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अनिवार्य हैं सुधार

संपादकीय /  September 23, 2020

कोविड-19 महामारी के कारण अर्थव्यवस्था और आर्थिक गतिविधियों में जो गिरावट आई है उससे ठोस तरीके से बाहर निकलना काफी हद तक बैंकिंग तंत्र की ऋण देने की क्षमता पर निर्भर करेगा। यह खासतौर पर सरकारी बैंकों की उत्पादक क्षेत्रों को ऋण देने की क्षमता पर निर्भर होगा। परंतु मौजूदा स्वरूप में सरकारी बैंक अर्थव्यवस्था की मदद करने लायक नहीं दिखते। चालू वित्त वर्ष के अंत तक सरकारी बैंकों का फंसा हुआ कर्ज 12 प्रतिशत से अधिक होना तय है। ऐसे में चूंकि सरकार इन बैंकों में लगातार पूंजी नहीं डाल सकती इसलिए इनमें सुधार की आवश्यकता है। इन बैंकों में सुधार को लेकर पिछले कई वर्ष से चर्चा चल रही है लेकिन इस दिशा में जमीनी प्रगति कुछ खास नहीं है। आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और पूर्व डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य का एक प्रपत्र इस बहस को आगे बढ़ाता है।

दोनों विद्वानों का यह तर्क एकदम सही है कि राजकोषीय दृष्टि से मौजूदा परिस्थितियां एकदम अस्थिर हैं। इस प्रपत्र में जिन बातों की चर्चा की गई है उनमें बैंकों के बोर्डों को परिचालन स्वतंत्रता देना और प्रबंधन के लिए प्रोत्साहन ढांचे को मजबूत करना जैसी बातें तो पहले से सार्वजनिक हैं लेकिन प्रपत्र ने वित्तीय सेवा विभाग को बंद करने के पक्ष में दलील देते हुए कहा है कि ऐसा करने से बैंक बोर्ड और प्रबंधन स्वायत्तता प्रदान करने को लेकर एक मजबूत संकेत जाएगा। स्वामित्व के मामले में प्रपत्र में सुझाया गया है कि सरकार कुछ बैंकों में अपनी हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से कम कर सकती है। इससे वह परिचालन से दूर होगी और बैंकों के संचालन में सुधार होगा। इसके अलावा चुनिंदा सरकारी बैंकों का सावधानीपूर्वक निजीकरण भी किया जा सकता है।

फंसे हुए कर्ज के निपटान की बात करें तो प्रपत्र में बैड बैंक (ऐसा बैंक जो अन्य बैंकों के फंसे कर्ज व दायित्व को एक खास अवधि के लिए धारण करता है) के विचार पर भी चर्चा की गई है। यदि इसकी स्थापना एक सरकारी संस्थान के रूप में की जाती है, तो जांच एजेंसियां शायद सरकारी क्षेत्र के बैंकरों से इसे बेची जाने वाली परिसंपत्तियों को लेकर जवाबतलब न करें क्योंकि मामला दो सरकारी संस्थानों के बीच का होगा। सरकारी बैंकर प्राय: घाटे को उजागर नहीं करना चाहते क्योंकि उन्हें जांच एजेंसियों से भय लगता है। हालांकि बैड बैंक के कर्मचारियों को भी ऐसी ही दिक्कतों का सामना करना होगा क्योंकि उनका साबका निजी संस्थानों से होगा तथा वे परिसंपत्तियों को बट्टे खाते में डालेंगे। मूल्य की चिंता पर रिपोर्ट का कहना है कि तनावग्रस्त ऋण के लिए अधिक नकदीकृत बाजार बनाया जाए। परंतु ऐसा बाजार विकसित करना हमेशा कठिन होता है क्योंकि सरकारी बैंक शुरुआती दौर में खुलकर भागीदारी नहीं कर पाते। साथ ही मांग में सुधार होने तक किसी खास क्षेत्र में संपत्ति बनाए रखना भी शायद कारगर न हो क्योंकि इसकी लागत संभावित लाभ को खारिज कर देगी।

फंसे कर्ज और परिसंपत्ति से निपटने के सुझाए गए तरीकों में से कुछ पर बहस हो सकती है लेकिन यह प्रपत्र सरकारी बैंकों के प्रदर्शन में सुधार को लेकर कई अहम हल सुझाता है। बहसतलब सवाल यह है कि क्या सरकार में छिटपुट सुधारों से बचने की इच्छाशक्ति है। मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल के आरंभ में इस विषय में सही बातें की थीं लेकिन कुछ खास बदलाव नहीं हुआ। यकीनन हमेशा वर्तमान सरकार को बैंकों के स्वामित्व से फायदा होता है क्योंकि वह उसका उपयोग किसी क्षेत्र या आबादी के किसी हिस्से के समर्थन में कर सकती है। प्राय: राजनीतिक कारणों से अल्पावधि में आर्थिक गतिविधि तेज करने में इनका इस्तेमाल किया जाता है। शायद बदलाव तभी आएगा जब सरकार को यकीन हो जाए कि बैंकिंग क्षेत्र में बदलाव निरंतर सुधारों से ही हो सकता है।

Keyword: महामारी, अर्थव्यवस्था, आर्थिक गतिविधि, बैंकिंग, ऋण, बैंक, फंसा हुआ कर्ज, बैंकर,
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