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ऐतिहासिक रूप से अस्पष्ट है भारत और चीन की सीमा

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  October 06, 2020

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना के अगले वर्ष यानी सन 1950 में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी(पीएलए) के दो समूहों में तिब्बत को 'आजाद' कराने की होड़ शुरू हुई। सिचुआन प्रांत से दक्षिण-पश्चिम (एसडब्ल्यू) सेना ने चेंगदू से ल्हासा की ओर कूच किया। उसके राजनीतिक प्रमुख थे युवा तंग श्याओफिंग। इस बीच उत्तर-पश्चिम (एनडब्ल्यू) सेना ने शिनच्यांग से कूच किया और उसका नेतृत्व फान मिंग के पास था। एनडब्ल्यू सेना को एक निर्जन मैदान से जटिल रास्ता तय करना था जबकि सिचुआन से सफर आसान था। जाहिर है तंग आसानी से जीत गए। जाहिर है इससे दोनों सेनाओं के बीच ताल्लुकात खराब हुए। पीएलए की एक प्राथमिकता थी शिनच्यांग और तिब्बत को राजमार्ग से जोडऩा।

एक अप्रामाणिक किस्से के अनुसार सन 1957 में एक सुबह जब चीन में भारत के दूत सरदार केएम पणिक्कर ने अखबार खोला तो उन्हें पता चला कि भारत के दावे वाले अक्साई चिन के रास्ते पश्चिमी राजमार्ग पूरा हो चुका है। भारत के खुफिया विभाग ने बाद में इसकी पुष्टि की। पीएलए के आरंभिक इतिहास और मौजूदा कदम उस राजमार्ग (जी-219) को एक ऐसा तोहफा बनाते हैं जिसकी वह भारत से उत्साहपूर्वक सुरक्षा करता है। गौरतलब है कि भारत अक्साई चिन गंवाने और तिब्बत के चीन में विलय से तालमेल नहीं बिठा पाया। इन गर्मियों में पीएलए के सैनिकों के लद्दाख में घुसने के मामले में राजमार्ग जी-219 भी प्रेरक रहा होगा। चीन ने कभी यह जाहिर नहीं किया कि उसके मुताबिक एलएसी कहां तक है। हाल ही में उसने एक भारतीय समाचार पत्र से यही कहा कि भारत-चीन सीमा 7 नवंबर, 1959 को एलएसी की स्थिति के अनुसार है। उसने कहा कि भारत समेत अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस बारे में जानता है।

बीते 150 वर्ष में ब्रिटेन, चीन और भारत ने कई बार इस सीमा को तय करने का प्रयास किया। सबने अपने स्वार्थ के मुताबिक ऐसा किया इसलिए दूसरे पक्षों ने उसे कभी स्वीकार नहीं किया। चीन ने कभी अपनी तरफ से एलएसी के बारे स्पष्ट बात नहीं कही और भारत अनुमान ही लगाता रहा। इस बीच चीन अपनी इच्छा से लगातार जमीनी स्थितियों में बदलाव करता रहा।

अब चीन ने अपने दावे के साथ एक तारीख भी जोड़ दी है तो यह याद करना उचित है कि 19वीं सदी के मध्य से एलएसी को लेकर क्या दावे किए गए हैं। इस क्षेत्र में अपरिभाषित सीमा से सभी पक्ष संतुष्ट थे लेकिन औपनिवेशिक शक्तियों का आगमन हुआ और ब्रिटेन तथा दक्षिण की ओर विस्तार करते हुए रूस के बीच टकराव उत्पन्न हुआ। ब्रिटेन, कमजोर चीन को आगे बढ़ते रूस के खिलाफ बचाव में इस्तेमाल करना चाहता था इसलिए उसने उसके साथ सीमा तय करनी चाही। ब्रिटिश रणनीतिकारों का एक समूह चाहता था कि सीमा शिनच्यांग के भीतर खींची जाए जबकि एक तबका इस प्रयास पर होने वाले खर्च के कारण इसके खिलाफ था।

19वीं सदी की दूसरी छमाही में ब्रिटेन की सीमावर्ती नीति उक्त दोनों समूहों के बीच झूल रही थी। पहले समूह ने महत्त्वाकांक्षी जॉनसन-अर्दाघ रेखा खींची जो कुएन लुन के समांतर थी और जिसमें अक्साई चिन भारत में दर्शाया गया। बाद वाले समूह ने मैकार्टनी-मैकडॉनल्ड रेखा खींची जो काराकोरम और लाक्त्सांग के दरमियान थी और अक्साई चिन को चीन में दिखाया गया। सन 1947 में भारत आजाद हो गया और उस समय के मानचित्र पूर्वी लद्दाख को 'अपरिभाषित' क्षेत्र कहा गया। कुछ वर्ष बाद जब भारत ने अपना पहला मानचित्र जारी किया था तो अक्साई चिन को भारत में दिखाया।

चीन ने ब्रिटेन के 19वीं सदी के सभी प्रस्तावों को नकार दिया। इसमें 1914 में शिमला में तय की गई मैकमोहन रेखा भी शामिल थी। चीन ने 1956 में अपना पहला नक्शा जारी किया और अक्साई चिन को अपना हिस्सा बताया। इसके बावजूद डेपसांग के मैदान चिप चैप घाटी क्वारा क्वाश और गलवान नदियां पैंगोंग झील का अधिकांश भाग और स्पांगुर झील का एक हिस्सा भारत के पास रहा। चीन के प्रधानमंत्री चाऊ  एनलाई ने 1959 में भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लिखे पत्र में इस सीमा की पुष्टि की। इसी पत्र में पहली बार वास्तविक नियंत्रण रेखा का जिक्र किया गया। सन 1960 की औपचारिक वार्ता में चीनी प्रतिनिधिमंडल ने सीमा का नया संस्करण पेश किया और 1956 की सीमा रेखा और पश्चिम की ओर हो गई। चीन ने कहा कि 1960 की लाइन ज्यादा सटीक है। इस लाइन में डेपसांग क्वारा क्वाश और गलवान नदी घाटी और स्पांगुर झील के अधिक हिस्से पर दावा किया गया था। पैंगोंग झील में सीमा सिरिजाप से निकली।

सन 1962 की जंग में चीन ने भारत की काफी जमीन हड़प ली और एलएसी और पश्चिम में खिसक गई। जंग के बाद पीएलए घुसपैठ किए हुए इलाके से 20 किलोमीटर पीछे हटी लेकिन यह कदम बहुत वैकल्पिक ढंग से उठाया गया। जंग के पहले की स्थिति की तुलना में चीन ने भारत का 3,500 वर्ग किलोमीटर इलाका हथिया लिया। बहरहाल, कई इलाकों में चीन उन इलाकों से पीछे हटा जिन पर उसने 1960 में दावा किया था। इसमें डेपसांग और गलवान नदी घाटी शामिल थे।

चीन अब दोबारा सन 1960 की स्थिति बनाना चाहता है। हालांकि यह विरोधाभासी प्रतीत होता है क्योंकि इस साल वह खुद कई जगह उस सीमा का उल्लंघन कर चुका है। विदेश मंत्रालय के पूर्व अधिकारी याद करते हैं कि सन 1983-84 में दोनों पक्ष ऐसे समझौते पर बात कर रहे थे जहां भारत अक्साई चिन और चीन अरुणाचल प्रदेश पर दावा छोड़ देता। उस वक्त सेना ने वार्ताकारों को एलएसी की अपनी परिभाषा वाला मानचित्र दिया था।

चीन ने आज तक 1962 के बाद और नवंबर 1959 के पहले की रेखा के बीच के अंतर को स्वीकार नहीं किया। सन 1993 में शांति समझौते पर वार्ता के दौरान ये अस्पष्टताएं सामने आईं। समझौते में दोनों देशों ने कहा कि एलएसी को स्पष्ट किया जाएगा और नक्शों का आदान प्रदान होगा। परंतु चीन की ओर से गतिरोध कायम है और एलएसी को लेकर कुछ भी स्पष्ट नहीं।

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