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पश्चिमी केंद्रीय बैंकों में बदलाव के अनुकरण से बचे आरबीआई

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  October 01, 2020

पश्चिमी देशों के केंद्रीय बैंकों के कामकाज, जवाबदेहियों और कार्य प्रणाली में गंभीर बदलाव आ रहे हैं लेकिन ऐसा करते हुए इसके गंभीर परिणामों को नहीं समझा गया है और न ही इस पर लोकतांत्रिक चर्चा हो रही है। भारत कई बार उनके नीतिनिर्णयों का यह सोचकर अंधानुकरण करता है कि बतौर परिपक्व अर्थव्यवस्था वह भी ऐसे ही बदलाव कर सकता है। परंतु भारत एक विकासशील देश है जहां संस्थान उतने स्थिर नहीं हैं। ऐसे में उसे और खासतौर पर रिजर्व बैंक को नीतिगत प्राथमिकताओं में बदलाव से पहले सतर्कता बरतनी चाहिए। हाल के दिनों में ऐसा सबसे बड़ा बदलाव अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व में आया है। इस वर्ष ऑनलाइन आयोजित की गई दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों की सालाना जैकसन होल संगोष्ठी में फेडरल रिजर्व के चेयरमैन जे पॉवेल ने कहा कि बैंक की मुक्त बाजार समिति अपनी मौद्रिक नीति बदलकर 2 प्रतिशत के विशिष्ट मुद्रास्फीति लक्ष्य के बजाय 2 प्रतिशत के 'औसत मुद्रास्फीति लक्ष्य' को ध्यान में रखकर काम करेगी। इसके पहले लंबी समीक्षा हुई और शायद यह निर्णय कोविड-19 के झटके के पहले ही ले लिया गया होगा। यह निर्णय केंद्रीय बैंक के मुद्रास्फीति को लक्षित करने के अब तक के तरीके को शिथिल करता है। मौद्रिक लक्ष्य तय करना इसलिए अहम माना जाता था क्योंकि यह पारदर्शी था। इससे यह आशंका समाप्त हो जाती थी कि बाजार प्रतिभागी केंद्रीय बैंक के लक्ष्य को समझने में चूक करेंगे। मुद्रास्फीति को लेकर उनके अनुमान का पता होने पर आप उनके कदमों को भी समझ पाते हैं। अब यह बात कम स्पष्ट है। दूसरा, मौद्रिक लक्ष्य तय करने ने केंद्रीय बैंक के गैरजवाबदेह तकनीकविदों का मनमानापन समाप्त किया। उन्हें अनुपालन के लिए एक कानूनी आदेश मिला। अब विवेकाधिकार बढ़ गया है।

आखिर फेड 'औसत मुद्रास्फीति लक्ष्य' में 'औसत' का आकलन किस आधार पर करेगा? पॉवेल ने कहा कि जिस अवधि में औसत से कम मुद्रास्फीति थी उसका अनुसरण करते हुए नीति कुछ समय में अपना लक्ष्य हासिल कर सकती है। यह वक्तव्य भ्रामक और समिति के विवेकाधिकार का विस्तार है। तकनीकविद यह नहीं समझ पाते कि जब वे अपने विवेकाधिकार का विस्तार करते हैं तो वे राजनेताओं को उनकी स्वायत्तता कम करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इस मामले में जैसा कि अर्थशास्त्री रीता खेमानी ने फाइनैंशियल टाइम्स को लिखे पत्र में कहा भी, औसत लक्ष्य हासिल करने की विशिष्ट अवधि को घोषित न होने के कारण राजनेता ब्याज दर पर अपने हित के मुताबिक मानक बदल सकते हैं। फेडरल रिजर्व ने ये बदलाव क्यों अपनाए इसे समझना आसान है। वह कड़े श्रम बाजार और बेरोजगारी के बीच के रिश्ते पर निर्भर था लेकिन उसमें ऐतिहासिक गिरावट आई। जब श्रम बाजार तंग हों तो वेतनभत्ते बढ़ते हैं। इसका असर उत्पादकता से होने वाले लाभ पर पड़ता है और मुद्रास्फीतिक दबाव तैयार होता है। पारंपरिक रूप से देखें तो केंद्रीय बैंक तंग श्रम बाजारों का रुख करेंगे और संभावित परिणाम को समझते हुए मौद्रिक नीति में कड़ाई लाना चालू करेंगे। डॉनल्ड ट्रंप के कार्यकाल के आरंभ में फेड ने भी ऐसा ही किया।

यह मुद्रास्फीतिक दबाव हकीकत में सामने नहीं आया। इसे केंद्रीय बैंकरों के बजाय श्रम अर्थशास्त्री और सूक्ष्म अर्थशास्त्री बेहतर समझेंगे। मुक्त अर्थव्यवस्था ने रोजगार के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ाई और वेतन वृद्धि धीमी हुई। काम और रोजगार अलग-अलग हैं। लोग एक साथ कई काम करते हैं। उबर चालक और एयरबीएनबी मालिकों ने अपनी घरेलू पूंजी का मुद्रीकरण किया है। पश्चिमी समाजों में जनांकीय बदलाव रुक गया है और डिजिटलीकरण का अर्थ है उत्पादकता में बदलाव और मूल्य परिवर्तन का आकलन मुश्किल है। बाजार में यह बड़ा ढांचागत बदलाव है। इस बात को समझा जा सकता है कि रोजगार बढ़ाने के लिए मुद्रास्फीति को तय लक्ष्य से ऊपर होने पर भी बरदाश्त किया जाए लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि यह तार्किक भी है। फेड के कदम रूढि़वादी यूरोपीय केंद्रीय बैंक (ईसीबी) को भी प्रभावित कर सकते हैं। बैंक की अध्यक्ष क्रिस्टीन लेगार्ड ने इस महीने कहा कि उन्होंने फेड की नीति में बदलाव के बाद ईसीबी की नीति की समीक्षा शुरू की है। बैंक ऑफ फ्रांस की गवर्नर फ्रास्वां विलेरॉय गलहाऊ ने पिछले दिनों स्पष्ट सुझाव दिया कि ईसीबी को फेड जैसा रुख अपनाना चाहिए और मध्यम अवधि में मुद्रास्फीति का आकलन करना चाहिए। इस बीच बैंक ऑफ इंगलैंड (बीओई)यह दिखावा कर रहा है कि वह यूके के घाटे का मुद्रीकरण नहीं कर रहा। उसके गवर्नर का दावा है कि बैंक का अपनी ऋण खरीद समाप्त करने का कोई इरादा नहीं। भारतीय रिजर्व बैंक तथा उभरते बाजारों के केंद्रीय बैंक इन केंद्रीय बैंकों के नक्शे कदम पर चलने का प्रयास कर सकते हैं। यह आसान होगा और इससे आरबीआई को दलाल पथ और साउथ ब्लॉक दोनों स्थानों पर लोकप्रियता मिलेगी। लेकिन यह एक गलती होगी। फेड, ईसीबी और बीओआई और बैंक ऑफ जापान के पास गलतियां करने की गुंजाइश है क्योंकि फिलहाल वहां जोखिम रहित ऋण की मांग है। आरबीआई और उसके समकक्ष बैकों के पास गलती की ज्यादा गुंजाइश नहीं है। आरबीआई पहले ही कॉर्पोरेट प्रपत्र खरीदने के मामले में पश्चिमी केंद्रीय बैंकों की नकल कर चुका है। केंद्रीय बैंक वाणिज्यिक बैंक नहीं हैं।

आरबीआई को इस मामले में फेड की नकल नहीं करनी चाहिए। उसके पास फेड के स्तर की जवाबदेही और निगरानी नहीं है। संकट के समय कंपनियोंं की मदद करना चुनी हुई सरकार का निर्णय है कि वह पारदर्शी ढंग से करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल करे। यह तकनीकविदों का काम नहीं है कि वे छिपे हुए भविष्य के मुद्रास्फीतिक कर के माध्यम से ऐसा करें। जल्दी ही मौद्रिक नीति समिति के नए स्वतंत्र सदस्य चुने जाएंगे। उन्हें शुभकामना देनी चाहिए। सबसे अहम बात उन्हें अपने काम में किसी भी तरह के बदलाव का विरोध करना चाहिए। भारत उच्च और आरोपित मुद्रास्फीतिक अनुमानों से इतना भी दूर नहीं आ गया है कि वह अर्थव्यवस्था के साथ ऐसे खेल खेलना शुरू कर दे जैसे खेल पश्चिमी देशों के केंद्रीय बैंक खेलते हैं।

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