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कंपनी अधिनियम में अब जेल की सजा नहीं, अर्थदंड में भी कमी

रुचिका चित्रवंशी / नई दिल्ली September 21, 2020

कारोबार सुगमता का दायरा बढ़ाने व कंपनियों को राहत देने के लिए कंपनी विधेयक में 48 धाराओं को आपराधिक धारा की श्रेणी से बाहर किया गया है। यह उन धाराओं के दंडात्मक प्रावधानों को हटाकर या घटाकर, विभिन्न अपराधों के लिए जेल की सजा खत्म करके किया गया है, जिसमें अपराधों को प्रक्रियागत या तकनीकी प्रकृति का माना गया था।

यह विधेयक ऐसे समय में शनिवार को लोकसभा में पारित हुआ है, जब कोरोनावायरस के कारण कंपनियां दबाव से गुजर रही हैं। वित्त एवं कंपनी मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि कंपनी कानून के विभिन्न प्रावधानों को आपराधिक की श्रेणी से बाहर करने से छोटी कंपनियों को भी मदद मिलेगी और उन पर याचिका का बोझ कम होगा।

विधेयक में 9 अपराधों में जेल की सजा खत्म करने का प्रस्ताव किया गया है, जो राष्ट्रीय कंपनी कानून पंचाट (एनसीएलटी) के आदेशों के अनुपालन न करने से जुड़े हैं। यह मामले कंपनी के कामकाज समेटने, शेयर पूंजी कम करने से संबंधित एनसीएलटी के आदेश के प्रकाशन में चूक, प्रतिभूूति धारकों के रजिस्टर में संशोधन, शेयरधारकों के अधिकार में अंतर और ब्याज का भुगतान और डिबेंचर के प्रतिदान से जुड़े हैं।

सीएसआर के मामले में अगर कंपनी एक विशेष कोष में धन हस्तांतरण में सफल नहीं रहती है तो भुगतान की जाने वाली राशि का दोगुना या एक करोड़ रुपये, जो भी कम हो, उसे देना होगाा। साथ ही चूक से जुड़े कंपनी के प्रत्येक अधिकारी को कंपनी द्वारा हस्तांतरित की जाने वाली संबंधित राशि का 10 वां हिस्सा जुर्माने के रूप में देना होगा, इसके पहले ऐसे मामलों मेंं 3 साल जेल और 5 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया था।

कॉर्पोरेट प्रोफेशनल्स के संस्थापक पवन कुमार विजय ने कहा, 'ये संशोधन सीएबी 2020 के उद्देश्यों की दिशा में उठा कदम है, जिसमें व्याख्या संबंधी प्रावधान खत्म करने की बात कही गई है। ऐसे मामलों में इसका अस्तित्व बना हुआ था, क्योंकि निर्णय लेने वाले अधिकारी को अधिनियम के तहत शक्तियां दी गई हैं कि वह जेल की सजा दे सकता है या आपराधिक जुर्माना लगा सकता है, या दोनों लगा सकता है। '

इस विधेयक में अधिनियम की धारा 26 (9) और 40 (5) को भी हटा दिया गया है, जिसमें जेल की सजा का प्रावधान है। ये धाराएं ऐसी कंपनियों के प्रतिभूतियों की सार्वजनिक पेशकश से जुड़े हैं, जिन्हें विवरणिका में कहा गया है। बहरहाल इन प्रावधानों में मौद्रिक जुमाने की मात्रा में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

अधिनियम की धारा 68 के तहत वर्णित पुनर्खरीद और कंपनी के वित्तीय लेखा जोखा की विभिन्न चूक के मामलों में प्रक्रिया का अनुपालन न करने पर जेल की सजा का प्रावधान भी खत्म कर दिया गया है।

अधिनियम में वित्तीय लेखा जोखा कंपनी पंजीयक के पास जमा कराने में देरी जैसे मामलों में लगाए जाने वाले जुर्मानों को तार्किक बनाया गया है।

कंपनी मामलों के मंत्रालय ने ऐसी धाराओं को भी आपराधिक श्रेणी से बाहर कर दिया है, जहां शिकायत के मामलों में समझौता हो जाता है या आरोपी के खिलाफ लगाए गए अभियोग वापस लेने पर सहमति बन जाती है।

नए प्रावधानों के तहत अगर कोई व्यक्ति अहम लाभदायक मालिकाना की घोषणा करने में असफल रहता है तो न्यूनतम जुर्माना आधा घटाकर 50,000 रुपये और ऐसी गलती जारी रखने पर 1,000 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से अधिकतम 2,00,000 रुपये तक जुर्माना किया जाएगा।

कंपनी अधिनियम में पिछले संशोधन में सरकार ने 16 धाराओं को आपराधिक श्रेणी से बाहर किया था। इनमें से ज्यादातर चूक से जुड़े मामले थे।

सरकार ने अब दंड को जुर्माने तक सीमित कर दिया है और जेल की सजा का प्रावधान खत्म कर दिया गया है।  धाराओं को आपराधिक श्रेणी से हटाने के अलावा कंपनी विधेयक में 17 अन्य संशोधन भी किए गए हैं, जिससे सार्वजनिक कंपनियां अपनी कुछ प्रतिभूतियां विदेशी न्यायक्षेत्रों के स्टॉक एक्सचेंज में लगा सकती हैं। इसमें कंपनियों को यह भी अनुमति दी गई है कि कंपनी के सामाजिक दायित्व (सीएसआर) की 2 प्रतिशत राशि के बचे धन को अगले वित्त वर्षों की राशि में डाल सकती हैं।

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