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आरबीआई के अनुमान पर होगी सबकी नजर

तमाल बंद्योपाध्याय /  October 01, 2020

सितंबर के आरंभ में जब राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने घोषणा की कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 23.9 प्रतिशत घटा तो सभी विश्लेषकों में जीडीपी अनुमानों को कम करने की होड़ मच गई। मोटे तौर पर अब अनुमान है कि वित्त वर्ष 2021 में जीडीपी में 8 से 12 फीसदी की गिरावट आएगी।

यह सही है कि अमेरिकी निवेश बैंक और वित्तीय सेवा कंपनी गोल्डमैन सैक्स जैसे अपवाद भी हैं जिसका मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था में 2021 में 14.8 फीसदी की गिरावट आ सकती है। पहले उसने 11.8 फीसदी गिरावट का अनुमान जताया था। वहीं दूसरी ओर आईसीआईसीआई बैंक लिमिटेड की एक शाखा आईसीआईसीआई सिक्युरिटीज प्राइमरी डीलरशिप लिमिटेड 7 फीसदी की गिरावट के अनुमान पर टिकी है।

सबकी नजर आरबीआई की अगली मौद्रिक नीति समीक्षा पर है कि वह चालू वर्ष के लिए जीडीपी वृद्धि का क्या अनुमान पेश करता है। अब तक वह किसी तरह का अनुमान देने से बचता रहा है। इसकी आधिकारिक वजह कोविड-19 महामारी के कारण व्याप्त अनिश्चितता और अर्थव्यवस्था पर उसका प्रभाव बताया गया है।

सरकार भी अर्थव्यवस्था में गिरावट के बारे में बात करने से बच रही है। वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन का कहना है कि कई क्षेत्रों में सुधार हो रहा है और जो सुधार किए गए हैं वे दीर्घावधि में वृद्धि को गति देंगे। मंत्रालय के समक्ष एक हालिया प्रस्तुति में सुब्रमण्यन ने कहा है कि वर्ष 2022 में नॉमिनल जीडीपी की वृद्धि दर 19 प्रतिशत रहेगी। लेकिन वह 2021 को लेकर खामोश हैं।

आरबीआई आगामी नीति में जीडीपी के अनुमान पेश कर सकता है। आंकड़े क्या होंगे इसके बारे में अनुमान लगाया जा सकता है लेकिन यदि तीन नए सदस्यों के साथ मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) सुरक्षित कदम उठाए और 6-8 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान जताए तो गलत नहीं होगा।

शायद वह वर्ष की दूसरी छमाही के लिए मुद्रास्फीति के अनुमान भी पेश करे। एमपीसी के लिए मुद्रास्फीति का लचीला लक्ष्य 4 फीसदी है जिसमें दो फीसदी इधर या उधर की गुंजाइश है। बीते नौ में से आठ महीनों में मुद्रास्फीति ऊपरी दायरा पार कर गई। अधिकतम मुद्रास्फीति जनवरी 2020 में 7.59 फीसदी थी। केवल मार्च में यह 5.84 फीसदी के साथ तय दायरे में थी।

आधार प्रभाव के कारण जल्द ही मुद्रास्फीति कम हो जाएगी। अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में यह 5 प्रतिशत या उससे कुछ अधिक रह सकती है। जनवरी-मार्च तिमाही में यह और गिरकर 4.5 से 5 प्रतिशत के आसपास रहेगी और वित्त वर्ष 2022 की पहली तिमाही में यह 4 प्रतिशत रह सकती है। इस स्थिति में एमपीसी अगले वर्ष दरों में कटौती की उम्मीद बनाए रख सकती है।

वृद्धि में भारी कमी के बावजूद आरबीआई दरों में कटौती कर ऋण की मांग नहीं बढ़ाएगा। मई में उसने लगातार दूसरी बार दरों में कटौती की और नीतिगत रीपो दर 4 प्रतिशत के ऐतिहासिक निचले स्तर पर आ गई। रिवर्स रीपो दर भी 3.35 प्रतिशत के साथ अब तक के निचले स्तर पर है। व्यवस्था में पर्याप्त नकदी होने के कारण रिवर्स रीपो दर स्वत: नीतिगत दर बन चुकी है। अप्रैल में नकदी की मात्रा 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक थी जो अब घटकर आधी रह गई है परंतु ऋण की मांग में कोई सुधार नहीं हुआ है तो कोई शिकायत भी नहीं कर रहा।

नीतिगत दरों में तीव्र कटौती के अलावा आरबीआई ने व्यवस्था में 1.25 लाख करोड़ रुपये के दीर्घावधि के रीपो ऑपरेशन (एलटीआरओ) के माध्यम से भी नकदी डाली। इसके अलावा अर्थव्यवस्था के लक्षित हिस्से के लिए भी 1.129 लाख करोड़ रुपये की नकदी डाली गई। फरवरी और मार्च में जो 1.25 लाख करोड़ रुपये की नकदी डाली गई थी उसमें से 1.235 लाख करोड़ रुपये वापस आरबीआई के पास आ गए।

आरबीआई के समक्ष यह चुनौती है कि वह सुनिश्चित करे कि वर्ष के दौरान सरकारी उधारी कम लागत पर उच्च राजकोषीय घाटे की भरपाई करे। सामान्य शब्दों में कहें तो बॉन्ड प्रतिफल को कम रखना होगा। बॉन्ड की कीमत और उसका प्रतिफल विपरीत दिशाओं में जाते दिखते हैं। बढ़ती कीमत खरीदारों को आकर्षित करती है। इनमें ज्यादातर बैंक होते हैं। 10 वर्ष का बॉन्ड प्रतिफल जो अगस्त के अंतिम सप्ताह में 6.27 फीसदी हो गया था वह अब 6 फीसदी के करीब है। वास्तव में बाजार चाहता है कि प्रतिफल कम हो और केंद्रीय बैंक भी नहीं चाहता कि इसमें इजाफा हो।

केंद्र सरकार इस वर्ष लगभग 12 लाख करोड़ रुपये की सकल उधारी की योजना बना रही है। वर्ष की पहली छमाही में उसने 7.7 लाख करोड़ रुपये की राशि जुटा ली। दूसरी छमाही में 4.3 लाख करोड़ रुपये जुटाए जाने की आशा है लेकिन अतिरिक्त उधारी की घोषणा हमेशा बाद में ही की जा सकती है। यदि राज्य सरकारों की उधारी की बात करें तो वह वर्ष के आगे बढऩे के साथ ही गति पकड़ती है। सरकार के राजस्व में अहम कमी आने की आशंका बलवती है और केंद्र तथा राज्यों की समेकित उधारी 22 लाख करोड़ रुपये या इससे अधिक हो सकती है।

क्या इतनी अधिक मात्रा में सरकारी प्रपत्र के खरीदार होंगे? यदि मांग कमजोर पड़ती है तो क्या बॉन्ड प्रतिफल में इजाफा नहीं होगा? प्रतिफल के प्रबंधन के लिए आरबीआई ने अब तक प्रोत्साहन खरीद और खुले बाजार में 1.37 लाख करोड़ रुपये मूल्य की सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री की है।

क्वांटिटेटिव ईजिंग का भारतीय संस्करण, व्यापक सरकारी उधारी कार्यक्रम के प्रबंधन के लिए पर्याप्त नहीं होगा। अब हमें आरबीआई द्वारा मुक्त व्यापार व्यवस्था के तहत द्वितीयक बाजार से बॉन्ड खरीद देखने को मिल सकती है। गत सप्ताह ऐसा पहला प्रयास कामयाब नहीं हुआ क्योंकि आरबीआई उच्च प्रतिफल स्वीकार करने को तैयार नहीं था। वह इस तरीके से कम से कम 1.235 लाख करोड़ रुपये के बॉन्ड खरीद सकता है। वह ऐसा बिना बैलेंस शीट का विस्तार किए हुए किया जा सकता है।

यदि यह अपर्याप्त होता है तो वह नकदी छापकर प्रत्यक्ष मुद्रीकरण कर सकता है। फिलहाल जो हालात हैं उनमें कोई इसे लेकर हील हवाला भी नहीं करेगा। दरों में कटौती के साथ हमने गैर मौद्रिक उपाय देखे हैं, उदाहरण के लिए मुक्त बाजार गतिविधियां और बैंकों के बॉन्ड पोर्टफोलियो में बदलाव जैसी घटनाएं। ऐसे में प्रत्यक्ष मुद्रीकरण किसी को चौंकाएगा नहीं। आखिर, आरबीआई इस बात के लिए प्रतिबद्ध है कि वह अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने और वित्तीय स्थिरता कायम करने के लिए जो भी आवश्यक होगा वह करेगा।
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक एवं जन स्मॉल फाइनैंस बैंक के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं)

Keyword: आरबीआई, मुद्रास्फीति, बॉन्ड प्रतिफल, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय, जीडीपी, अमेरिकी निवेश बैंक,
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