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दूर होगा फासला!

संपादकीय /  October 18, 2020

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह में आई गिरावट की भरपाई के लिए उधार लेकर राज्यों को देने के केंद्र सरकार के फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए। अपने पुराने रुख के उलट केंद्र सरकार बाजार से 1.1 लाख करोड़ रुपये की उधारी जुटाएगी और फिर उसे राज्यों में बांटेगी। पांच साल की तय अवधि के बाद भी उपकर से इक_ा हुए शुल्क से इस कर्ज को चुकाया जाएगा। मौजूदा संदर्भ में यह राज्यों को बाजार जाकर उधारी जुटाने के लिए मजबूर करने के बजाय उधारी जुटाने का निश्चित रूप से कहीं अधिक कारगर तरीका है। यह सरकार का ऋण प्रबंधन करने वाले भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के लिए काम काफी आसान कर देगा और राज्य को भी एक बेहतर एवं सार्वभौम दर मिल पाएगी। हालांकि यह उधारी केंद्र सरकार के खाते में नहीं बल्कि राज्यों की ही देनदारी के रूप में दर्ज होगी। इस तरह यह केंद्र सरकार के घाटे एवं कर्ज पर असर नहीं डालेगा।  जहां केंद्र का यह फैसला निकट समय में नकदी की किल्लत दूर करने में राज्यों के लिए मददगार साबित होगा, वहीं इससे केंद्र और राज्यों के बीच असहमति खत्म होने की संभावना नहीं है। वजह यह है कि उधारी की यह रकम भी राज्यों को हुए नुकसान की पूरी तरह भरपाई नहीं कर पाएगी। चालू वित्त वर्ष में जीएसटी संग्रह में राज्यों की हिस्सेदारी में करीब 3 लाख करोड़ रुपये की कमी होने के आसार हैं। जहां तक राजस्व क्षति की भरपाई के लिए लगने वाले उपकर का सवाल है तो इस मद में महज 65,000 करोड़ रुपये ही इक_ा होने का अनुमान है। केंद्र सरकार ने राज्यों को उनके सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के 0.5 फीसदी के बराबर रकम की अतिरिक्त  उधारी की अनुमति भी दी है जिससे इस राजस्व अंतराल को दूर करने में मदद मिलेगी। अपेक्षा के अनुरूप ही कुछ राज्य इस इंतजाम से खुश नहीं हैं और वे चाहते हैं कि केंद्र सरकार ही पूरी रकम को बाजार से उधार ले और फिर उसे राज्यों में बांट दे। वे इस पूरी रकम की अदायगी के लिए क्षतिपूर्ति उपकर की समयसीमा बढ़ाने के लिए भी तैयार हैं। उनका कहना है कि अगर अतिरिक्त उधारी राज्यों के स्तर पर होगी तो इससे कर्ज बढ़ेगा जिसका बोझ उनके अपने ही संसाधनों पर पड़ेगा।

निस्संदेह, उपकर वसूली की मियाद बढ़ाकर समूची रकम उधार लेने से अनिश्चितता पैदा होती और उससे समग्र कारोबारी परिवेश प्रभावित होता। लेकिन इस बारे में कोई भी समुचित निर्णय जीएसटी परिषद की बैठक में लिया जाना चाहिए। क्षतिपूर्ति उपकर कम पडऩे की स्थिति में परिषद को ही तय करना होता है कि संसाधन किस तरह जुटाए जाएंगे जिसमें बाजार से उधारी का भी विकल्प शामिल है। लेकिन इस मसले को इस तरह नहीं निपटाया गया है। असल में मुआवजे के इस मुद्दे से निपटने का तरीका जीएसटी परिषद की स्थिति के बारे में एक अहम सवाल खड़ा करता है। केंद्र ने जीएसटी संग्रह में कमी की भरपाई के लिए राज्यों के समक्ष दो विकल्प रखे थे लेकिन राज्यों के साथ समुचित सलाह के बगैर ही ऐसा किया गया। पहले विकल्प में उपकर मियाद बढ़ाकर 1.1 लाख करोड़ रुपये की उधारी चुकाने का जिक्र था। दूसरे विकल्प में 2.35 लाख करोड़ रुपये की समूची राजस्व कमी को राज्यों द्वारा उधार लेकर पूरा करना था जिसकी ब्याज लागत राज्यों को ही उठानी थी।

जीएसटी परिषद की पिछली बैठक में इस पर कोई सर्वसम्मत फैसला नहीं हुआ था लेकिन केंद्र ने आगे बढ़ते हुए पहला विकल्प अपनाने वाले राज्यों को उधारी जुटाने की अनुमति दे दी। फिर उसने खुद ही यह उधारी जुटाने और बाद में राज्यों को बांटने का फैसला किया। यह साफ नहीं है कि कुछ राज्यों की चिंताओं को किस तरह दूर किया जाएगा? आदर्श रूप में ऐसे सारे  फैसले जीएसटी परिषद को लेने चाहिए थे। क्षतिपूर्ति के मसले से निपटने के ढंग ने निश्चित रूप से परिषद की स्थिति को चोट पहुंचाई है और केंद्र और राज्यों के रिश्तों पर भी इसका असर पडऩा तय है।

Keyword: जीएसटी संग्रह, राज्य, उधारी, आरबीआई, देनदारी, हिस्सेदारी, क्षतिपूर्ति उपकर, जीएसटी परिषद,
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