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तेल राजस्व में बढ़ोतरी मोदी की खुशकिस्मती

ए के भट्टाचार्य /  October 09, 2020

महामारी आने के बाद आर्थिक मोर्चे पर तमाम बुरी खबरों के बीच सरकार की एक पहल ऐसी भी है जिसे जबरदस्त कामयाबी मिली है। दरअसल केंद्र सरकार ने तेल क्षेत्र में सही समय पर कुछ ऐसे सही कदम उठाए हैं जिनके सकारात्मक नतीजे अब सबके सामने आ रहे हैं।

गत 14 मार्च को केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले उत्पाद शुल्क, अतिरिक्त उत्पाद शुल्क और उपकर में भारी इजाफा किया। अनुमान लगाया गया कि इससे 2020-21 में तेल क्षेत्र से अनुमानित प्राप्तियों से 39,000 करोड़ रुपये या 15 फीसदी तक ज्यादा राजस्व प्राप्त होगा। इसका पेट्रोलियम उत्पादों के खुदरा मूल्य पर असर नहीं हुआ क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई थी।

मार्च 2020 में पेट्रोलियम शुल्क में इजाफे का निर्णय उस समय लिया गया जब लॉकडाउन नहीं लगा था और कोविड-19 का अर्थव्यवस्था पर पूरा असर सामने नहीं आया था। यह निर्णय राजस्व बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की घटती कीमतों से लाभ उठाने के लिए लिया गया।

मई 2020 तक कोविड-19 से हालात खराब हो गए। पूरा देश मार्च के अंत से जून के अंत तक लॉकडाउन में रहा। यही कारण है कि अप्रैल से जून तिमाही में जीडीपी में 24 फीसदी की गिरावट आई। जुलाई से लॉकडाउन शिथिल किया गया लेकिन उससे पहले ही सरकार को समझ मेंं आ गया था कि राजस्व और आर्थिक वृद्धि के मोर्चे पर स्थिति ठीक नहीं।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में और गिरावट के साथ ही 5 मई को सरकार ने पेट्रोल-डीजल के उत्पाद शुल्क, अतिरिक्त उत्पाद शुल्क और उपकर में और अधिक बढ़ोतरी कर दी। खुदरा कीमतें फिर अप्रभावित रहीं। माना जा रहा था कि सरकार को इससे 1.6 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त सालाना राजस्व हासिल होगा। परंतु चूंकि यह वृद्धि मई से प्रभावी हुई थी इसलिए वर्ष 2020-21 के बाकी महीनों के दौरान अतिरिक्त राजस्व 1.46 लाख करोड़ रुपये से कम रहने की आशा थी। यदि मार्च में हुई बढ़ोतरी को शामिल किया जाए तो कुल अतिरिक्त वार्षिक राजस्व 1.85 लाख करोड़ रुपये से अधिक होने की आशा थी।

परंतु इस बात की अनदेखी कर दी गई कि लॉकडाउन और आर्थिक गतिविधियों के ठप होने के कारण पेट्रोलियम उत्पादों की खपत में भारी गिरावट आने वाली है। कुछ विश्लेषकों के मुताबिक खपत में कमी को ध्यान में रखते हुए तेल क्षेत्र का वास्तविक अतिरिक्त राजस्व 1.4 लाख करोड़ रुपये रह सकता है। ऐसे में तेल क्षेत्र से कुल अप्रत्यक्ष कर संग्रह बजट में अनुमानित 2.67 लाख करोड़ रुपये के स्थान पर 4 लाख करोड़ रुपये हो सकता है।

बीते कुछ महीनों में केंद्र के तेल राजस्व का प्रदर्शन कैसा रहा? अप्रैल-अगस्त 2020 में पेट्रोलियम उत्पादों का उत्पाद शुल्क संग्रह बढ़कर 1 लाख करोड़ रुपये हो गया। यह वर्ष 2019 की समान अवधि की तुलना में 32 प्रतिशत अधिक है। यह सुधार पेट्रोलियम उत्पादों पर लगने वाली शुल्क दरों में दो बार बढ़ोतरी के कारण हुआ है। परंतु इस बात पर ध्यान देना भी महत्त्वपूर्ण है कि यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है जब अप्रैल-अगस्त 2020 में पेट्रोल की खपत में 25 फीसदी और डीजल की खपत 28 फीसदी कम हुई।

सितंबर के खपत के आंकड़ों के मुताबिक पेट्रोल की खपत में 2 फीसदी का इजाफा हुआ। यह चालू वित्त वर्ष में पहला अवसर था जब खपत बढ़ी। वहीं डीजल की खपत में 2019 की समान अवधि की तुलना में 7 फीसदी की गिरावट आई। यदि खपत में सुधार की यह प्रक्रिया जारी रही तो इसमें कोई शक नहीं कि केंद्र सरकार का उत्पाद शुल्क राजस्व संग्रह इस वर्ष 4 लाख करोड़ रुपये के अनुमानित स्तर तक पहुंच सकता है।

ऐसे वर्ष में जब केंद्र सरकार के तमाम अन्य स्रोतों के कर संग्रह में बजट अनुमान की तुलना में भारी कमी रहने का अनुमान है, उत्पाद कर संग्रह में सुधार एक अपवाद रहेगा। सरकार की वित्तीय स्थिति पर तेल क्षेत्र के इस अतिरिक्त  लाभ के प्रभाव को समझने के लिए निम्र बातों पर विचार करते हैं। अप्रैल-अगस्त 2020 में केंद्र का सकल कर राजस्व (तेल क्षेत्र के उत्पाद शुल्क के अलावा) 31 फीसदी गिरकर 4 लाख करोड़ रुपये रह गया। परंतु तेल क्षेत्र का उत्पाद शुल्क संग्रह शामिल करने के बाद इसी अवधि का सकल कर राजस्व 24 फीसदी गिरकर 5 लाख करोड़ रुपये हो गया। तेल क्षेत्र से अतिरिक्त राजस्व की यह राहत इसलिए मिली क्योंकि मार्च और मई में शुल्क दर बढ़ाई गई। यकीनन कच्चे तेल की कीमतों में कमी ने सरकार की मदद की लेकिन यह अवसर न गंवा कर केंद्र ने दिखाया कि वह सतर्क थी और इसीलिए उसने तत्काल निर्णय लिया।

केवल केंद्र ही नहीं, कई राज्य सरकारों ने भी तेल कीमतों में गिरावट से लाभ लेने के लिए ऐसे ही कदम उठाए। कई राज्यों ने पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले मूल्यवद्र्धित कर में इजाफा किया। हालांकि सभी राज्यों ने इस अवसर का उतना लाभ नहीं उठाया जितना वे उठा सकते थे। वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही में केरल, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और दिल्ली जैसे राज्यों का मूल्यवद्र्धित कर या बिक्री कर संग्रह अपेक्षाकृत कम रहा। यह 2019-20 के पूरे वर्ष के राजस्व से 6-9 फीसदी कम रहा। परंतु अधिकांश राज्यों में इस अवधि का तेल राजस्व पिछले पूरे साल के संग्रह से 15 फीसदी से अधिक रहा। यह अच्छी वृद्धि थी। वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही में केंद्र का उत्पाद शुल्क संग्रह वर्ष 2019-20 के कुल तेल शुल्क का 15 फीसदी था।

मोदी सरकार के लिए तेल क्षेत्र काफी खुशकिस्मती लेकर आया है। इसने अक्सर सरकार की वित्तीय स्थिति को राहत प्रदान की है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें (इंडियन बास्केट) 2014-15 में 20 फीसदी और 2015-16 में 45 फीसदी गिरीं। इसके बाद तेल पर कर बढ़ा और इस क्षेत्र से आने वाले राजस्व ने सरकार के राजस्व घाटे को कम करने में काफी मदद की। इससे हासिल लाभ का काफी हिस्सा मोदी सरकार के शुरुआती दो वर्ष में गंवाना पड़ा क्योंकि तेल कीमतों में दोबारा इजाफा हुआ। सन 2017-18 में इसमें 19 फीसदी और 2018-19 में इसमें 24 फीसदी का इजाफा हुआ।

परंतु 2019-20 में तेल कीमतें एक बार फिर 13 फीसदी गिरीं और अप्रैल-अगस्त 2020 में इनमें 41 फीसदी की कमी आई। यदि कच्चे तेल की कीमतें अगले कुछ महीनों तक इसी स्तर पर रहती हैं तो सरकार को राजस्व के मोर्चे पर अपेक्षाकृत कम झटका लगेगा। इसके लिए उसे मार्च और मई में तेल पर लगने वाले शुल्क में की गई वृद्धि को शुक्रिया कहना चाहिए।

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