बिजनेस स्टैंडर्ड - रोजगार दर निर्धारण को नीतिगत लक्ष्य बनाने का आ गया वक्त
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रोजगार दर निर्धारण को नीतिगत लक्ष्य बनाने का आ गया वक्त

श्रम-रोजगार
महेश व्यास /  October 08, 2020

श्रम बाजार के आंकड़े सितंबर 2020 में कुछ हद तक बेहतर हुए हैं। बेरोजगारी दर अगस्त के 8.4 फीसदी से गिरकर सितंबर में 6.7 फीसदी पर आ गई। यह पिछले 18 महीनों की सबसे कम बेरोजगारी दर है। अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उस महीने में रोजगार दर भी करीब 38 फीसदी पर पहुंच गई जो अगस्त में 37.5 फीसदी पर थी। रोजगार दर का यह लॉकडाउन के बाद का उच्चतम स्तर है। इसने अगस्त में आई हल्की गिरावट से सुधार भी दर्ज किया है। ये बदलाव स्वागतयोग्य हैं।

लेकिन सितंबर में श्रम भागीदारी दर (एलपीआर) में गिरावट दर्ज की गई है। यह अगस्त के 41 फीसदी से घटकर पिछले महीने 40.7 फीसदी पर आ गई। यह थोड़ा अजीब है क्योंकि रोजगार दर में सुधार और बेरोजगारी दर में गिरावट आने से श्रमशक्ति में विस्तार की गुंजाइश बनती है, लिहाजा एलपीआर भी बेहतर होनी चाहिए थी। हम मान सकते हैं कि रोजगार दर में वृद्धि का मतलब बेरोजगारों को अवसर मिलने से है जिससे बेरोजगारी दर में गिरावट भी आई है। बेरोजगार लोगों को काम मिलने का तार्किक नतीजा यह है कि अधिक संख्या में लोगों को नौकरियों की तलाश करना चाहिए। ऐसा होने पर श्रमशक्ति में वृद्धि होनी चाहिए। लेकिन सितंबर महीने में ऐसा नहीं हुआ है। श्रमशक्ति में सिकुडऩ आई और श्रम भागीदारी दर गिर गई।

सितंबर 2020 में एलपीआर 40.7 फीसदी वर्ष 2019-20 की औसत एलपीआर 42.7 फीसदी से 199 आधार अंक कम है। बीते तीन महीनों में हासिल खासी बढ़त को सितंबर में आंशिक तौर पर गंवा देना हमारे लिए चिंता की बात होनी चाहिए क्योंकि आर्थिक बहाली प्रक्रिया में इसको भी कवर करने की पूरी गुंजाइश मौजूद है। छह महीनों के लॉकडाउन के बाद एलपीआर के पिछले साल की तुलना में करीब 200 अंक कम रहने से भारत एक बार फिर अपनी युवा श्रमशक्ति की क्षमता का फायदा उठाने से चूक गया है।

श्रम भागीदारी दर वर्ष 2016-17 के बाद से ही लगातार गिरती रही है जब यह 46.1 फीसदी हुआ करती थी। नवंबर 2016 में की गई नोटबंदी का व्यापक असर आने और जुलाई 2018 में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने से वर्ष 2017-18 में एलपीआर 256 अंक तक गिर गई थी। वर्ष 2018-19 में यह 77 आधार अंक फिसली और फिर 2019-20 में इसमें 14 अंकों की गिरावट दर्ज की गई थी। आठ महीनों के ही भीतर लगे नोटबंदी एवं जीएसटी के दोहरे आघातों ने एलपीआर पर दीर्घकालिक असर डाला। लगता है कि लॉकडाउन का भी कुछ ऐसा ही असर रह सकता है। एलपीआर हमें बताता है कि कामकाजी उम्र वाली जनसंख्या के कितने लोग नियुक्त किए जाने की इच्छा रखते हैं। अगर यह अनुपात गिरता रहता है तो यह भारत की आर्थिक वृद्धि के लिहाज से अच्छा नहीं है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था में बहाली की सभी कहानियों को मिथक बनाकर रख देता है।

वृद्धि के नजरिये से देखें तो यह काफी अहम है कि कामकाजी उम्र वाली आबादी का बढिय़ा अनुपात काम करने का इच्छुक है और उसके एक अच्छे हिस्से को वास्तव में रोजगार मिल भी जाता है। रोजगार पाने वाला यह आबादी अनुपात ही रोजगार दर कहा जाता है। रोजगार दर से हमें पता चलता है कि कामकाजी उम्र वाली आबादी के कितने लोगों को असल में रोजगार मिला हुआ है।

रोजगार दर एलपीआर में गिरावट के अनुरूप ही पतनोन्मुख रही है। यह वर्ष 2016-17 के 42.7 फीसदी से गिरकर 2017-18 में 41.6 फीसदी पर आई और फिर 2018-19 में यह तीव्र गिरावट के साथ 40.1 फीसदी हो गई। पिछले वित्त वर्ष में तो यह 39.4 फीसदी पर ही खिसक गई। वर्ष 2016-17 और 2019-20 के बीच रोजगार दर में 329 आधार अंकों की बड़ी गिरावट आई है। सितंबर 2020 में रोजगार दर 38 फीसदी आंकी गई है जो कि गत वित्त वर्ष से भी 144 आधार अंक नीचे है।

संदर्भ के लिए, अंतरराष्टï्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के मॉडल पर आधारित वैश्विक अनुमानों के मुताबिक कार्यशील जनसंख्या का 57.2 फीसदी हिस्सा रोजगार में लगा है। इसी मॉडल के हिसाब से भारत की रोजगार दर 47 फीसदी और दक्षिण एशिया की 48 फीसदी थी। पाकिस्तान की रोजगार दर 50 फीसदी, श्रीलंका की 51 फीसदी और बांग्लादेश की 57 फीसदी थी। इस लिहाज से भारत को वैश्विक मानकों तक पहुंचने और अपने पड़ोसियों की भी बराबरी करने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना है। चीन में तो रोजगार दर 65 फीसदी के स्तर पर है।

लंबे समय से भारत में बहस इसकी अच्छी वृद्धि दर होने के बावजूद रोजगार पैदा कर पाने में नाकामी पर केंद्रित रही है। भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) हाल फिलहाल तक बढिय़ा गति से बढ़ता रहा है लेकिन रोजगार के मामले में ऐसा नहीं हुआ। वर्ष 2016-17 और 2019-20 के दौरान वास्तविक जीडीपी 6 फीसदी से थोड़ा अधिक दर से बढ़ी लेकिन रोजगार में लगे लोगों की संख्या 40.7 करोड़ से घटकर 40.3 करोड़ पर आ गई। सितंबर 2020 में तो यह आंकड़ा 39.8 करोड़ रहा है।

भारत को इस गिरावट पर लगाम लगानी होगी। लेकिन रोजगार में महज वृद्धि का लक्ष्य पर्याप्त नहीं है। यह वृद्धि कम-से-कम जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में होना चाहिए। एक स्वीकार्य रोजगार दर को नीतिगत लक्ष्य बनाना इस समस्या से निपटने का सबसे बढिय़ा तरीका है।

रोजगार में कई दशकों की गिरावट के बावजूद नीति-निर्माण में एक महत्त्वपूर्ण वृहद-आर्थिक संकेतक के तौर पर रोजगार को लगातार नजरअंदाज किया जाना असाधारण बात है। रोजगार की कमी एवं आरक्षण की मांग को लेकर राजनीतिक प्रदर्शन जारी रहने के बावजूद नीति-निर्माण में रोजगार को कोई स्थान नहीं मिल पाया है। नौकरियों में आरक्षण को अब न्यायपालिका से अवरोधों का सामना करना पड़ता है। वैसे भी आरक्षण कुल जमा शून्य वाला खेल (ज़ीरो-सम गेम) है। बेहतर तो यह होगा कि भारत रोजगार दर का लक्ष्य-निर्धारण करना शुरू करे। मुद्रास्फीति लक्ष्य-निर्धारण ही काफी नहीं है।
(लेखक सीएमआईई के प्रबंध निदेशक एवं सीईओ हैं)

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