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राजग के साथ मोदी-शाह का अश्वमेध यज्ञ संपूर्ण

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  October 18, 2020

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सन 1998 में 28 साझेदारों के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का गठन किया था। इस प्रकार लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में देश में गठबंधन की राजनीति का सबसे सफल दौर शुरू हुआ। इसके बाद तीन ऐसे गठबंधन अपना कार्यकाल पूरा करने में कामयाब रहे जहां किसी प्रमुख दल को बहुमत हासिल नहीं था। सन 2020 में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा ने राजग का अंत कर दिया है और राष्ट्रीय राजनीति के नए नियम और समीकरण तैयार किए हैं। आडवाणी का राजग समाप्त हो चुका है। उसे इस्तेमाल करके उसे खारिज कर दिया गया है।

आप इसकी तुलना वैदिक परंपरा के अश्वमेध यज्ञ से कर सकते हैं। एक बार जब आपका अश्व देश भर में आपकी संप्रभुता का डंका बजा देता है तो आप क्या करते हैं? उसकी बलि दे देते हैं। राजग बलि का वही अश्व था। स्मरण रहे हम ऐसा कहकर कोई निर्णय नहीं सुना रहे हैं। इसे अब भी राजग सरकार कहा जाता है लेकिन फिलहाल इसके 53 सदस्यीय मंत्रिमंडल में केवल एक गठबंधन साझेदार है। आपको शायद उसका नाम भी याद न हो इसलिए मैं बता दूं कि वह हैं रामदास आठवले जिनकी भारतीय रिपब्लिकन पार्टी (आरपीआई) के धड़े को उनके नाम से ही जाना जाता है। वह राजग के गठबंधन की सरकार होने की याद दिलाने वाले इकलौते व्यक्ति हैं। वैसे ही जैसे 1990 की रथयात्रा में आडवाणी के रथ के मुस्लिम चालक को उनकी धर्मनिरपेक्ष प्रतिबद्धता का प्रतीक माना गया था।

आठवले गाहेबगाहे अपने अजीबोगरीब बयानों की मदद से अपनी मौजूदगी का अहसास कराते रहते हैं। मंत्रिमंडल में उन्हें वही स्थान मिला है जिसके वह हकदार हैं। महाराष्ट्र में उनकी पार्टी के पास कुछ दलित वोट हैं इसलिए उन्हें सामाजिक न्याय एवं सशक्तीकरण राज्य मंत्री बनाया गया है। मंत्रिमंडल के इकलौते मुस्लिम सदस्य को भी अल्पसंख्यक विभाग सौंपा गया है।

क्या इसके लिए मोदी-शाह की भाजपा को जवाबदेह ठहरा सकते हैं? इसका उत्तर शायद उस बात में हो सकता है जो हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री (भ्रष्टाचार के लिए जेल और फिलहाल परोल पर) ओम प्रकाश चौटाला ने मुझसे कही थी: 'हम यहां तीर्थ यात्रा पर नहीं आए। राजनीति सत्ता के लिए होती है।' नई भाजपा इस परीक्षा में खरी उतरी है भले ही इस दौरान कुछ लोगों के अहं को चोट लगी हो और कुछ का अंग भंग हुआ हो। अब 1998 से 2014 पर आते हैं। भाजपा को बहुमत मिला लेकिन सात साझेदार सरकार का हिस्सा थे: शिव सेना, राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी, चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी और शिरोमणि अकाली दल को कैबिनेट मंत्री के पद मिले जबकि अनुप्रिया पटेल के अपना दल, उपेंद्र कुशवाहा के राष्ट्रीय लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी और आरपीआई को तेलुगू देशम के साथ राज्य मंत्री का पद मिला।

छह साल बाद अगर केवल आठवले ही राजग में बचे हैं तो इससे पता चलता है कि हमारी राष्ट्रीय राजनीति किस कदर बदल गई है। मोदी-शाह के अधीन भाजपा वही है जो इंदिरा गांधी के अधीन कांग्रेस थी। अब वे गठबंधन साझेदारों, उनके लालच और उनके अहं को क्यों बरदाश्त करेंगे? आखिर वे भी राजनीति में तीर्थ यात्रा के लिए तो नहीं आए हैं। यह दलील अतीत के बारे में नहीं है। इसके विपरीत यह भविष्य के संभावित राजनीतिक मानचित्र की तरह है। परंतु हमें एक बार फिर अतीत का संदर्भ लेना होगा। आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी के पहले राजग में शामिल सभी दल अब अस्तित्व में भी नहीं हैं। कुछ के नाम तो यूपीएससी के टॉपर भी नहीं बता पाएंगे लेकिन कुछ नाम हैं जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता।

मूल राजग कैबिनेट में जॉर्ज फर्नांडिस रक्षा मंत्री थे। वह सहयोगी दल के अंतिम सदस्य थे जिन्हें सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति में जगह दी गई थी। उनके साथी और कभी दोस्त कभी दुश्मन रहे नीतीश कुमार अलग-अलग समय पर रेलवे और कृषि मंत्री रहे। ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, शरद यादव और राम विलास पासवान भी अहम मंत्रालय संभाल रहे थे। उस वक्त शिव सेना के सदस्य रहे सुरेश प्रभु भी शामिल थे, तेलुगू देशम के जीएमसी बालयोगी लोकसभा अध्यक्ष थे। नैशनल कॉन्फ्रेंस के अब्दुल्ला पिता-पुत्र भी इसमें शामिल थे।

अब नीतीश कुमार राजग साझेदार हैं लेकिन मंत्रिमंडल में उनकी पार्टी का कोई सदस्य नहीं है। बिहार में भी उनका कद लगातार घट रहा है। अगर फिर से बिहार के मुख्यमंत्री बन भी गए तो भी यह उनका आखिरी कार्यकाल होगा। भाजपा उनके पूरी तरह धूमिल होने की प्रतीक्षा करेगी और तब आगे बढ़ेगी।

पश्चिम बंगाल में भाजपा, पूर्व सहयोगी ममता बनर्जी के साथ आर-पार की लड़ाई लड़ रही है। वह जीतें या हारें, उनका कमजोर होना तय है और प्रदेश में भाजपा का उभार भी निश्चित है। नवीन पटनायक को ओडिशा में अकेला छोड़ दिया गया है क्योंकि भाजपा को पता है कि वह बूढ़े हो रहे हैं और उसके लिए जगह खाली हो रही है। मान कर चलिए कि 2024 के चुनाव के पहले पार्टी वहां बाजी पलटने का प्रयास करेगी। पूरी प्रक्रिया जानी-पहचानी होगी। कुछ असंतुष्ट आरोप लगाते हुए सामने आएंगे, सीबीआई, ईडी और अन्य एजेंसियां काम पर लगेंगी, चैनल और सोशल मीडिया पर जंग छिड़ेगी और पटनायक के लिए अकेले यह सब संभालना मुश्किल होगा। 2024 में उनकी उम्र भी बहुत हो चुकी होगी। फारुख और उमर अब्दुल्ला साल भर बंदी बनाकर रखे गए और महबूबा मुफ्ती भी जबकि वह मोदी-शाह युग में भाजपा की साझेदार रह चुकी हैं।

शिव सेना और भाजपा में अब काफी कड़वाहट और प्रतिद्वंद्विता है और सुरेश प्रभु भाजपा में हैं। शरद यादव कहीं नहीं हैं और उनकी बेटी सुभाषिणी कांग्रेस में शामिल हो गई हैं। आगामी विधानसभा चुनाव में पासवान की पार्टी का अंत हो सकता है। चंद्रबाबू नायडू अब प्रतिद्वंद्वी हैं और आंध्र प्रदेश की राजनीति में उन्हें समाप्त करने वाले वाई एस जगन मोहन सीबीआई और ईडी की दया पर हैं। वह न्यायपालिका से जूझ रहे हैं और मोदी सरकार हमेशा उन पर हावी रहेगी। सुदूर दक्षिण में भाजपा अन्नाद्रमुक को कमजोर देखकर खुश है और समय की प्रतीक्षा कर रही है। राजनीति जंग का सबसे क्रूर स्वरूप है। स्थिति ऐसी है कि पटनायक, रेड्डी, नीतीश सभी जानते हैं कि भाजपा उन्हें बेदखल करने वाली है लेकिन फिर भी वे चुनाव लड़ेंगे। इसके बावजूद उनके पास कोई विकल्प नहीं है और अहं को त्यागते हुए उनके सांसद राज्य सभा में अहम मसलों पर भाजपा के साथ मतदान करेंगे। आप अपने राज्य में सम्राट होंगे लेकिन असली ताकत यानी एजेंसियां, राष्ट्रीय मीडिया, धन सब केंद्र के साथ है जिसे आपकी जरूरत नहीं।

मोदी-शाह की सरकार भारतीय इतिहास की अब तक की सबसे राजनीतिक सरकार है लेकिन वे इसके लिए शर्मिंदा नहीं हैं। आपको स्वीकार करना होगा कि उन पर दिन-रात और साल भर राजनीति और सत्ता का ऐसा जुनून सवार है जो पहले कभी नहीं देखा गया। यहां तक कि उनके आर्थिक निर्णय भी राजनीति प्रेरित हैं।

यही कारण है कि आगे ब्याज दरों में कटौती नहीं की जाएगी, केंद्र राजकोषीय प्रोत्साहन नहीं देगा क्योंकि इससे गरीबों के लिए महंगाई बढ़ सकती है। सरकार जो भी त्याग करेगी उनका लक्ष्य यही तय करना होगा कि गरीब भूखे न रहें। मुद्रास्फीति, लोक कल्याण और वृद्धि के बीच का यह समझौता राजनीतिक जोखिम से मुक्त है। इसी तरह सरकार पेट्रोलियम उत्पादों पर उच्चतम कर लगाने से भी नहीं हिचकिचाती। क्योंकि केवल मध्यम और निम्र मध्य वर्ग वाहन चलाता है। उसके वोट पहले से मुठ्ठी में हैं।

राष्ट्रीय राजनीति में यही हो रहा है। आप इसे पसंद करते हैं तो अच्छा है यदि नहीं पसंद करते हैं तो आपको लगभग पूरे हो चुके इस अश्वमेध को चुनौती देने के लिए काफी कुछ करना होगा। केवल ट्वीट करने से काम नहीं बनेगा। इस बारे में आडवाणी से पूछिए। वह निराश नहीं होंगे। सन 1998 में उन्होंने भारतीय राजनीति को बदलने का अभियान छेड़ा था। उनके शिष्यों ने उनके जीवनकाल में ही उनके संकल्प का लाभ उठा लिया-पूरा नहीं तो भी काफी हद तक। नेहरू के प्रशंसक माफ करें कि हमने उनसे यह चुरा लिया।

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