश्चित रूप से चिंता का विषय हैं। मसलन, अगर नियोक्ता या श्रमिक ठेकेदार अनुबंध शर्तों से मुकर जाते हैं या सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करते हैं तो श्रमिकों को राहत देने वाले संस्थागत उपाय क्या हैं? फिर भी इस सुधार पर गहरी चुप्पी छाई हुई है। सच तो यह है कि असंगठित क्षेत्र के विशाल कार्यबल को संगठित करने के लिए ऊर्जा की जरूरत होती है और सांगठनिक जोश की कमी से जूझ रही 134 साल पुरानी पार्टी के लिए यह एक वजह हो सकती है।

याद रहे कि कांग्रेस ने देशभक्ति की बाहुबली शैली वाली अभिव्यक्ति ( सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट हवाई हमला) पर प्रधानमंत्री मोदी को खुलकर बधाई दी थी। इन दोनों मौकों पर कई मुश्किल सवाल पूछे जाने चाहिए थे लेकिन कोई भी नेता राष्ट्रीय सुरक्षा और खासकर पाकिस्तान से जुड़े सरकारी फैसलों पर सवाल नहीं उठाता है।

बहरहाल जमीनों के मालिकाना ब्योरे को दुरुस्त कर डिजिटल रूप देने के लिए हाल ही में शुरू की गई 'स्वामित्व' योजना सहयोग का एक अनूठा अवसर लेकर आई है। इस योजना का प्रयोग भाजपा के शासन वाले छह राज्यों में शुरू हुआ है। कांग्रेस के चुनाव घोषणापत्र में भी राज्य सरकारों के साथ मिलकर भूमि स्वामित्व एवं बंटाई दस्तावेजों को डिजिटल करने की बात कही गई थी। लेकिन इसका श्रेय भाजपा के खाते में जाने के बाद क्या कांग्रेस इस चुनावी वादे को पूरा करने की शिद्दत से कोशिश करेगी?

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