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समाजवादी विचारधारा के पैरोकार थॉमस आइजक

दिलाशा सेठ और शाइन जैकब /  October 13, 2020

वस्तु एवं सेवा कर परिषद (जीएसटी) में वह लोकतांत्रिक संघवाद के प्रतीक हैं। दोस्तों के लिए वह किताबों से जुड़े व्यक्ति हैं। अपने निर्वाचन क्षेत्र के लिए वह आम जनता के नेता हैं। उनके करीबी लोगों का कहना है कि थॉमस आइजक एक समाजवादी हैं जो अपना पैसा वहीं लगाते हैं जहां उसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। आइजक 2018 से ही केरल के वित्त मंत्री के रूप में कर के क्षेत्र में कई महत्त्वपूर्ण पहलों में अपनी भूमिका के कारण राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रहे हैं। लेकिन 2020 में उनकी भूमिका और भी अहम हो गई है, खासतौर पर जीएसटी परिषद में।

उनके समाजवादी आदर्शों की वजह से ही यह सुनिश्चित किया गया है कि गरीबों के उपभोग वाली आवश्यक वस्तुओं पर सबसे कम कर लगाया जाए और कार तथा एयर कंडीशनर जैसी लक्जरी वस्तुएं जिनका इस्तेमाल अमीर लोग करते हैं उन्हें कर की शीर्ष श्रेणी में रखा जाए। 68 साल के अर्थशास्त्र के पूर्व प्रोफेसर ने ऊंचे कर स्लैब को तत्कालीन प्रस्तावित 26 प्रतिशत के स्तर से बढ़ाकर 30 प्रतिशत तक करने और आवश्यक वस्तुओं पर कर को तत्कालीन प्रस्तावित 6 प्रतिशत के स्तर से घटाकर 4 प्रतिशत करने का दबाव बनाया। उनकी मांग को ही देखते हुए आखिरी जीएसटी स्लैब पर फिर से काम किया गया जिसमें 5 प्रतिशत सबसे कम और 28 प्रतिशत सबसे अधिक कर स्लैब था। पिछले साल, उन्होंने काफी मुखरता से कार पर दर में कमी करने की उद्योग की मांग का विरोध किया जो क्षेत्र कई वर्षों में मंदी का सामना कर रहा है।

2020 में दूसरी बार केरल के वित्त मंत्री बने आइजक विपक्षी राज्यों के नेताओं के समूह में मुखर नेता के रूप में उभरे हैं जिनमें पश्चिम बंगाल के अमित मित्रा, पंजाब के मनप्रीत सिंह बादल या छत्तीसगढ़ के टीएस सिंह देव जैसे नेता शामिल हैं। ये नेता कर राजस्व में कमी को पूरा करने के लिए 2.35 लाख करोड़ रुपये के राज्यों के लंबे समय से लंबित उपकर मुआवजा का भुगतान करने के लिए केंद्र पर दबाव बना रहे हैं। महामारी के कारण कम होते राजस्व की भरपाई करने के लिए राज्यों को इस पूंजी की सख्त जरूरत है। आइजक केंद्रीय वित्त मंत्री द्वारा इस कमी की भरपाई करने के लिए दिए गए 'विकल्पों' को अस्वीकार करने में सबसे आगे रहे हैं जिनमें केंद्रीय बैंक से 'एक उचित ब्याज दर' पर या बाजार से 'विशेष प्रावधानों' के माध्यम से उधार लेने जैसे विकल्प शामिल हैं। हालांकि कुछ भारतीय जनता पार्टी 'भाजपा' शासित राज्यों ने एक या अन्य विकल्पों को स्वीकार कर लिया है, लेकिन आइजक ने दोनों विकल्पों को 'अस्वीकार्य' बताते हुए इसे पूरी खारिज कर दिया है। उपकर मुआवजे पर चल रहा विवाद जीएसटी परिषद में आइजक की एकमात्र आपत्ति नहीं है।

पिछले साल उन्होंने परिषद में पहली बार मतदान देने की प्रक्रिया का नेतृत्व किया था। उससे पहले सभी फैसले आम सहमति के जरिये लिए जाते थे। मुद्दा यह था कि क्या निजी और सार्वजनिक स्तर पर चलाई जाने वाली लॉटरी पर दोहरी दरें होनी चाहिए। आइजक और कई अन्य लोग चाहते थे कि दोनों पर क्रमश: 28 प्रतिशत और 12 प्रतिशत का कर लगाया जाए। अन्य राज्यों के काफी प्रतिरोध के बाद आइजक ने परिषद में मत विभाजन पर जोर दिया  जिसने एक समान 28 प्रतिशत की दर पर फैसला ले लिया।

जीएसटी परिषद के भीतर आइजक के कल्याणकारी रुझानों को लेकर केंद्र के साथ मतभेद एक पहलू है। कीन्सवादी अर्थशास्त्र के एक बड़े सर्मथक के तौर पर वह प्रधानमंत्री से महामारी की वजह से बनी आर्थिक मंदी की स्थिति को दूर करने के लिए ज्यादा खर्च करने का आग्रह कर रहे हैं। इस साल अप्रैल की शुरुआत में एक साक्षात्कार में उन्होंने सरकार से राजकोषीय घाटे को बढ़ाने और राज्यों को भारतीय रिजर्व बैंक से सीधे कर्ज लेने की अनुमति देने का आग्रह किया था। उनका राज्य निश्चित रूप से व्यय विभाग में एक मिसाल कायम कर रहा है।

राजकोषीय स्तर पर काफी दबाव की स्थिति बनने के बावजूद केरल मार्च में 20,000 करोड़ रुपये के कोविड-19 राहत पैकेज की घोषणा करने वाला पहला राज्य था और इसने अगस्त में अर्थव्यवस्था में काफी पैसा लगाया। इस राज्य ने त्योहारी सीजन से पहले सरकारी कर्मचारियों को वेतन और पेंशन तथा सामाजिक सुरक्षा पेंशन का अग्रिम भुगतान किया गया है। राज्य ने सामाजिक सुरक्षा पेंशन भुगतान के लिए 1,650 करोड़ रुपये और सरकारी कर्मचारियों को बोनस के लिए 350 करोड़ रुपये खर्च किए। इसके अलावा 80.8 लाख वंचित परिवारों को ओणम किट वितरित करने के लिए 1,200 करोड़ रुपये खर्च किए।

उन्होंने केरल में दो साल की अवधि के लिए वस्तु एवं सेवाओं के लेनदेन पर जीएसटी व्यवस्था के तहत एक 1 प्रतिशत विशेष बाढ़ उपकर के लिए जोर दिया ताकि 2018 में प्राकृतिक आपदा के कारण बड़े पैमाने पर हुए  नुकसान की भरपाई की जा सके। हालांकि, उन्होंने आवश्यक वस्तुओं को इस अतिरिक्त कर के दायरे से बाहर 5 प्रतिशत की जीएसटी में रखा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि गरीबों पर कोई बोझ न पड़े। बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले कारोबारियों को ध्यान में रखते हुए होटल के खाने, वातानुकूलित ट्रेनों और बस टिकट बुकिंग जैसी सेवाओं को भी छूट दी गई। बाढ़ उपकर के लागू होने में लगभग एक साल लग गया।

आइजक लोककल्याणकारी सिद्धांतों को आगे बढ़ाने वालों में से हैं और वह इसे जाहिर करने में डरते भी नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर लक्जरी वस्तुओं और खाद्य पदार्थों पर सिन टैक्स लगाने के पैरोकार करने वालों में से हैं। जीएसटी लागू होने से एक साल पहले 2016 में उन्होंने ब्रांडेड रेस्तरां में बेचे वाले बर्गर, पिज्जा और अन्य जंक फूड पर 14.5 फीसदी का 'फैट टैक्स' लगाया जो सुर्खियों में रहा। उनके राजनीतिक कार्यों का मुख्य मकसद लोगों को भोजन और काम दिलाने से जुड़ा रहा है। उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र में जानकीय भक्षण शाला (आम लोगों का रेस्तरां) की शुरुआत की थी ताकि रोजाना 750 से अधिक परिवारों को मुफ्त भोजन मिल सके। पहले से ही दो ऐसे होटल उनके अलप्पुझा निर्वाचन क्षेत्र में चल रहे हैं। उन्हें केरल इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट फंड बोर्ड के मौजूदा स्वरूप का विचार देने वाले और राज्य में जैविक खेती शुरू कराने की पहल कराने वाले लोगों में से एक माना जाता है। सितंबर में कोविड-19 से संक्रमित होने के बाद आइजक ठीक हो चुके हैं और अब जीएसटी परिषद में आइजक के अगले कदम को काफी गौर से देखा जाएगा।

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