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लगभग मुफ्त होती मुद्रा और भारत का संशय

राजेश कुमार /  October 04, 2020

आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) के हालिया पूर्वानुमान बताते हैं कि इस साल वैश्विक अर्थव्यवस्था में 4.5 फीसदी का संकुचन होगा। भले ही वर्ष 2021 में आर्थिक गतिविधि में सुधार आने की संभावना है लेकिन महामारी की वजह से पैदा हुई अनिश्चितता चिरस्थायी होगी। दुनिया भर में नीति-निर्माता आर्थिक क्षति को सीमित रखने के लिए आक्रामक तरीके से हस्तक्षेप कर रहे हैं। जहां यह उम्मीद करना तर्कसंगत है कि सरकारें एवं केंद्रीय बैंक आर्थिक दुर्घटना से बचने और एक टिकाऊ बहाली लाने के लिए हरसंभव प्रयास करना चाहेंगे, वहीं बड़े केंद्रीय बैंकों के कुछ हस्तक्षेपों से भारत जैसे उदीयमान बाजारों में नीतिगत जटिलता बढऩे की आशंका है।

अमेरिकी फेडरल रिजर्व के आर्थिक पूर्वानुमानों से संकेत मिलता है कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में नीतिगत दरें कम-से-कम वर्ष 2023 तक शून्य के आसपास ही बनी रहेंगी। फेड रिजर्व ने एक औसत मुद्रास्फीति निर्धारण प्रारूप की तरफ भी कदम बढ़ाए हैं। फलस्वरूप अमेरिकी केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति के 2 फीसदी के निर्धारित लक्ष्य से नीचे रहने के बाद कुछ समय तक लक्ष्य से थोड़ा ऊपर भी जाने देगा। इसका मतलब है कि नीतिगत दरें एक विस्तारित अवधि तक निम्न स्तर पर ही बनी रहेंगी। मसलन, फेड रिजर्व इस नीतिगत प्रारूप के तहत वर्ष 2015 से ही ब्याज दरों को बढ़ा नहीं पाया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या नया प्रारूप वास्तव में मुद्रास्फीति अपेक्षाओं को प्रभावित करता है?

इसके अलावा मुद्रास्फीति के निर्धारित लक्ष्य के करीब पहुंचने पर नया प्रारूप एक हद तक भ्रम भी पैदा करेगा। वित्तीय बाजारों को यह स्पष्ट नहीं हो सकता है कि केंद्रीय बैंक किस बिंदु पर ब्याज दरों में वृद्धि करना शुरू करेगा। सैद्धांतिक तौर पर मुद्रास्फीति के निर्धारित लक्ष्य से काफी अधिक हो जाने पर फेड रिजर्व को एक समयावधि में इसे औसत स्तर पर लाने के लिए 2 फीसदी के नीचे लाने रखना पड़ सकता है जो नीतिगत निर्णय को भी प्रभावित करेगा। हालांकि निकट भविष्य में मौद्रिक नीति के उदार ही बने रहने की संभावना है।

अमेरिकी फेड रिजर्व मौद्रिक नीति में नवाचार लाने वाला अकेला केंद्रीय बैंक नहीं है। यूरोपीय केंद्रीय बैंक (ईसीबी) भी बैंकों को नीतिगत दरों से स्वतंत्र ऋणात्मक दरों पर उधार दे रहा है। जहां अतिरिक्त अधिशेष के एक हिस्से के लिए जमा दर को शून्य के करीब रखा गया है, वहीं ईसीबी की बैंकों को दी जाने वाली उधारी की ब्याज दर कुछ खास परिस्थितियों में ऋणात्मक 1 फीसदी तक जा सकती है। यह दलील दी जा रही है कि इस नीति का कोई आधार नहीं है और दरों में अभी और कमी आ सकती है। ऐसे में स्वाभाविक सवाल यह उठता है कि क्या केंद्रीय बैंक को जमा दर से कम दर पर उधार देने से नुकसान नहीं होगा और क्या इससे बैंकिंग प्रणाली में जोखिम नहीं बढ़ जाएगा? निश्चित रूप से जोखिम बढ़ेगा लेकिन शायद वह मुद्दा किसी और समय चर्चा के लायक है। दिलचस्प ढंग से ईसीबी के नीतिगत कदमों को ज्यादा तवज्जो नहीं मिली है। इस बीच बैंक ऑफ जापान ने लक्ष्य प्रतिफल को जारी रखने का फैसला किया है।

बड़े केंद्रीय बैंकों के रुख एवं मौद्रिक नीति के प्रारूप में किए गए हालिया बदलावों का मतलब है कि निकट भविष्य में वैश्विक वित्तीय प्रणाली में मुद्रा की लागत निम्न स्तर पर ही बनी रहेगी। जहां इसका मकसद आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाना है, वहीं अत्यधिक नीतिगत समायोजन के अनचाहे नतीजे भी हो सकते हैं। मसलन, शेयर बाजार इस समय काफी हद तक बुनियादी असलियत से अलग ही बरताव कर रहे हैं।

बड़े केंद्रीय बैंकों के मौद्रिक नीतिगत हस्तक्षेपों से भारत जैसे उदीयमान बाजारों में अच्छा-खासा पूंजी प्रवाह होगा। असल में आयात मांग में गिरावट आने से भारत पहले ही विशाल अधिशेष की स्थिति का सामना कर रहा है और इससे उसकी नीतिगत जटिलताएं बढ़ी हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने वित्त वर्ष 2020-21 की शुरुआत से अब तक करीब 66 अरब डॉलर का अधिशेष जोड़ा है। लेकिन अतिरिक्त विदेशी मुद्रा को खपाने के लिए बाजार में आरबीआई के दखल देने से रुपये की तरलता बढ़ रही है जिससे मुद्रास्फीति नतीजों पर असर पड़ सकता है। मुद्रास्फीति कई महीनों से आरबीआई के लक्ष्य से ऊपर चल रही है।

कुछ अन्य जटिलताएं भी हो सकती हैं। वित्तीय प्रणाली में अत्यधिक तरलता होने से आरबीआई सरकार के उधारी कार्यक्रम को भी समर्थन नहीं दे पा रहा है क्योंकि सामान्य खुले बाजार में उसके दखल से व्यवस्था में तरलता और बढ़ जाएगी। आरबीआई ने संकेत दिया है कि वह रुपये के अधिमूल्यन को लेकर सहज है क्योंकि इससे आयातजन्य मुद्रास्फीति पर लगाम लगेगी। लेकिन आरबीआई को इस दिशा में सजगता के साथ बढऩे की जरूरत होगी। रुपये के मूल्य में खासी बढ़ोतरी और अतिरिक्त पूंजी प्रवाह को खपाने में आरबीआई की अनिच्छा या नाकामी के बारे में किसी भी संकेत से और अधिक कल्पित फंड आने लगेगा और रुपये पर दबाव बढ़ जाएगा। हद से ज्यादा मूल्य वाला रुपया न केवल भारत की बाह्य प्रतिस्पद्र्धात्मकता को प्रभावित करेगा बल्कि इससे वित्तीय स्थिरता के लिए जोखिम भी बढ़ सकता है। दिलचस्प रूप से मुद्रा को लेकर आरबीआई का रुख व्यापार के बारे में सरकार के रुख से कुछ हद तक विरोधाभासी है। जहां सरकार आयात में कटौती के लिए शुल्क बढ़ा रही है, वहीं रुपये की कीमत बढऩे देने के आरबीआई के नजरिये से आयात को प्रोत्साहन मिलेगा।

इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार का रुख सही है लेकिन वृहद-आर्थिक नीतियों में सामंजस्य होना चाहिए। ऐसी स्थिति में नीति-निर्माता क्या कदम उठा सकते हैं? यह स्वीकार करना महत्त्वपूर्ण है कि नीतिगत ढांचा जल्दबाजी में नहीं बदलेगा। लिहाजा भारत को अधिक विवेकसम्मत प्रतिक्रिया की जरूरत होगी।

मौजूदा हालात में भारत के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार होने से वह विदेशी डेट फंडों के प्रवाह की समीक्षा कर सकता है। इससे न केवल अंतर्वाह एवं वित्तीय स्थिरता को लेकर जोखिम कम होगा बल्कि भारतीय कंपनियां इक्विटी पूंजी जुटाने के लिए भी प्रेरित होंगी जो लंबी अवधि वाली होती है। इससे भारतीय कंपनियों को मौके का फायदा उठाने में मदद मिलेगी। लेकिन इससे समस्या शायद पूरी तरह हल नहीं भी हो। इस तरह आरबीआई को लेनदेन संभालने में बहुत ज्यादा सावधान रहने की जरूरत होगी।

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