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देर आए, दुरुस्त नहीं

संपादकीय /  October 13, 2020

अर्थव्यवस्था को क्रमिक रूप से खोलने से आर्थिक गतिविधियों में सुधार आ रहा है और उच्च-तीव्रता वाले कुछ संकेतकों ने बहाली की उम्मीदें जगाई हैं। सोमवार को जारी आंकड़ों से पता चला कि अगस्त में औद्योगिक उत्पादन में संकुचन 8 फीसदी ही रहा जो जुलाई के 10.4 फीसदी और जून के 15.7 फीसदी संकुचन से बेहतर है।

अब लगभग आमराय बन चुकी है कि सरकार को इस स्तर पर मांग बढ़ाने के लिए समर्थन देना चाहिए ताकि बहाली का काम अधिक टिकाऊ रहे। इस संदर्भ में उपभोक्ता मांग एवं निवेश गतिविधि की बहाली के लिए सोमवार को सरकार की तरफ से की गई घोषणाएं कोई भी सार्थक प्रभाव डाल पाने के लिहाज से बहुत देर से उठाया गया बहुत थोड़ा कदम ही है। उपभोक्ता व्यय बढ़ाने के लिए सरकार ने केंद्र सरकार के कर्मचारियों को अवकाश के दौरान यात्रा पर दी जाने वाली रियायत (एलटीसी) पर नकद वाउचर देने की योजना का ऐलान किया। दरअसल कोविड महामारी के दौर में यात्रा करना माकूल नहीं होने से ये कर्मचारी इस राशि का इस्तेमाल कुछ शर्तों के साथ दूसरी चीजों पर कर सकते हैं।

निश्चित रूप से यह एक नया विचार है क्योंकि इसमें सरकारी कर्मचारियों को खर्च के लिए प्रेरित करने की मंशा है। लेकिन यह पूरी तरह साफ नहीं है कि सरकारी कर्मचारी क्या बड़ी संख्या में इस योजना का फायदा उठाने के इच्छुक होंगे? केंद्र सरकार एवं सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों का खर्च बढ़ाकर मांग में करीब 19,000 करोड़ रुपये की तेजी लाने की अपेक्षा है। अगर राज्य सरकारें भी अपने कर्मचारियों के लिए यही योजना लेकर आती हैं तो उपभोक्ता मांग में करीब 9,000 करोड़ रुपये की और बढ़ोतरी होगी। इसके अलावा केंद्र सरकार अपने हरेक कर्मचारी को 10,000 रुपये का ब्याज-मुक्त अग्रिम भुगतान भी करेगी।

महामारी के दौर में सरकारी कर्मचारी ही संभवत: अकेले ऐसे लोग हैं जिनकी कमाई पर कोई असर नहीं पड़ा है। इस तरह उन्हें 10,000 रुपये की अग्रिम राशि देने से भी खपत में बहुत तेजी आने की संभावना कम ही है। पूंजीगत व्यय के मामले में केंद्र सरकार चालू वित्त वर्ष में राज्यों को पूंजीगत व्यय के लिए 12,000 करोड़ रुपये का 50 वर्षीय ब्याज-मुक्त ऋण देगी। यह राशि राज्य सरकारों की अन्य उधारी सीमाओं से इतर होगी। यह एक सकारात्मक कदम है लेकिन इसका कोई महत्त्वपूर्ण प्रभाव शायद न पड़े। इस राशि का इस्तेमाल मौजूदा परियोजनाओं को पूरा करने और लंबित बकाये के भुगतान में ही किए जाने की संभावना है।

केंद्र ने अपने पूंजीगत व्यय में भी 25,000 करोड़ रुपये तक की वृद्धि की है जिसे सड़क, जल आपूर्ति एवं रक्षा ढांचा जैसे क्षेत्रों पर खर्च किया जाएगा। हालांकि यह देखा जाना बाकी है कि सरकार अपना समूचा पूंजीगत व्यय बजट क्या वास्तव में खर्च कर पाएगी? आम तौर पर राजकोषीय स्तर पर चुनौतीपूर्ण साल में पूंजीगत व्यय पर असर पड़ता है। व्यापक स्तर पर देखें तो यह स्पष्ट है कि सरकार अपने वित्त का दायरा बढ़ाने की इच्छुक नहीं है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जोर देकर कहा कि आज का समाधान कल की समस्या नहीं बननी चाहिए।

इसके अलावा मांग बढ़ाने के लिए व्यय करना न तो मुद्रास्फीति बढ़ाने वाला होना चाहिए और न ही सरकारी ऋण अस्वीकार्य राह पर बढ़ चले। सरकार के इस तर्क को चुनौती देना मुश्किल है। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि महामारी से उपजी आर्थिक अव्यवस्था इस साल नहीं खत्म होने वाली है। इसका मतलब है कि मध्यम अवधि का एक संशोधित राजकोषीय रोडमैप रखना अहम है। इससे अनावश्यक जोखिम उठाए बगैर एक तरह की राजकोषीय गुंजाइश के सृजन का अंदाजा लगाने में मदद मिलेगी।

इससे सरकार अधिक प्रभावी हस्तक्षेप करने और उत्पादन को अधिकतम कर पाने में सक्षम हो पाएगी। व्यय में छोटे बदलाव एवं हिचकिचाहट भरी वृद्धि से मांग में सार्थक तेजी आने और उसकी वजह से मौजूदा हालात में आर्थिक वृद्धि को बल मिलने की संभावना नहीं है।

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