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लक्ष्मी विलास बैंक : भविष्य पर सवाल

तमाल बंद्योपाध्याय /  October 16, 2020

भारत के पुराने निजी बैंकिंग उद्योग के लिए 25 सितंबर एक यादगार दिन साबित हो सकता था। उस दिन 94 वर्ष पुराने लक्ष्मी विलास बैंक लिमिटेड (एलवीबी) की सालाना आम बैठक (एजीएम) में इसके शेयरधारकों ने निदेशकों को बाहर का रास्ता दिखा दिया।

शेयरधारकों ने बैंक की खराब हालत के लिए इन निदेशकों को जिम्मेदार माना था। उन्होंने बैंक के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी एस सुंदर तक को भी  नहीं छोड़ा।

एजीएम से पहले प्रॉक्सी एडवाइजरी कंपनी इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर एडवाइजरी सर्विसेस ने शेयरधारकों को बैंक के कुप्रबंधन को लेकर आगाह किया था। इस कंपनी ने कुछ निदेशकों को निदेशक मंडल में शामिल करने के खिलाफ मतदान करने की सिफारिश की थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) तेजी से हरकत में आया और अब इस बैंक के परिचालन के लिए निदेशकों की एक तीन सदस्यीय समिति गठित कर दी गई है। मीता मखान की अध्यक्षता वाली समिति के अन्य दो सदस्यों में शक्ति सिन्हा और सतीश कुमार कालरा हैं। ये सभी स्वतंत्र निदेशक हैं।

इस बैंक का बहीखाता खंगाले तो परिसंपत्ति एवं देनदारी में कहीं असंतुलन नजर नहीं आता है। बैंक जमाकर्ताओं, बॉन्डधारकों एवं कर्जदाताओं के प्रति अपना उत्तरदायित्व बखूती निभाता रहा है। बैंक की तरफ से जारी बयान में कहा गया है, 'बैंक के सभी मौजूदा कर्मचारी पहले की तरह ही काम करते रहेंगे और ग्राहकों को सेवाएं देने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।' लक्ष्मी विलास बैंक लगभग दिवालिया होते-होते बचा था और इस लिहाज से इसका संभलना बैंकिंग नियामक के लिए खुशी की बात होनी चाहिए। बैंक का टीयर 1 पूंजी पर्याप्तता अनुपात 30 जून 2020 तक (-) 0.88 प्रतिशत हो गया था, जबकि यह न्यूनतम 8.875 प्रतिशत होना चाहिए। पिछली दस तिमाहियों से बैंक को नुकसान होता रहा है, हां यह अलग बात रही कि जून तिमाही में घाटा एक वर्ष पहले के 237.25 करोड़ रुपये से कम होकर 112.28 करोड़ रुपये रह गया। इसका जमा खाता भी सिकुड़ रहा है और कुल ऋण परिसंपत्तियों में 20 प्रतिशत से अधिक गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) में तब्दील हो चुकी हैं। मार्च 2017 में इसका फंसा कर्ज महज 2.7 प्रतिशत था। आरबीआई ने 201-16 में भारतीय बैंकों की परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा करने का निर्णय लिया था और इससे पहले तक लक्ष्मी एलवीबी का गणित ठीक लग रहा था।

बैंक ने अपनी बरबादी की जमीन स्वयं ही तैयार की है। तेजी से कारोबार बढ़ाने, कंपनी जगत के ग्राहक हथियाने के चक्कर में और स्थानीय कारोबारों को ऋण मुहैया करने के अपने लक्ष्य से भटकने से बैंक की स्थिति बिगड़ती चली गई। सितंबर 2019 में आरबीआई ने इसे तत्काल सुधार की जरूरत वाले बैंकों की श्रेणी में डाल दिया और इसके द्वारा नए ऋण आवंटन पर पाबंदी लगा दी। हालांकि इसके बाद बैंक ने साहस भरे बयान में कहा कि वह अपनी वित्तीय सेहत सुधारने के लिए हरसंभव उपाय करेगा। लगभग उसी समय इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनैंस कंपनी लिमिटेड के साथ विलय की बातचीत भी असफल हो गई। इसके बाद बैंक ने हिम्मत जुटाई और कहा, 'इससे हाल की अनिश्चितताओं पर विराम लग गया है। बैंक पूंजी जुटाने की दिशा में लगातार काम करती रहेगी।' आखिर उस शुक्रवार को वास्तव में हुआ क्या था? उस दिन चार नए और कुछ पुराने निदेशकों की नियुक्ति पर मुहर के लिए मतदान का प्रस्ताव दिया गया था। सामान्य परिस्थितियों में यह प्रक्रिया महज औपचारिकता होती है, लेकिन एलवीबी का मामला कुछ अलग था। सभी पुराने, गैर-स्वतंत्र निदेशक बाहर कर दिए गए। नए निदेशकों में भी एक गैर-स्वतंत्र निदेशक को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। कुल मिलाकर 10 में से केवल तीन ही अपनी कुर्सी बचा सके। सुंदर के अलावा गैर-स्वतंत्र निदेशकों एन साईप्रसाद, रघुराज गुज्जर और के आर प्रदीप भी बाहर कर दिए गए। स्वतंत्र निदेशकों में बी के मंजुनाथ, गोरिंका जगमोहन राव और वाई एन लक्ष्मीनारायण मूर्ति भी हटा दिए गए। जो बच गए उनमें सिन्हा, कालरा और मखान हैं। ये सभी स्वतंत्र निदेशक हैं और बैंक का संचालन करने वाली नई समिति के सदस्य हैं।

एजीएम में जिस तरह मतदान हुआ उससे हमें पर्दे के पीछे चलने वाली कहानियों का अंदाजा मिलता है। उदाहरण के लिए 100 प्रतिशत प्रवर्तकों ने एजीएम में मतदान किया, लेकिन उनमें 19 प्रतिशत ने कुछ प्रस्तावों के खिलाफ मतदान किया। संस्थागत शेयरधारकों में केवल 40 प्रतिशत (बैंक में 4.99 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाली इंडियाबुल्स हाउसिंग ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया) ने मतदान किया और उनमें कम से कम 90 प्रतिशत ने प्रस्तावों के खिलाफ मतदान किया। सार्वजनिक शेयरधारकों की भागीदारी तो और कम रही। इनमें केवल 32 प्रतिशत ने मतदान किया और उनमें भी 68 प्रतिशत ने प्रस्तावों के खिलाफ मत दिया था। शेयरधारक स्वतंत्र निदेशकों का चोला पहनकर प्रवर्तकों का प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों को बाहर निकालने का मन बना चुके थे। क्या प्रवर्तक इस चुनौती से वाकिफ नहीं थे या फिर उन्होंने कारोबार के लिए बाजार में उपलब्ध बैंक के शेयरों पर अपनी पकड़ को लेकर जरूरत से अधिक आश्वस्त थे?

जून 2020 तक बैंक के प्रवर्तकों की फेहरिस्त काफी लंबी थी। इनमें के आर प्रदीप, अनुराधा प्रदीप, एम पी श्याम, जी सुधाकर गुप्ता और एन मलयालारामामृतम भी शामिल थे। उनका हिस्सेदारी कुछेक हजार शेयरों से लेकर 2 प्रतिशत तक थी। मलयालारामामृतम वास्तविक प्रवर्तकों से ताल्लुक रखते हैं। ये प्रवर्तक सात कारोबारियों के एक समूह के रूप में थे, जिन्होंने वीएसन रामलिंग चेटियार के नेतृत्व में 1926 में अमरावती नदी के किनारे बैंक की स्थापना की थी। इसकी स्थापना का उद्देश्य करूर के आसपास लोगों की वित्तीय जरूरतें पूरी करनी थी। करूर व्यापार, उद्योग एवं कृषि व्यवसायों में थे। शेष बाद में आए। कम से कम एक प्रवर्तक ने एजीएम में प्रस्तावों के खिलाफ मतदान किया।

अब आगे एलवीबी की राह कैसे होगी? पिछले सप्ताह क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ब्रिकवर्क रेटिंग्स ने बैंक के अनसिक्योर्ड, रीडीमेबल, नॉन-कन्वर्टिबल सब-ऑर्डिनेटेड लोअर टीयर-2 बॉन्ड- सीरीज 7 (ऑप्शन बी) की रेटिंग बीडब्ल्यूआर बीबी+ से घटाकर बीडब्ल्यूआर बी+ कर दी था। एक मोटे अनुमान के तौर पर एलवीबी को अस्तित्व बनाए रखने के लिए 1,500 करोड़ रुपये की जरूरत है। एलवीबी की 570 शाखाएं हैं, जिनमें 85 प्रतिशत दक्षिण भारत (इनमें आधे तमिलनाडु) में हैं। इसके अलावा बैंक के 17.5 लाख खुदरा ग्राहक हैं। त्रुटिपूर्ण कारोबारी योजना, जरूरत से अधिक हस्तक्षेप करने वाले प्रवर्तक, कमजोर निदेशक मंडल और उच्च स्तर पर निरंतरता के अभाव से एलवीबी का मामला खिंच गया है। अब तक बैंक रकम जुटाने के लिए निवेशकों से संपर्क साधता रहा है, लेकिन अधिक फंसे कर्ज और परिचालन में निदेशक मंडल/प्रवर्तकों के हस्तक्षेप की आशंका से वे छिटक रहे हैं। क्या बड़ी संख्या में कथित तौर पर स्वतंत्र निदेशकों की रवानगी से चीजें बदल जाएंगी? यह कहना थोड़ा मुश्किल है। क्या यह संभव है कि कुछ संस्थागत निवेशक बैंक का प्रबंधन अपने हाथों में लेने का स्वप्न देख रहे होंगे? क्या एजीएम में हुई उठापटक में उनकी कोई भूमिका रही है? क्या वे उदार बनेंगे कि बाहर के किसी को एलवीबी की कमान लेने और इस दोबारा पटरी पर लाने की इजाजत दे पाएंगे? हम इन प्रश्नों के उत्तर के लिए प्रतीक्षा करनी होगी।
(लेखक बिजनेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक  और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ सलाहकार हैं)

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