बिजनेस स्टैंडर्ड - विकल्पहीनता से आई तेजी
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विकल्पहीनता से आई तेजी

संपादकीय /  October 08, 2020

अक्टूबर माह में वैश्विक शेयर बाजारों में जबरदस्त सुधार देखने को मिला है। भारतीय शेयर बाजार भी अन्य बाजारों की राह पर चलते नजर आए। सेंसेक्स और निफ्टी अब  जनवरी के अपने स्तर से लगभग 2.5 फीसदी नीचे हैं। सेंसेक्स ने जहां दोबारा 40,000 के स्तर को छू लिया, वहीं निफ्टी अब तक के अपने उच्चतम स्तर से महज कुछ प्रतिशत नीचे है। महामारी के कारण मची उथलपुथल के बीच यह प्रदर्शन उल्लेखनीय है। यह तेजी आंशिक रूप से उच्च नकदी और कम ब्याज दरों के कारण भी आई है। इसके अलावा वास्तविक आर्थिक गतिविधियों के अभाव में शेयरों में निवेश बढ़ा है। भारतीय रिजर्व बैंक समेत हर केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में कटौती की है और महामारी के दौरान नकदी बढ़ाने के उपाय किए हैं। मुद्रास्फीति में भी तेजी आई है लेकिन कमजोर अर्थव्यवस्था के कारण आरबीआई नीतिगत दरें नहीं बढ़ा पा रहा। मौद्रिक नीति को कड़ा करने में भी यही मुश्किल आ रही है। वास्तविक ब्याज दरें ऋणात्मक हैं इसलिए ज्यादा से ज्यादा कोष शेयरों का रुख कर रहे हैं। म्युचुअल फंडों के आंकड़े भी इसकी गवाही दे रहे हैं। डेट फंड से पैसा इक्विटी फंड की ओर रुख कर रहा है। इसके अलावा कारोबारों के क्षमता से कम काम करने के कारण क्षमता विस्तार भी नहीं हो रहा है। कार्यशील पूंजी की आवश्यकता भी कम हुई है और ज्यादा नकदी मुक्त होकर शेयरों में आई है।

बाजार आर्थिक स्थिति में सुधार के संकेतों पर भी भरोसा कर रहा है। उच्च तीव्रता वाले संकेतक और शुरुआती कारोबारी नतीजे यही संकेत देते हैं कि अर्थव्यवस्था एकदम निचले स्तर पर पहुंच गई है जहां से सुधार ही संभव है। वाहनों की बिक्री की बात करें तो घरेलू मांग और निर्यात दोनों बेहतर हुए हैं। कई कारोबार मसलन वाहन डीलरशिप आदि ने त्योहारी मौसम में मांग में तेजी आने की आशा में माल तैयार रखा है। परंतु याद रहे कि इससे पहले वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2020) और गत वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर 2019) में हालात बहुत खराब रहे। ऐसे में अनुमान को समायोजित करके कम करना होगा, भले ही सालाना आधार पर कुछ भी तुलना हो। शेयरों का मूल्यांकन भी बढ़ा हुआ है। यदि अगले छह महीने बहुत अच्छे गुजरते हैं तो भी वित्त वर्ष 2020-21 में अधिकांश कंपनियों के शुद्ध लाभ और राजस्व में कमी आएगी।

निजी खपत के अलावा सरकारी व्यय भी सीमित है। इस सवाल का जवाब अब भी बाकी है कि बैंकों पर कितना बुरा असर हुआ है? सरकारी क्षेत्र के बैंकों का पुनर्पूंजीकरण स्थगित रहेगा। राजकोषीय घाटे में इजाफा हो सकता है। बहरहाल, सकारात्मक पहलुओं की बात करें तो ईंधन कीमतें निकट भविष्य में कमजोर बनी रह सकती हैं। इससे व्यापारिक मोर्चे पर कम दबाव आएगा। भू-राजनीतिक समीकरणों को भी ध्यान में रखना होगा। भारत-चीन विवाद अगले कुछ महीनों तक लंबित रह सकता है। यूरोपीय संघ और ब्रिटेन में वार्ता का एक और दौर चल रहा है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात, नवंबर के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में अगर डेमोक्रेट प्रत्याशी की जीत हुई तो विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में व्यापक बदलाव आ सकता है। ओपिनियन पोल में ऐसी राय निकलने के बाद बाजार संभावित असर की तैयारी भी कर रहे हैं। डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी प्रशासन न केवल कोविड-19 से ठीक से नहीं निपट पाया बल्कि उसने शुल्क दरें बढ़ाईं, वीजा नियम कड़े किए और करों तथा सामाजिक सुरक्षा व्यय में कमी की। नया प्रशासन व्यापक राजकोषीय प्रोत्साहन और सामाजिक सुरक्षा बढ़ा सकता है। वीजा नियम आसान हो सकते हैं और शुल्क दरों की जंग खत्म हो सकती है जो दुनिया भर के लिए बेहतर होगा। बाजार के कदम भविष्य के आय अनुमान से जुड़े होते हैं जो अभी अस्पष्ट हैं। आसान नकदी और विकल्प की कमी के कारण शेयरों का मूल्यांकन असामान्य स्तर तक बढ़ा है।

Keyword: विकल्पहीनता, शेयर बाजार, सेंसेक्स, निफ्टी, नकदी, ब्याज दर, आर्थिक गतिविधि, मुद्रास्फीति,
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