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चीन की रणनीति को समझना आवश्यक

प्रेमवीर दास /  October 02, 2020

चीन के साथ लगने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के घटनाक्रम को लेकर पिछले कुछ महीनों में काफी कुछ लिखा गया है। इसमें विषय के जानकार और सामरिक दृष्टि से सक्षम लोगों का लेखन भी शामिल है। सर्वाधिक समझदार लोग यह तय करने में लगे हैं कि हम 'सीमाओं' का निर्धारण चाहते हैं, जैसा कि दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने अपने पिछले पांच बिंदुओं वाले संयुक्त वक्तव्य में कहा भी, उस एलएसी को अंतिम रूप देना चाहते हैं जिसके बारे में चीन और भारत की समझ अलग-अलग है या फिर केवल सेना को पीछे हटाना चाहते हैं। चीन जो कर रहा है वह क्यों कर रहा है इसे लेकर बातें की जा रही हैं। क्या वह और अधिक भूभाग चाहता है, हमें हमारी 'जगह' दिखाना चाहता है या फिर इसके पीछे कोई बड़ा 'सामरिक' लक्ष्य है? ऐसी तमाम बातों को लेकर हमारी राजनीतिक प्रतिक्रिया यही है कि हम अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता अथवा क्षेत्रीय अखंडता से कभी समझौता नहीं होने देंगे। मुझे लगता है कि चीन इस रुख से प्रसन्न होगा।

चीन के साथ लगने वाली तथाकथित 'सीमा' पश्चिम से पूर्व तक करीब 3,500 किलोमीटर लंबी है। मौजूदा विवाद इस सीमा के पश्चिमी हिस्से में लद्दाख में पैंगोंग त्सो, फिंगर 2 से 8 और डेपसांग इलाके में है। जानकारी के मुताबिक इस हिस्से में दोनों पक्षों के करीब 40,000 जवान और हथियार तथा अन्य सामग्री हैं। इस इलाके के कुछ हिस्से में टैंक भी तैनात हैं जबकि अन्य हिस्से ऊंचाई पर हैं जहां मौजूद व्यक्ति नीचे वाले पक्ष पर दबदबा कायम कर सकता है। चीन इस इलाके में 15 से 18 किमी भूभाग में हो या फिर हम ऊंचाई से उसकी टुकडिय़ों को देख सकते हों, इन बातों से विवाद की स्थिति पर कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि पूरा परिदृश्य बहुत सामरिक है। हालांकि युद्ध जैसे हालात बनते नहीं दिखते लेकिन यदि ऐसा हो ही जाए तो दोनों देश बहुत सीमित युद्ध लड़ेंगे। एक अपनी जमीन बचाने के लिए तो दूसरा सामने वाले की जमीन पर काबिज होने के लिए लड़ेगा। यदि चीन से उसके ही खेल में मुकाबला करना है तो इस क्षेत्र में मौजूद सामरिक माहौल की समझ जरूरी है।

तो क्या तस्वीर जितनी दिख रही है उससे कहीं अधिक व्यापक है? इस बात पर आम सहमति है कि चीन की आर्थिक ताकत अगले तीन दशक में अमेरिका को पीछे छोड़ देगी। चीन मान रहा है कि उस समय तक वह अमेरिका से आगे नहीं तब भी उसकी बराबरी की शक्ति होगा। अर्थव्यवस्था की अपनी ताकत है लेकिन वह एक सीमा तक ही आगे ले जा सकती है। सैन्य शक्ति की बात करें तो चीन की नौसेना तादाद में भले ही अमेरिकी नौसेना से बड़ी हो लेकिन गुणात्मक आधार पर उसे अभी लंबा सफर तय करना है। तकनीक के मामले में भी यही सच है। यदि चीन को व्यापक सामरिक लक्ष्य हासिल करने हैं तो इन क्षेत्रों में भी आगे बढऩा होगा। इसके लिए उसे उस बात का पालन करना होगा जिसे अमेरिकी रणनीतिकार फ्रेड हार्टमैन ने 'शत्रुओं का संरक्षण' करना कहा था, न कि उनकी तादाद बढ़ाना। ऐतिहासिक संदर्भ को देखते हुए ऐसे कुछ संभावित या वर्तमान शत्रु मसलन जापान आदि को दूर तो नहीं किया जा सकता। प्रश्न यह है कि क्या भारत को इस सूची में शामिल किया जाए?

यदि हम सुन जू की इस बात पर यकीन करें कि युद्ध बिना लड़े जीते जाते हैं तो यह माना जाना चाहिए कि यह जीत लद्दाख की हिमाच्छादित चोटियों पर नहीं हासिल होगी। हमें यह मानना होगा कि चीन व्यापक लक्ष्य पर केंद्रित रहेगा और वह है विश्व की सबसे बड़ी शक्ति बनना। इस राह में भी बाधाएं हैं लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण बाधा है उसका समुद्री शक्तिन बन पाना। सबसे बड़ी बात यह है कि दक्षिण और पूर्वी चीन सागर में यह अमेरिकी ताकत का मुकाबला कर पाने में सक्षम नहीं है। यदि जापान की क्षमताओं को शामिल कर दिया जाए क्योंकि वह अमेरिका का सैन्य सहयोगी है तो हालात और भी निराशाजनक हो जाते हैं। चीन का इनमें से किसी को भी पछाड़ पाना दूर की कौड़ी है। अमेरिका योकुसुका, गुआम और हवाई के अपने अड्डों से क्या कुछ तैनात कर सकता है इसकी कल्पना ही चीन को कंपा देने के लिए काफी है। गुआम हिंद महासागर क्षेत्र में मौजूद सबसे संवेदनशील अड्डा है। चीन ने पाकिस्तान, इथियोपिया, सेशल्स और मालदीव में नौसैनिक क्षमता विकसित करने का प्रयास किया लेकिन वे कभी भी भारत जैसे नौसैनिक क्षमता वाले देश का मुकाबला करने में सक्षम नहीं हो सकेंगे। इस क्षेत्र में अमेरिकी क्षमता की भी अनदेखी नहीं की जा सकती है। यदि उसे भारत का साथ मिल जाए तो हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के लिए बहुत मुश्किल खड़ी हो सकती है और उसकी सामरिक महत्त्वाकांक्षा पर लगाम लग सकती है।

सवाल यह है कि चीन एलएसी पर क्या हासिल करना चाहता है? यदि वह भारत को अमेरिका की तरफ और अधिक झुकने पर मजबूर करता है तो यह अच्छी रणनीति नहीं मानी जाएगी। यह दलील सही नहीं है कि वह दुनिया को भारत और अपने बीच का अंतर दिखाना चाहता है क्योंकि दोनों के बीच का अंतर पहले ही दुनिया के सामने है। उसके इस कदम से यह जरूर हो रहा है कि भारत को अपने सीमित संसाधन ऐसी सीमा पर लगाने पड़ रहे हैं जिसका चीन के व्यापक हित में कोई महत्त्व नहीं है और ऐसा करके वह भारत को एक ऐसे क्षेत्र से दूर रख रहा है जहां वह चीन को पछाड़ सकता है और उसके सामरिक लक्ष्यों को सीमित कर सकता है। उसमें यह क्षमता है कि वह हिंद महासागर की जीवन रेखा माने जाने वाले क्षेत्र जिसमें मलक्का की खाड़ी का रास्ता शामिल है, पर दबदबा कायम कर सके। हमारी समुद्रीय शक्ति को सीमित करना चीन के सामरिक हित में अहम है और साफ जाहिर है कि एलएसी के घटनाक्रम ने चीन को यह लक्ष्य हासिल करने में मदद की है।

भविष्य में भारत को चीन के ऐसे चतुराईपूर्ण कदमों के कारण पीछे नहीं हटना चाहिए। हमें पाकिस्तान को नहीं चीन को अपना प्रमुख दुश्मन मानना होगा और ऐसे उपाय करने होंगे जो यह सुनिश्चित करें कि चीन उन इलाकों में हमारी बराबरी न कर सके जो उसके सामरिक हित के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। चुशुल और डेपसांग इस खेल में महत्त्वपूर्ण नहीं हैं जबकि हिंद महासागर क्षेत्र काफी अहम है।
(लेखक राष्टï्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य रह चुके हैं)

Keyword: चीन, रणनीति, एलएसी, सामरिक, सेना, सीमा विवाद, लद्दाख, नौसेना, हवाई अड्डे, हिंद महासागर,
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