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ब्याज माफी से हिलेगा बैंकों के प्रति भरोसा

तमाल बंद्योपाध्याय /  September 16, 2020

लॉकडाउन में कर्ज अदायगी पर दी गई मोहलत के दौरान बैंकों द्वारा ब्याज वसूलने या ब्याज पर लिए जाने वाले ब्याज को माफ करने की मांग करने वाली याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय में जारी सुनवाई ने मुझे बैंकिंग कारोबार पर गहरी नजर डालने के लिए बाध्य किया है।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने पहले बैंकों को सभी सावधि ऋण पर तीन महीनों तक ऋण स्थगन की सुविधा देने की अनुमति दी थी। बाद में इसे फिर से तीन महीने के लिए बढ़ाकर अगस्त 2020 तक कर दिया गया। कोविड महामारी के दौरान परेशान कर्जदारों को राहत देने के लिए आरबीआई ने उन्हें किस्तों के भुगतान से राहत दी थी।

ऋण पुनर्भुगतान का स्थगन अमूमन अस्थायी वित्तीय कठिनाइयों में किया जाता है। इस दौरान कर्जदारों को कोई भी किस्त देने की जरूरत नहीं होती है लेकिन बकाया कर्ज पर ब्याज लगता रहता है। लेकिन छूट के दौरान ब्याज न लिए जाने की मांग कर रहे लोगों का मानना है कि परेशानी का सामना कर रहे कर्जदारों से ब्याज मांगना उचित  नहीं है। याचियों के मुताबिक, बैंकों को साधारण ब्याज के साथ ही बकाया ब्याज पर ब्याज भी नहीं वसूलना चाहिए।

शीर्ष अदालत ने सरकार से इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख 28 सितंबर तक समाधान प्रस्ताव दाखिल करने को कहा है। इस बीच वित्त मंत्रालय ने ब्याज नहीं लिए जाने की स्थिति में बैंकों पर पडऩे वाले असर के आकलन के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन कर दिया है। यह समिति कर्जदाताओं को राहत देने के तरीके भी सुझाएगी। पूर्व नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक राजीव महर्षि इस समिति के प्रमुख बनाए गए हैं। मौद्रिक नीति समिति के पूर्व सदस्य रवींद्र एच ढोलकिया और भारतीय स्टेट बैंक के पूर्व प्रबंध निदेशक बी श्रीराम को समिति का सदस्य बनाया गया है। समिति एक हफ्ते में अपनी रिपोर्ट दे देगी।

इसके ठीक पहले आरबीआई द्वारा नियुक्त के वी कामत समिति ने कारोबार पर महामारी के असर की वजह से कर्ज नहीं चुकाए जा पाने की स्थिति में कॉर्पोरेट ऋण के पुनर्गठन के मानक तय किए थे। ब्याज राशि की फंडिंग, डेट के कुछ हिस्से को इक्विटी में बदलने और कर्जदारों को अदायगी के लिए अधिकतम दो साल का वक्त देने जैसे तरीकों से इन कर्ज का पुनर्गठन किया जा सकता है।

एक वाणिज्यिक बैंक मुद्रा छापने वाला प्रिंटिंग प्रेस नहीं चलाता है। बैंक एक वित्तीय मध्यवर्ती या कथित रूप से ऐसा संस्थान होता है जो जमाकर्ताओं से पैसे लेता है और कर्जदारों को ऋण देता है। जमाकर्ताओं से लिए जाने वाले हरेक 100 रुपये में से 3 रुपया बैंक नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) के रूप में आरबीआई के पास रखता है जिस पर उसे ब्याज नहीं मिलता है। फिर कम-से-कम 18 रुपये उसे सरकारी बॉन्ड में निवेश करना होता है जो सरकार को राजकोषीय घाटे से निपटने में मदद करता है। बैंकों का सरकारी बॉन्ड में वास्तविक निवेश इससे कहीं अधिक होता है। इस निवेश पर भी बैंकों को मामूली प्रतिफल  ही मिलता है जबकि जोखिम काफी होता है। अगर बॉन्ड की कीमत खरीदी स्तर से नीचे चली जाए तो बैंक को बाजार में होने वाले नुकसान के लिए भी प्रावधान करना पड़ता है।

बैंक जमा राशि के बाकी हिस्से यानी 79 रुपये का इस्तेमाल कर्ज बांटने, अपनी परिचालन लागत बनाए रखने लायक मार्जिन कमाने और लाभ कमाने के लिए करता है। बैंक एक वाणिज्यिक इकाई होता है। अगर यह पुनर्भुगतान की छूट में कर्जदारों से ब्याज नहीं वसूल सकता है तो फिर उसका बोझ कौन उठाएगा? क्या जमाकर्ताओं को अपने जमा पर ब्याज न लेकर कर्जदारों को यह सब्सिडी देनी चाहिए? उस स्थिति में तो हम बैंकिंग की पूरी अवधारणा ही पलटकर रख देंगे। आरबीआई को नए सिरे से मानक तय करने होंगे और जमाकर्ताओं से पहले कर्जदारों को अहमियत देनी होगी। बैंकिंग में जमाकर्ताओं के हितों को सुरक्षित रखना हमेशा ही केंद्र में रहा है।

जमाकर्ता को बैंकों के पास जमा राशि पर चक्रवृद्धि ब्याज मिलता है। फिक्स्ड डिपॉजिट एवं रेकरिंग डिपॉजिट के लिए ब्याज तिमाही आधार पर दिया जाता है। बचत खाते में ब्याज का भुगतान दैनिक औसत राशि के आधार पर किया जाता है और हरेक तिमाही में इसकी गणना होने के बाद तिमाही या छमाही आधार पर ब्याज जोड़ दिया जाता है। आरबीआई के मानक तिमाही आधार पर ब्याज का भुगतान करने की बात करते हैं जबकि कर्जदारों के मामले में मासिक कर्ज भुगतान का उल्लेख है।

अब इस मसले के केंद्रीय मुद्दे पर गौर करते हैं। भारतीय बैंकिंग प्रणाली की लोन बुक करीब 102 लाख करोड़ रुपये की है। इसके साथ गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) द्वारा बांटे गए 23.5 लाख करोड़ रुपये के कर्ज को भी जोड़ लीजिए। इस तरह भारतीय वित्तीय प्रणाली का कुल लोन बुक 125.5 लाख करोड़ रुपये की है और इसी पर भुगतान की मोहलत दी गई।

अगर बांटे गए कर्ज पर औसत ब्याज दर को 10 फीसदी मानें तो कर्जदारों को सालाना 12.55 लाख करोड़ रुपये ब्याज के तौर पर चुकाने होंगे। अगर इसे मासिक स्तर पर देखें तो हर महीने करीब 1.05 लाख करोड़ रुपये का ब्याज बनता है। इस आधार पर मोहलत के छह महीनों में कर्ज पर साधारण ब्याज करीब 6.275 लाख करोड़ रुपये हो जाता है। वहीं चक्रवृद्धि रूप में कुल ब्याज 6.4 लाख करोड़ रुपये से थोड़ा अधिक हो जाता है। लिहाजा कर्जदारों पर बकाया समूचे ब्याज को माफ करने का निर्णय लिया जाता है तो वह रकम 6.4 लाख करोड़ रुपये की होगी। लेकिन  केवल चक्रवृद्धि ब्याज को माफ करने पर वह रकम 13,219 करोड़ रुपये ही होगी।

इस पूरे आकलन में यह मानकर चला गया है कि सभी कर्जदारों ने मोहलत सुविधा का लाभ लिया है लेकिन असल में ऐसा नहीं है। यह हालात का अति-सरलीकरण है और इसमें ब्याज के फौरन भुगतान की बात मान ली गई है। अगर इस ब्याज को कर्जदारों की मासिक किस्तों में जोड़ दिया जाता है तो कर्ज की अवधि के आधार पर कई वर्षों में रकम भी धीरे-धीरे बढ़ती जाएगी।

अहम सवाल यह है कि अगर ब्याज माफी होती है तो इसका भुगतान कौन करेगा? लॉकडाउन किसने लगाया था जिसकी वजह से कर्जदारों के कारोबार प्रभावित हुए या उनकी नौकरियां चली गईं? क्या यह काम आरबीआई ने किया या फिर बैंकों ने? चूंकि सरकार ने ही लॉकडाउन की घोषणा की थी, लिहाजा जिम्मेदारी भी उसी की बनती है।

सरकार ने सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम इकाइयों (एमएसएमई) को दिए जाने वाले 3 लाख करोड़ रुपये के नए कर्ज की पूरी गांरटी दी हुई है। बैंकरों ने अगस्त तक 1.58 लाख करोड़ रुपये के कर्ज की मंजूरी दे दी है और उसमें से 1.11 लाख करोड़ रुपये के कर्ज तो बांटे भी जा चुके हैं।

अदालत में विचाराधीन कर्ज स्थगन पर ब्याज मामले में वास्तविक रकम तो 13,129 करोड़ रुपये से भी कम है क्योंकि सभी कर्जदारों ने मोहलत नहीं ली हुई है और न ही यह सुविधा लेने वाले हरेक शख्स को वित्तीय समर्थन की दरकार ही है।

यह मामला इस बारे में समझ की कमी दर्शाता है कि वाणिज्यिक इकाइयों को किस तरह काम करना चाहिए और बैंकिंग नियामक की क्या भूमिका होनी चाहिए? यह मामला एक नजीर बनेगा और कर्जदारों के समूह को भविष्य में भी बाढ़, अकाल या अन्य विपदाओं की चपेट में आने पर ब्याज भुगतान से राहत के लिए कानूनी विकल्प आजमाने को प्रेरित करेगा। कर्ज माफी के बजाय हम ब्याज दर माफी की शुरुआत देख सकते हैं या फिर दोनों ही साथ-साथ चल सकते हैं।

अंत में, ऐसा होने पर बैंकों के प्रति निवेशकों का भरोसा हिल जाएगा। अभी तक बैंकों की ऋण परिसंपत्तियों की गुणवत्ता ही अक्सर संदेह के घेरे में रहती थीं लेकिन बैंकिंग कामकाज में न्यायपालिका के दखल देने से निवेशक पीछे हट जाएंगे और बैंकों की ब्याज से होने वाली आय के अनुमानित प्रवाह पर सवाल उठाने लगेंगे।
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक एवं जन स्मॉल फाइनैंस बैंक के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं)

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