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निजीकरण नीति में होगा बदलाव

अरिंदम मजूमदार / नई दिल्ली September 27, 2020

देश के हवाईअड्डों के निजीकरण को लेकर केंद्र सरकार नई नीति पर विचार कर रही है। इस समय लाभ वाले हवाईअड्डों का निजीकरण करने और आर्थिक रूप से अव्यावहारिक हवाईअड्डों को भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआएआई) के पास छोड़कर प्राधिकरण को कमजोर करने के आरोप सरकार पर लग रहे हैं।

निजीकरण के आने वाले दौर में अव्यावहारिक हवाईअड्डों को 6 प्रमुख हवाईअड्डों से जोड़ा जा सकता है और संभावित बोलीकर्ता को दो हवाईअड्डों तक सीमित किया जा सकता है।

सरकार अमृतसर, वाराणसी, भुवनेश्वर, इंदौर, रायपुर और त्रिची हवाईअड्डों के निजीकरण के लिए नियम तैयार करने के अंतिम दौर में है।

कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में बनी सचिवों की अधिकार प्राप्त समिति (ईजीओएस) ने प्रस्ताव किया है कि 6 अव्यावहारिक हवाईअड्डों को उसी भौगोलिक क्षेत्र के लाभ वाले हवाईअड्डों की बोली हासिल करने वालों को बेचा जाए। योजना के मुताबिक वाराणसी से कुशीनगर हवाईअड्डे, भुवनेश्वर से झारसुगुडा, इंदौर, अमृतसर और त्रिची हवाईअड्डों से क्रमश: जबलपुर, बाड़मेर और सेलम हवाईअड्डों को जोड़ा जाएगा।  ईजीओएल ने एएआई को निर्देश दिया है कि वह बिक्री के लिए हवाईअड्डों को अंतिम रूप देने से पहले इस तरह की प्रक्रिया के आकर्षण व बाधाओं का विश्लेषण करे। साथ ही इस मसले पर राज्य सरकारों के साथ भी चर्चा की जानी है, क्योंकि इन दूरस्थ हवाईअड्डों में से कई का मालिकाना राज्य सरकारों के पास है।  इस मामले से जुड़े एक अधिकारी ने कहा, 'इस बात को लेकर चिंता है कि अगर सभी आकर्षक हवाईअड्डों को निजी क्षेत्र को दे दिया जाएगा तो इससे एएआई को संसाधनों की कमी हो जाएगी, जिसके ऊपर जनसेवा के तहत तमाम अव्यावहारिक हवाईअड्डों को विकसित करने व उनके परिचालन की जिम्मेदारी है।' इसके पहले जब लखनऊ, अहमदाबाद, जयपुर, मंगलूरु, तिरुवनंतपुरम और गुवाहाटी हवाईअड्डों का निजीकरण कर उन्हें अदाणी इंटरप्राइजेज को सौंपा गया था तो एएआई के एक स्वतंत्र यूनियन, एयरपोर्ट अथॉरिटी इंप्लाइज यूनियन ने आरोप लगाया था निजीकरण की मौजूदा नीति निजी साझेदार को एएआई की कीमत पर बेतहाशा मुनाफा कमाने की संभावनाएं दे रही है।

यूनियन ने कहा कि एएआई को घाटे में चल रहे छोटे और गैर मेट्रो शहरों में स्थित हवाईअड्डे बनाने और उनके प्रबंधन की जिम्मेदारी दी गर्ई है। इस बात को लेकर चिंता जताई गई थी कि लाभ वाले हवाईअड्डों का निजीकरण कर देने से एएआई पर केवल आर्थिक रूप से अव्यावहारिक हवाईअड्डों का बोझ रह जाएगा।

 घाटे में चल रहे दूर दराज के हवाईअड्डों को मुनाफे वाले हवाईअड्डों के साथ मिलाने की एक वजह यह भी है कि कोविड-19 महामारी की वजह से एएआई की वित्तीय स्थिति पर असर पड़ा है और इसकी वजह से उसे वित्त वर्ष 21 में घाटा हो सकता है, जो 1995 में इसके गठन के बाद पहली बार होगा।

लेकिन राजस्व में गिरावट के बावजूद एएआई अपने पूंजीगत व्यय की योजना नहीं घटाएगी क्योंकि वित्त मंत्रालय ने सभी सरकारी उपक्रमों से कहा है कि वे अर्थव्यवस्था को बहाल करने के लिए अपनी योजनाओं पर खर्च जारी रखें। एएआई ने अगले 5 साल में 20,000 करोड़ रुपये निवेश की योजना बनाई है, जिसमें से 5,026 करोड़ रुपये वित्त वर्ष 21 में खर्च किए जाएंगे। प्राधिकरण ने वित्त वर्ष 20 में  4,950 करोड़ रुपये पूंजीगत व्यय किया था।

अधिकारी ने कहा, 'निजी कारोबारी प्रमुख हवाईअड्डे के निकट छोटे हवाईअड्डे को विकसित कर सकता है, जो उसके रखरखाव व मरम्मत केंद्र के रूप में काम आ सकता है या वहां एयरक्राफ्ट की पार्किंग हो सकती है। इस बात को लेकर थोड़ी आपत्ति है कि इससे हवाईअड्डों की कीमत में कमी आ सकती है। सभी पहलुओं पर विचार के बाद ही इस पर अंतिम फैसला किया जाएगा।' निजी क्षेत्र की बोली के लिए हवाईअड्डों की संख्या भी सीमित करने की भी सरकार योजना बना रही है। योजना के मुताबिक 6 हवाईअड्डों में से कोई कंपनी 2 ही हासिल कर सकती है। अगर कंपनी 2 हवाईअड्डे पा लेती है तो फिर वह अगली बोली में ही हिस्सा ले पाएगी।

अधिकारी ने कहा, 'जीवीके समूह के पतन के बाद सिर्फ जीएमआर व अदाणी इंटरप्राइजेज ही इस क्षेत्र में बची हैं। हम नहीं चाहते कि विकास में सिर्फ दो कंपनियों का दबदबा रहे।'

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