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महामारी से अभी नहीं मिलेगी निजात

रुचिका चित्रवंशी /  September 22, 2020

देश में कोरोनावायरस मामलों में एक बार फिर काफी बढ़ोतरी देखी जा रही है और महामारी विशेषज्ञों को लग रहा ंहै कि यह कुछ हफ्तों तक जारी रहेगा, जिससे देश को महामारी से स्थानिक बीमारी के चरण में पहुंचने के लिए लंबा रास्ता तय करना पड़ेगा जब संक्रमण के मामलों की संख्या में कमी आएगी और यह स्थिर हो जाएगी। महामारी कई देशों या महाद्वीपों में फैलती है जबकि स्थानिक बीमारी एक विशेष आबादी या क्षेत्र तक ही सीमित रहती है। जैसे चेचक जैसी बीमारी एक समुदाय में हर वक्त मौजूद है लेकिन इसके होने की दर का स्तर अपेक्षाकृत कम है।

पहले राष्ट्रीय सीरो सर्वेक्षण के आंकड़ों में यह बताया गया है कि संक्रमण के जितने मामले दर्ज कराए जा रहे हैं उनके मुकाबले वास्तविक मामले 20-30 गुना अधिक हैं। इसके बाद भी आबादी का एक बड़ा हिस्सा अब भी बेहद संवेदनशील बना हुआ है। मिशिगन यूनिवर्सिटी में बायोस्टैस्टिक्स की प्रोफेसर भ्रमर मुखर्जी कहती हैं, 'अगर चीजें इस तरह से जारी है तब राष्ट्रीय स्तर पर उच्चतम स्तर आने में वक्त लगेगा। एक राज्य में मामले कम होते हैं तब दूसरे राज्य में मामले बढ़ जाते हैं। आप नियंत्रण में थोड़ी छूट देते हैं तब वायरस का प्रसार और बढ़ जाता है।'  जांच में पॉजिटिव मामलों की दर करीब 8.6 फीसदी तक है जबकि सरकार जांच के जरिये इस संख्या को कम करके 5 फीसदी के स्तर तक लाना चाहती है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि मामलों में बढ़ोतरी परीक्षण के कारण नहीं है बल्कि लोगों की आवाजाही बढऩे की वजह से, नियमों का पालन न होने और सामाजिक दूरी तथा मास्क पहनने के निर्देशों का पालन न होने की वजह से हुई है।

 भारत को कोविड-19 के 10 लाख मामलों तक पहुंचने में लगभग छह महीने लग गए। जबकि हाल में मामलों में आखिरी बार 10 लाख की बढ़ोतरी में दो हफ्ते से भी कम समय लगा जिससे भारत संक्रमण के सबसे अधिक मामलों के लिहाज से दुनिया में दूसरे नंबर  पर पहुंच गया। भारत में अब तक 55 लाख कोरोनावायरस मामले दर्ज हुए।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के सेंटर ऑफ एडवांस्ड रिसर्च के पूर्व प्रमुख और सेवानिवृत्त विषाणु विशेषज्ञ जैकब जॉन कहते हैं, 'हम महामारी के शिखर की ओर तेजी से बढ़ रहे। लेकिन हम संक्रमण का पता लगाने में असमर्थ हैं। संक्रमण का पता लगाने में हमारी दक्षता के मुकाबले महामारी की व्यापकता का अनुपात ज्यादा है।'  

जॉन कहते हैं कि हम महामारी के शीर्ष स्तर पर भी पहुंचेंगे जिसकी संभावना अगले तीन हफ्तों में बन सकती है तब भी हमें महामारी से ज्यादा जूझना पड़ेगा क्योंकि इसके बाद भी ज्यादातर मामले सामने आएंगे। ज्यादातर लोग महामारी के शीर्ष स्तर पर पहुंचने के बाद संक्रमित होंगे। इसका फायदा यह है कि वायरस को शेष आबादी तक पहुंचने में ज्यादा समय लगेगा ।

महामारी विज्ञान मॉडलों के अनुसार शीर्ष स्तर पर पहुंचने के बाद की अवधि शीर्ष तक पहुंचने में लगने वाली अवधि का डेढ़ गुना होना चाहिए। जॉन कहते हैं, 'यदि महामारी के शीर्ष पर पहुंचने से पहले की अवधि पांच-छह महीने है तो इस महामारी की प्रकृति को देखते हुए अंदाजा होता है कि शीर्ष स्तर के बाद भी करीब 8-10 महीने तक संक्रमण का असर होता है लेकिन यह आधार रेखा को कभी नहीं छूता है।'  मिसाल के तौर पर इन्फ्लूएंजा जैसी बीमारी जो 1960 के दशक में आई या एच1एन1 जो 2009 में आया वह अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि स्थानिक चरण से बाहर निकलने का एकमात्र तरीका बड़े पैमाने पर टीकाकरण है। विषाणु विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा नहीं होने तक कोरोनावायरस हमारे बीच होगा और एक मौसमी संक्रमण बन सकता है जो बढ़ता घटता रहेगा।

 विशेषज्ञों का मानना है कि जर्मनी जैसे देश में अप्रैल में शीर्ष स्तर पर पहुंचने के बाद पिछले महीने से 10 से कम दिन पर अब लगभग 1,000 मामले दर्ज किए जा रहे हैं। जॉन कहते हैं, 'भारत में जहां हर राज्य एक देश की तरह है वहां महामारी का अलग तरह से अनुभव किया जा रहा है और स्थानिक बीमारी अप्रैल से बढ़ी है। देश के विभिन्न हिस्सों में मामलों में बढ़ोतरी का स्तर अलग रहा है और लॉकडाउन की वजह से राज्यों के बीच प्रसार का स्तर धीमा हुआ है।'

हालांकि, अगर राष्ट्रीय सर्वेक्षण के नतीजों को देखा जाए तो भारत में मई में ही 64 लाख मामले सामने आ सकते थे जिससे भारत दुनिया का संक्रमण से सबसे ज्यादा प्रभावित देश बन जाता। अगर वास्तविक मामले 46.5 लाख दर्ज मामलों की तुलना में 20 गुना अधिक थे तब भारत अभी तक संकट से बाहर नहीं निकला है क्योंकि जनसंख्या का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा ही संक्रमित हुआ है।

 दिल्ली जैसे कुछ शहरों में जुलाई में गिरावट के बाद पिछले महीने काफी तेजी से मामले बढ़े हैं। मुखर्जी कहती हैं, 'हर हफ्ते स्थिति बदतर होती जा रही है लेकिन देश के बड़े हिस्से ने इस संकट की अनदेखी करना शुरू कर दिया गया है। अब यही माना जा सकता है कि लोगों को इसकी आदत पड़ गई है और लोग एहतियात करते-करते थक चुके हैं और अब इसे किस्मत पर छोड़ रहे हैं।' कई महामारी विशेषज्ञ बढ़ती संख्या से आश्चर्यचकित नहीं हैं लेकिन वह इस बात को लेकर चिंतित हैं कि ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों तक यह वायरस न पहुंचे जहां स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा कमजोर है । तिरुवनंतपुरम के श्री चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी के प्रोफेसर राखाल गायतोंडे कहते हैं, 'यह बड़ी चिंता है। इसके अलावा कोविड-19 की वजह से नियमित प्रसवपूर्व देखभाल, टीबी, पोषण जैसी अन्य सेवाएं प्रभावित हो रही हैं।'

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