बिजनेस स्टैंडर्ड - श्रमिकों के आंकड़े जुटाना कठिन
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श्रमिकों के आंकड़े जुटाना कठिन

सोमेश झा /  September 26, 2020

श्रम एवं रोजगार मंत्री संतोष कुमार गंगवार की वजह से हाल ही में सोशल मीडिया पर उस वक्त काफी हलचल मच गई थी, जब उन्होंने संसद के मॉनसून सत्र के पहले दिन कहा था कि लॉकडाउन के दौरान प्रवासी श्रमिकों की मौत के संबंध में केंद्र के पास कोई आंकड़े नहीं है। दस्तूर यह रहा है कि जब सांसद संसद में सवाल करते हैं, तो मंत्री का जवाब अधिकारियों से होता हुआ आता है। संसदीय उल्लंघन से बचने के लिए इन जवाबों को आम तौर पर ध्यान से तैयार किया जाता है।

श्रम मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि हम राज्य सरकारों से प्रवासियों की मौत के संबंध में आंकड़े एकत्र कर रहे हैं। केंद्र ऐसे आंकड़े नहीं जुटाता है, क्योंकि इसमें कई प्रकार की चुनौतियां होती हैं। उदाहरण के लिए काम की प्रकृति के लिहाज से किसी मृत्यु प्रमाण पत्र से किसी व्यक्ति के बारे में पता नहीं चलता है।

हालांकि अधिकारी ने कहा कि इस बात का अनुमान है कि लॉकडाउन के दौरान देश भर में 900 से 1,000 प्रवासी श्रमिकों की मौत हुई है। लेकिन चूंकि आंकड़े व्यावहारिक साक्ष्यों पर आधारित होते हैं, इसलिए संसद में ऐसा अनुमान लगाना संभव नहीं था। श्रम कानूनों का कार्यान्वयन राज्य सरकारों पर निर्भर करता है, उन्होंने शायद इन आंकड़ों को एकत्र किया हो। ऐसा नहीं है कि इन आंकड़ों को किसी भी रूप में एकत्र नहीं किया गया है। कुछ ऐसे शोधकर्ता हैं जिन्होंने इस तरह के आंकड़े तैयार करने का प्रयास किया है। शोधकर्ताओं और छात्रों द्वारा निर्मित की गई एक वेबसाइट (दजेशजीएन डॉट कॉम) सक्रिय तौर पर विभिन्न समाचार पोर्टलों से आंकड़े जुटा रही है। इसका कहना है कि सफर के दौरान दुर्घटनाओं के कारण 200 से अधिक मौतें हुई हैं, श्रमिक स्पेशल रेलगाडिय़ों में 96 मौतें हुई हैं (रेल मंत्री पीयूष गोयल ने राज्यसभा को 97 मौत होने की जानकारी दी है), 49 मौतें क्वारंटीन केंद्रों पर हुई हैं।

केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों द्वारा उपलब्ध कराई जानकारी के आधार पर संसद को बताया है कि लॉकडाउन के दौरान अपने मूल राज्यों में लौटने वाले श्रमिकों की संख्या 1.04 करोड़ थी।

केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने प्रवासी श्रमिकों के संबंध में एक डेटाबेस बनाने का प्रयास किया जिसे कोविड -19 से प्रभावित असंगठित प्रवासी श्रमिकों के राष्ट्रीय पोर्टल के रूप में जाना जाता है। इससे अपेक्षा की गई थी कि यह असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों का विवरण जुटाएगा जो लॉकडाउन में राहत शिविरों, आवासीय और औद्योगिक क्षेत्रों में फंसे गए थे। लेकिन इस परियोजना को बीच में छोड़ दिया गया था, क्योंकि सरकार ने मई में प्रवासियों को घर लौटने की अनुमति देने के लिए परिवहन सेवाएं खोल दी थी।

दरअसल, सरकार के पास प्रवासी श्रमिकों के संबंध में विश्वसनीय आंकड़े नहीं हैं। जब कभी संसद में सांसदों द्वारा इस तरह का सवाल उठाया जाता है, तो सरकार द्वारा दी गई सामान्य जवाब यही होता है कि देश में अनुमानित से 10 करोड़ प्रवासी श्रमिक हैं। इन आंकड़ों का स्रोत वर्ष 2016-17 का वह आर्थिक सर्वेक्षण है जिसमें कहा गया है कि श्रमिकों में इन प्रवासियों की हिस्सेदारी 17 से 19 प्रतिशत है। इसमें कहा गया है कि अगर श्रमिकों में प्रवासियों की हिस्सेदारी अनुमानित रूप से 20 प्रतिशत भी रहती है, तो अनुमान लगाया जा सकता है कि वर्ष 2016 में प्रवासी श्रमिकों का आकार कुल मिलाकर 10 करोड़ से अधिक होगा। सर्वेक्षण में समूह-आधारित प्रवास मापक तैयार किया गया है जो बताता है कि वर्ष 2011 से 2016 के दैरान काम के लिए वार्षिक रूप से प्रवास करने वाले लोगों की संख्या करीब 90 लाख रही है, जबकि वर्ष 2001 से 2011 के दौरान यह औसत 60 लाख था।

कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज द्वारा सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी के जवाब में हाल ही में केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्रालय ने कहा है कि उसके रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2010-11 से 2019-20 के दौरान 372 प्रतिष्ठानों में काम करने वाले करीब 84,875 प्रवासी श्रमिक ही थे। वास्तव में वर्ष 2019-20 के दौरान दिल्ली, पटना, देहरादून और जबलपुर में प्रवासी श्रमिक पंजीकृत नहीं थे। ऐसा मुख्य रूप से इसलिए है, क्योंकि केंद्र कानूनी भाषा में प्रवासी श्रमिकों को मान्यता देने के लिए 1979 के अंतर-राज्य प्रवासी श्रमिक अधिनियम का पालन करता है।

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